उत्तर-दक्षिण के सशक्त सेतु और जन-मानस
के कवि : प्रो. ऋषभदेव शर्मा
डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
4 जुलाई, 1957 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर
जनपद के ग्राम गंगधाड़ी में जन्मे प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं
हैं। हिंदी भाषा, साहित्य, पत्रकारिता, आलोचना तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान
अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायी रहा है। अपने बहुआयामी व्यक्तित्व एवं सृजनशीलता
के बल पर उन्होंने राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी की प्रतिष्ठा
बढ़ाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
प्रोफेसर शर्मा ने अपने व्यावसायिक जीवन
का प्रारंभ वर्ष 1983 में भारत सरकार के इंटेलिजेंस ब्यूरो में खुफिया अधिकारी के रूप
में किया। किंतु साहित्य और शिक्षा के प्रति उनके गहरे अनुराग ने उन्हें वर्ष 1990
में इस प्रतिष्ठित सरकारी सेवा से त्यागपत्र देकर उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान, दक्षिण
भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास में व्याख्याता के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के लिए
प्रेरित किया। प्रारंभ में यह निर्णय आजीविका की दृष्टि से लिया गया प्रतीत होता है,
किंतु कालांतर में यही उनके जीवन का सबसे सार्थक और ऐतिहासिक निर्णय सिद्ध हुआ।
उन्होंने यह प्रमाणित किया कि वे केवल एक
अध्यापक नहीं, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के मध्य हिंदी प्रेमियों को जोड़ने वाले
सशक्त सांस्कृतिक सेतु हैं। अपने अध्यापन, शोध, लेखन तथा संगठनात्मक कार्यों के माध्यम
से उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार को नई दिशा प्रदान की।
वर्तमान में प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा दूरस्थ
एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद में
हिंदी परामर्शी के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। वे अपने गहन ज्ञान, मौलिक
चिंतन और दूरदर्शी दृष्टिकोण के माध्यम से हिंदी को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर
प्रतिष्ठित करने में निरंतर सक्रिय हैं। उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार
या नारेबाज़ी के अपने कर्म और लेखन के बल पर हिंदी की सेवा को अपना जीवन-धर्म बनाया
है।
प्रोफेसर शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी
साहित्यकार हैं। उन्होंने कविता, आलोचना, संस्मरण, डायरी, निबंध, शोध तथा विभिन्न साहित्यिक
विधाओं में अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की है। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘तेवरी’,
‘तरकश’, ‘ताकि सनद रहे’, ‘देहरी’ (स्त्री-पक्षीय कविताएँ), ‘कविता का समकाल’, ‘कथाकारों
की दुनिया’, ‘रामायण संदर्शन’ तथा ‘कोरोना काल की डायरी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
प्रो. गोपाल शर्मा जी ने प्रो. ऋषभदेव शर्मा
की चुनिंदा कविताओं को लेकर कविता-संग्रह ‘इक्यावन
कविताएँ’ का संपादन किया। यह पुस्तक भी विशेष रूप से चर्चित रही है। इस कृति के संबंध
में वरिष्ठ साहित्यकार प्रवीण प्रणव का मत
अत्यंत सारगर्भित है—
“‘अहं ब्रह्मास्मि’ के सूत्रवाक्य की भाँति
इन कविताओं का विषय ‘मैं’ से ‘ब्रह्म’ तक विस्तृत है। इस विस्तार की सबसे बड़ी विशेषता
यह है कि ये कविताएँ मनुष्यता के पक्ष में रची गई हैं। वे सिद्ध करती हैं कि ऋषभदेव
शर्मा जन-मानस के कवि हैं। ऐसे समय में, जब कविता के विषय सीमित होते जा रहे हैं और
भाषा में एकरूपता बढ़ती जा रही है, इन कविताओं का पाठ एक सुखद अनुभव प्रदान करता है।”1
यह कथन प्रो. ऋषभ की काव्य-दृष्टि और मानवीय
संवेदना का सटीक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। उनकी कविताएँ केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम
नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्यों और जीवन-सत्य की प्रभावशाली अभिव्यक्ति
हैं।
इसी क्रम में उनकी चर्चित कविता ‘कुत्ता-गति’
मनुष्य की आत्मचेतना और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य करती है। कविता के आरंभ
में मनुष्य ईश्वर से विनम्रतापूर्वक प्रश्न करता है—
“प्रभो!”
तुम्हारे कुत्तों ने बहुत सताया है मुझे
जाने कहाँ से निकल कर चुपचाप
चलने लगते हैं बचपन से ही मेरे साथ-साथ
कभी आगे कभी पीछे’।
****
और फिर मनुष्य की परिस्थिति का भयावह हो
उठना कुछ ऐसे–
‘मुझे तैरना नहीं आता
पानी भरता चला जाता है
मेरे मुँह में
नाक, कान, आँख में
मेरे भीतर भौंकने
लगते हैं हजारों कुत्ते एक साथ’
****
इस भयावह परिस्थिति के बाद मनुष्य का ईश्वर
से यह प्रश्न करना कि-
‘यही कुत्ता-गति होनी थी मेरी
तो मुझे मानुष-देह क्यों दी थी भला’?2
एक ही कविता में मनुष्य-जीवन की तीन महत्त्वपूर्ण
घटनाओं का चित्रण करते हुए कवि ने आत्मसंघर्ष, नैतिक पतन और सामाजिक यथार्थ की गहन
पड़ताल की है। उनकी दृष्टि केवल घटनाओं के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे उन परिस्थितियों
और मूल्यों का भी विश्लेषण करते हैं जो मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं। यही कारण
है कि उनकी कविता पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है तथा समकालीन समाज की विसंगतियों
पर गंभीरता से विचार करने का अवसर प्रदान करती है।
प्रो. ऋषभदेव शर्मा की कविताओं का मूल स्वर
मानवता, करुणा और लोकमंगल की भावना है। वे मनुष्य और समस्त सृष्टि के प्रति गहरी संवेदना
रखते हैं। उनकी कविता ‘दुआ’ में व्यक्त यह प्रार्थना उनके व्यापक मानवतावादी दृष्टिकोण
को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करती है—
‘ओ पिता!
जब-जब जन्म दो मुझे
तो भले ही विस्तार न देना
या भले ही गहराई न देना
पर देना अवश्य
चुल्लू भर मीठा पानी
जिसमें कम से कम एक बार
अपनी चोंच डुबोकर तृप्त हो सके
कोई तो एक नन्ही-सी चिड़िया।’3
यह प्रार्थना केवल मनुष्य के लिए नहीं,
बल्कि समस्त जीव-जगत के प्रति कवि की करुणा और सह-अस्तित्व की भावना का सशक्त प्रतीक
है। यही व्यापक मानवीय चेतना उन्हें संपूर्ण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का कवि सिद्ध
करती है।
साथ ही, प्रो. ऋषभ की कविता सामाजिक और
राष्ट्रीय सरोकारों से भी गहरे स्तर पर जुड़ी हुई है। हिंदी के सशक्त कवि और भारत की
राजभाषा के सजग विचारक होने के कारण वे देश की वास्तविक समस्याओं से प्रत्यक्ष रूप
से परिचित हैं। उनकी कविताएँ केवल सौंदर्यबोध की वाहक नहीं हैं, बल्कि अन्याय, विसंगतियों
और सामाजिक विडंबनाओं के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध का स्वर भी हैं। वे स्पष्ट शब्दों
में आह्वान करते हैं—
‘अब न बालों और गालों की कथा लिखिए,
देश लिखिए, देश का असली पता लिखिए।
एक जंगल, भय अनेकों, बघनखे, खंजर,
नाग कीले जाएँ ऐसी सभ्यता लिखिए।
शोरगुल में धर्म के, भगवान के, यारो!
आदमी होता कहाँ-कब लापता? लिखिए।
बालकों के दूध में किसने मिलाया विष?
कौन अपराधी यहाँ? किसकी खता? लिखिए।’4
इन पंक्तियों में कवि समकालीन समाज की विडंबनाओं,
नैतिक पतन, धार्मिक आडंबर, सामाजिक हिंसा और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर तीखा प्रहार
करते हैं। उनकी कविता केवल प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि समाज को आत्मनिरीक्षण के लिए भी
विवश करती है।
कवि ऋषभदेव शर्मा की कविताओं में स्त्री-विमर्श
अत्यंत सशक्त और विचारोत्तेजक रूप में उपस्थित होता है। उनकी लेखनी अन्याय, लैंगिक
असमानता और पितृसत्तात्मक मानसिकता पर तलवार की धार की तरह प्रहार करती है। वे स्त्री
को केवल करुणा या दया के पात्र के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उसे अपने अधिकारों
के प्रति सजग, स्वाभिमानी और प्रतिरोधी व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
उनकी कविता की पंक्तियाँ—
“मैंने किताबें माँगी,
मुझे चूल्हा मिला।
मैंने दोस्त माँगा,
मुझे दूल्हा मिला।”5
—स्त्री के शिक्षा, स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय
के अधिकारों से वंचित किए जाने की सामाजिक विडंबना को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त
करती हैं।
इसी प्रकार उनकी कविता की ये पंक्तियाँ—
“कल मैंने धरती माँगी थी,
मुझे समाधि मिली थी।
आज मैं आकाश माँगती हूँ,
मुझे पंख दोगे?”6
—स्त्री की असीम संभावनाओं, उसके स्वप्नों
और उन्हें प्राप्त करने की आकांक्षा का सशक्त उद्घोष हैं। ऋषभदेव शर्मा के कवि-कर्म
की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी कविताओं की स्त्रियाँ अपनी विवशता का निरंतर विलाप
नहीं करतीं। वे अपनी शक्ति, आत्मसम्मान और अस्तित्व के प्रति पूर्णतः सजग हैं। वे पुरुषवादी
मानसिकता का निर्भीक प्रतिरोध करती हैं और स्पष्ट शब्दों में कहती हैं—
“न मैं अश्लील हूँ, न मेरी देह।
मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं;
वही तो तुम्हें जनमती है!
अश्लील है तुम्हारा पौरुष;
औरत को सह नहीं पाता।
अश्लील है तुम्हारी संस्कृति;
पालती है तुम-सी विकृतियों को!”7
इन पंक्तियों में कवि ने स्त्री-देह के
वस्तुकरण, पुरुष-अहंकार तथा विकृत सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों पर तीखा प्रहार किया
है। यहाँ स्त्री आत्मगौरव और प्रतिरोध की सशक्त आवाज़ बनकर उभरती है।
विगत 36 वर्षों में दक्षिण भारत में रहते
हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने हिंदी, भारतीय समाज और विश्व-मानवता से जुड़े प्रश्नों पर
निरंतर लेखन किया है। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या दक्षिण भारत, विशेषकर
तेलुगुभाषी समाज, उनके साहित्य को पढ़ता और समझता है? इसका उत्तर निस्संदेह ‘हाँ’ है।
श्रेष्ठ साहित्य भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे होता है, इसलिए संवेदनशील पाठक उसे
पूरे मनोयोग से ग्रहण करते हैं।
इसी तथ्य का प्रमाण उनकी कृतियों के विभिन्न
भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद हैं। उनकी कृति ‘प्रेम बना रहे’ का तेलुगु अनुवाद जी.
परमेश्वर द्वारा ‘प्रेम इला सागिपोनी’ शीर्षक से किया गया है। डॉ. भागवतुल हेमलता ने
भी उनके इसी कविता संग्रह का ‘प्रिये चारुशीले’ नाम से तेलुगु रूपांतरण किया है। इसी
प्रकार उनके कविता-संग्रह ‘देहरी’ का राजस्थानी अनुवाद डॉ. मंजु शर्मा द्वारा किया
गया है। ये अनुवाद इस बात के साक्ष्य हैं कि ऋषभदेव शर्मा का साहित्य भाषाई सीमाओं
का अतिक्रमण कर व्यापक भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर
चुका है।
निष्कर्षतः, प्रो. ऋषभदेव शर्मा केवल एक
प्रतिष्ठित साहित्यकार या शिक्षक ही नहीं, बल्कि हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय
मूल्यों के सजग संवाहक हैं। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान, संवेदना, कर्मनिष्ठा और सृजनशीलता
का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता है। उनका काव्य मानवता, सामाजिक उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय
चेतना और नैतिक मूल्यों का सशक्त दस्तावेज़ है। निस्संदेह उनका साहित्य और उनका जीवन
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, चिंतन और मानवीय मूल्यों का अक्षय स्रोत बना रहेगा।
संदर्भ सूची
1. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
आवरण
पृष्ठ
2. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
पृष्ठ
संख्या- 33-34
3. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
पृष्ठ
संख्या- 37
4. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
पृष्ठ
संख्या- 43
5. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
पृष्ठ
संख्या- 38
6. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
पृष्ठ
संख्या- 38
7. इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
पृष्ठ
संख्या- 59
संदर्भ
पुस्तक
इक्यावन
कविताएँ,
लेखक-ऋषभ
देव शर्मा
चयन
एवं प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा
ISBN- 978-93-92439-23-0
प्रथम
संस्करण- सन् 2023
प्रकाशक-
साहित्य रत्नाकर
कानपुर-208017
उत्तर प्रदेश
***
डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद



बेहद अर्थपूर्ण अनुपम प्रस्तुति में ऋषभ शर्मा जी के समस्त साहित्य के साथ उनका सही परिचय दिया है. उनके लेखन, शैली वि तेवरों से मैं परिचित हूँ
जवाब देंहटाएंबहुगुणि व्यक्तित्व के मालिक हैं
हार्दिक बधाई सुपर्णा जी वि ऋषभ देव जी को
देवी नागरानी
आभारी हूँ।
हटाएंमेरा पहला संपर्क डॉ ऋषभदेव शर्मा जी से एक पड़ोसी के रूप में हुआ। इस बात को छे वर्षों से अधिक का समय हो चुका है। मैं इन वर्षों में उनके साहित्य के बारे में पूर्ण रूप से नहीं जान पाया हूँ। जितना जानता जा रहा हूँ लगता है अभी तो कुछ भी नहीं जानता। एक जीवन कम है उन्हें जानने के लिए। मैं तो इसी बात से प्रसन्न रहता हूँ कि वे मुझे अपना अनुज मान असीम प्रेम देकर मेरी हर रचना बड़ी आत्मीयता से सुन उसका दिल से प्रचार प्रसार करते हैं। जब भी मिलते हैं कहते हैं, "प्रेम बना रहे। "
जवाब देंहटाएंरवि वैद
आपकी मैत्री मेरी निधि है, प्रिय भाई!
हटाएंऋषभ विलक्षण व्यक्तित्व के धनी हैं 🙏 आत्मीयता, स्नेह तथा विद्वत्ता का अद्भुत सम्मिश्रण 🙏 उनका सान्निध्य प्राप्त करना देवाशीष से कम नहीं है 🙏🌸🧿 सुपर्णा जी को इस सुंदर आलेख के लिए बधाई 🎉
जवाब देंहटाएं- डॉ. रक्षा मेहता
शुभाशीष!
हटाएंशब्द सृष्टि और डॉ. सुपर्णा मुखर्जी दोनों का धन्यवाद।
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