सोमवार, 31 अगस्त 2026

व्यक्ति विशेष-विशेष व्यक्तित्व


क्रांति वीर चंद्र सिंह उर्फ सुराजी बाबू

इंद्र कुमार दीक्षित

भारत में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जनता की ओर से प्रबल विरोध सर्व प्रथम 1957 से शुरू हुआ जिसे अंग्रेज परस्त इतिहासकारों ने सिपाही विद्रोह (sepoy mutiny)  कहकर हल्का और सीमित करने का प्रयास किया। परन्तु वास्तव में यह केवल कुछ सैनिकों का आक्रोश न होकर देश की जनता के हृदय में अंग्रेजी दासता से  मुक्ति की धधक रही ज्वाला का आकस्मिक विस्फोट था जिसे आगे चलकर भारत की स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम की संज्ञा दी गई।

           इससे पूर्व अंग्रेजी सत्ता लोलुपता का प्रतिरोध प्रभावित राजे रजवाड़ों ने निजी स्तर पर अथवा अन्य राजाओं के साथ मिलकर किया। इनमें आम जनता की भागीदारी न के बराबर थी। इसीलिए अंग्रेजों की फूट डालो राजकरो की नीति के आगे छोटे मोटे  प्रतिरोध प्रतिफलित न हो सके पर 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष

की चिनगारी और भारत के रण बांकुरों के बलिदान का ताप  ब्रिटिश संसद तक पहुंचाए वह भारत को लेकर सचेत हो गई। संग्राम पर काबू पाने के पश्चात इंग्लैंड की महारानी ने भारत में शासन की बागडोर अपने हाथों में ले लिया, शासन में अनेक सुधारों की घोषणा किया  पर 1857 की लगी आग बुझ न सकी। सन 1885 में मुंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, गुजरात के बैरिस्टर मोहन दास करम चंद गांधी  का ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय मूल के व्यापारियों के अधिकारों के लिए  कई वर्षों तकअहिंसक संघर्ष  और  भारत आगमन के  क्रम में चंपारण यात्रा  एवं किसान आंदोलन के रूप में आजादी की यह आग धधकती ही गई। चौरी चौरा कांड, जलियाँवाला बाग कांड, नमक आंदोलन  ,भारत छोड़ो आंदोलन  क्रांतिकारी संघर्ष में हजारों के बलिदान तथा लंबे दमन चक्र के  बाद अंततः 15 अगस्त 1947 का सपना साकार हुआ,परन्तु जिन क्रांतिवीरों ने  देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया उनमें से

अधिकांश का उल्लेख नहीं हो पाया और वे गुमनाम ही रह गए। उन्हीं क्रांति वीरों में देवरिया जनपद के भाटपार रानी तहसील के बनकटा प्रखंड  से एक प्रमुख नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  स्व. राम चंद्र सिंह बघेल का है जिनको  जवार के लोग  प्यार से चन्दर बाबू उर्फ सुराजी बाबू  के नाम से बुलाते थे।

              बाबू चंदर सिंह का जन्म पहली जनवरी 1898 को भाटपार रानी क्षेत्र के अहिरौली बघेल गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम बमबहादुर सिंह  जो एक किसान और माँ धार्मिक प्रवृत्ति की दयालु महिला थीं।इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक विद्यालय में हुई।बाल्यावस्था से ही बाबू चंदर सिंह अत्यंत निडर और साहसी प्रवृत्ति के थे। स्वतंत्र स्वभाव और इनकी स्वतंत्रता प्रियता के चलते गाँव के लोग इन्हें सुराजी बाबू कह कर बुलाते थे। सन 1922 में हुए चौरी चौरा कांड के बाद अंग्रेजों ने जो क्रूरतापूर्ण दमन चक्र चलाया उससे नाव युवक चंदर सिंह के मन में विद्रोह की चिंगारी फूट पड़ी।

  जिले में गांधी जी के आगमन तथा उनके  व्यक्तित्व और विचारों  से प्रभावित होकर बाबू चंदर सिंह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े तथा पढ़ाई लिखाई छोड़ देश सेवा का रास्ता चुन लिए। वे महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन के समर्थक जरूर थे लेकिन वे सोचते थे कि केवल अहिंसा के रास्ते चलकर आजादी नहीं मिलनेवाली।उन्होंने आसपास के गांवों से क्रांतिकारी विचारधारा रखनेवाले नवयुवकों को संगठित किया और 1938 में भाटपार रानी रेलवे स्टेशन के निकट कटाई टिकट गाँव में रेल लाइन उखाड़कर रेल आवागमन को कई दिनों तक के लिए बाधित कर दिया। इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार ने उन्हें खतरनाक क्रांतिकारी घोषित कर  उनपर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। गिरफ्तारी से बच ने  के लिए  बाबू चंदर सिंह घर छोड़कर फरार हो गए और भेष बदल कर दूर दराज की रिश्तेदारियों में छिप छिपकर रहने लगे। सन 42 के भारत छोड़ो आंदोलन में अचानक प्रगट हुए और ज्वार के सैकड़ों लोगों को जुटा कर जिनमें प्रमुखत : विश्वनाथ सिंह, रामलखन सिंह बघेल राधाकृष्ण सिंह बघेल आदि साथियों के साथ  रातशिया स्थित अंग्रेजों के  अफीम कोठी पर धावा बोल कर उसे लूट लिया। उल्लेखनीय है कि इनके नेतृत्व में रतशिया कोठी को लूटने के लिए जब जवार का जन सैलाब उमड़ा तो उस समय अंग्रेज अफसर बर्कले  की पत्नी और उनकी दो बेटियाँ भयभीत होकर कोठी से बाहर निकल आईं ,जब भीड़ के लोग उनको मारने दौड़े  तब तक बाबू चंदर सिंह की नजर उनपर पड़ी और दहाड़ कर बोले कि “स्त्रियों  पर हमला करना हमारी भारतीय संस्कृति के खिलाफ है, यत्र न्यायस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताइनपर कोई हाथ नहीं उठाएगा।” चंद्र बाबू की दहाड़ सुनकर  आक्रोशित भीड़ पीछे हट गई और उन्होंने तत्काल अंग्रेज महिलाओं को सुरक्षित निकालकर तांगे पर बैठाया और निकट स्थित प्रतापपुर शुगर मिल की अंग्रेज कोठी पर भेजवा दिया।

        रातशिया कोठी लूटकांड में बाबू चंदर सिंह और उनके सहयोगियों पर लूट का मुकदमा चला।सरकार बनाम चंदर सिंह के के मुकदमें में बचाई गई इन महिलाओं की गवाही से प्रभावित होकर लाइन उखाड़ने और लूट के दोहरे मुकदमें में फांसी की सजा देने के बजाय 34 वर्ष तक के आजीवन कारावास का दंड दिया। चार साल की सजा भोगने के बाद जब देश आजाद हुआ तो अन्य कैदियों के साथ इन्हें भी छोड़ दिया गया।

         रतशिया लूट कांड के बाद जब बाबू चंदर सिंह फरार हुए तो फरारी की अवधि में नादघाट में अपनी बहन के घर एक पखवारे तक रहे उसके बाद का समय गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजय नाथ की शरण में रहकर बिताया किंतु वहां भी खुफिया पुलिस पीछे पड़ी थी, भनक लगते ही वे  मंदिर परिसर से भाग निकले और संतकबीर नगर के चनहर गाँव में साधु के वेश में रहने लगे।उस समय इनके ऊपर सरकार ने दो हजार का इनाम घोषित कर रखा था, उस समय दो हजार रुपए का मूल्य आज के लाखों के बराबर था। कहा जाता है कि इनकी रिश्तेदारी के गाँव के ही किसी व्यक्ति ने दो हजार रुपए की लालच में मुखबिरी करके पुलिस को सूचित कर दिया और इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस लूटकांड के बाद इनका जगह ज़मीन और घर कुर्की कर फूंक दिया गया, जिसके बाद उनकी पत्नी ने अपनी दो पुत्रियों के साथ अनेक प्रकार के कष्ट काटती हुई चार वर्षों तक  झोपड़ी में गुजारा किया।

     गाँव के लोगों का कहना है कि सुराजी बाबू बहुत दयालु और दानी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे ,वे मजलूम ,गरीब और असहाय लोगों की मदद के लिए बराबर तत्पर रहा करते थे। आजादी मिलने के बाद जेल से छूटकर  जब वे गाँव में रहने लगे तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते सरकार ने इन्हें नैनीताल में 25 एकड़ भूमि दिया जिसे उन्होंने संत विनोबा जी को उनके भूदान आंदोलन से प्रभावित होकर निर्धनों के लिए दान दे दिया।इस कार्य में उनकी पत्नी भी इनसे बढ़ चढ़ कर थीं।1962 में चीन भारत युद्ध के समय जब सुराजी बाबू की पत्नी मतुरना देवी को पता चला कि पति सुराजी बाबू ने सोने की अंगूठी  सुरक्षा कोष में दे दिया तो उन्हों ने भी अपने सारे गहने उतारकर तहसीलदार सलेमपुर के माध्यम से  भारत सरकार के सुरक्षा कोष में दान कर दिया। गाँव के लोग बताते हैं कि प्रतिवर्ष जाड़े में  चंदर बाबू स्वयं गाँव के संपन्न लोगों को प्रेरित करके निर्धन ,बीमार और जरूरतमंद लोगों को खाने पीने की चीजें,कंबल और दवाइयाँ बंटवाते थे।सनातनी हिंदू होते हुए भी उन्होंने कभी हिन्दू,  मुसलमान ,ऊंच नीच का भेदभाव  नहीं बरता।  सुराजी बाबू जैसे क्रांतिवीरों के नाम  का उल्लेख भले ही स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में औपचारिक रूप से  हुआ हो या न हुआ हो,परन्तु  वे अपने   उत्कट देश प्रेम और उज्जवल चरित्र के लिए  जनता के हृदय में युगों युगों तक विराजमान रहेंगे।

     ( आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में   डॉ अरुणेश नी रन द्वारा संपादित पुस्तक उत्तर प्रदेश का स्वतंत्रता संग्राम देवरिया  में  मेरे संदर्भ से  प्रकाशित आलेख)

    अन्य संदर्भित स्रोत :

1~ एडवोकेट रणविजय सिंह बघेल,अहिरौली बघेल ,भाटपार रानी।

2~  सुराजी बाबू के निकटस्थ श्री सुरेश सिंह,निवासी ग्राम अहिरौली बघेल से टेलीफोन पर हुई बातचीत।

3~ रतशिया कोठी लूटकांड में सुराजी बाबू चंदर सिंह

  के दो साथियों विश्वनाथ सिंह और राम लखन सिंह बघेल

के विषय में ग्राम वासियों से प्राप्त विवरण।

4~ ‘देवरिया अतीत से वर्तमान तक’  पुस्तक ,संपादक डॉ अरुणेश नीरन में देवरिया जनपद और स्वतंत्रता आंदोलन आलेख ( पृष्ठ सं .432).



इंद्र कुमार दीक्षित

5/45 मुंसिफ कालोनी ,रामनाथ देवरिया

जनपद देवरिया ( उ . प्र.) 274001

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! दीक्षित सर् ! आप की भी उपस्थिति इस अंक में हैं, बड़ा अच्छा लगा। आसपास के भूले-बिसरे जीवन्त चरित्रों का उद्घाटन भी साहित्य के लिए बड़ा रचनात्मक अवदान है,जो आपके द्वारा सम्पन्न होता है। बधाई। नमस्कार

    जवाब देंहटाएं
  2. शशिबिन्दु नारायण मिश्र

    जवाब देंहटाएं
  3. नव जानकारी देता आलेख, आभार

    जवाब देंहटाएं

अगस्त 2026, अंक 74

  शब्द-सृष्टि अगस्त 2026, अंक 7 4   दिन कुछ ख़ास है! – परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की ओर से...... – गोस्वामी तुलसीदास : पहुँच जिनकी जन-जन...