1.
समझ
गई मैं सावन आया
डॉ.
अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश
भले न
गिरती बूँदें प्यारी ।
दिखे
न नभ में बदरी कारी ।।
चलें नहीं
मदमस्त हवाएँ ।
शांत
खड़ी हों पुष्प लतायें ।।
द्वारे
से बिटिया ने बुलाया ।
समझ
गई मैं सावन आया ।।
शांत
पड़ा था घर का कोना ।
लगता था
सब सूना सूना ।।
खड़ी अकेली
द्वार निहारूँ ।
हर
खुशियाँ बिटिया पे वारूँ ।।
जब
आने का संदेशा आया ।
समझ गई मैं
सावन आया ।।
जब
से घर में बिटिया आयी ।
समझो
तबसे खुशियाँ छाईं ।।
मधुरिम
सा संगीत है बजता ।
बिना
शब्द के गीत है सजता ।।
कंगन ने जब
शोर मचाया ।
समझ गई
मैं सावन आया ।।
हर
कमरे में
बिटिया चहके ।
हाथों की
भी मेहंदी महके ।।
चूड़ी की
झंकार तो देखो ।
पीहर का ये प्यार तो देखो ।।
हुई विदाई
मन भर आया ।
समझ गई मैं
सावन आया ।।
2.
क्यों
ऐसा सावन होता है
जब
घिरे बदरिया सावन की ।
खिलती
हैं कलियाँ आँगन की ।।
फिर
याद तुम्हारी आती है ।
चितवन
मेरी शरमाती है ।।
कंगन
चूड़ी पायल झुमके ।
सब भेद खोलते हैं मन के ।।
मन बरबस
पावन होता है ।
क्यों ऐसा
सावन होता है ।।
पुरवाई ठंडी
चलती है ।
दिन-रात
कलेजा छलती है ।।
उस
पर उफ़ सावन के झूले ।
कैसे सजनी
उनको भूले ।।
मोती ऐसी
झरती बूँदें ।
कोई
कब तक अखियाँ मूँदे ।।
मन धीरज अपना खोता है ।
क्यों ऐसा
सावन होता है ।।
चूड़ी की
मिलती सौगातें ।
त्योहारों में
कजरी गाते ।।
हाथों की है
चूड़ी बजती ।।
काया
मन की कैसे सजती ।।
पीहर
में खुशियाँ छा जाती ।
बेटी
जब घर में आ जाती ।।
हर
पल मनभावन होता है ।
क्यों ऐसा
सावन होता है ।।
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश
जबलपुर


अति सुन्दर. ह्रदय के ह्रदय मे प्रवेश कर गई कविता
जवाब देंहटाएंवाह, सावन की शीतल फुहारों की तरह मन को भिगोती सुन्दर कविताएँ। डॉ. अनिल कुमार वाजपेयी जी को बधाई
जवाब देंहटाएं