गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

संस्मरण

केदारनाथ सिंह

इंद्रकुमार दीक्षित

कवि केदारनाथ सिंह का देवरिया से खास लगाव था। इसके दो कारण थे।एक तो यह कि वे सन पचहत्तर से पहले तक देवरिया जनपद के एक कस्बे पड़रौना जो अब कुशीनगर जनपद का मुख्यालय है, के उदित नारायण महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रहे। दूसरा यह कि उनके कुछ साहित्यिक मित्र देवरिया में रहते थे जिनसे मिलने जुलने या अपने गाँव चकिया (जनपद-बलिया) जाते समय प्राय: देवरिया होकर ही जाना पड़ता था। एक तीसरा कारण भी  देवरिया से लगाव का यह था कि उनकी मातृभाषा भोजपुरी के क्षेत्र में देवरिया और कुशीनगर दोनो आते थे। उन्हें  जब भी  अवसर मिलता भोजपुरी में बतियाने का कोई  मौका छोड़ना नहीं चाहते थे। असाध्य बीमारी में पत्नी  के चल बसने से अचानक उनका मन पड़रौना से उचट गया उन्हीं दिनों जे.एन.यू.(नईदिल्ली)से बुलावा आ जाने पर वे पड़रौना छोड़कर दिल्ली चले गये और बाद में वहीं बस भी गये। पर बड़े और व्यापक फलक पर चले जाने के बावजूद वे न तो पड़रौना-देवरिया को भूल सके, न ही अपने गाँव चकिया को। किसी न किसी बहाने वे साल दो साल में इधर आने की जुगत बैठा ही लेते।और जब भी  आते तो  अपने मित्रों, कवियों और साहित्य प्रेमियों से मिले बिना नहीं जाते।

       बात साल फरवरी २०१२ की है, जब वे गोरखपुर किसी आयोजन में आये थे और उन्हें  सड़क मार्ग से देवरिया होकर चकिया अपने गाँव जाना था। गोरखपुर  से कार से देवरिया पहुँचने पर सबसे  पहले अंचल भारती के संपादक  जयनाथ मणि के यहाँ  गये। उनसे  मिलने के बाद डॉ. अरुणेश नीरन के आवास देवरिया खास मिलने पहुँचे साथ में उनके  मुँहबोले मित्रकवि गिरिधर करुण और सतीशचंद्र भास्कर भी  थे। नीरन जी के यहाँ ही रात में रुककर अगले दिन बलिया जाने का प्रोग्राम बन गया। जानकारी होने पर मैं, नागरीप्रचारिणी सभा देवरिया के नव निर्वाचित मंत्री कवि सरोजकुमार पांडेय और उद्भव मिश्र केदारनाथ सिंह जी से भेंट करने नीरन जी के घर पर पहुँच गये ।

             प्रस्ताव रखा गया कि नागरी प्रचारिणी सभा में प्रो. सिंह का एकल काव्यपाठ उसी दिन हो जाय। डॉ. नीरन जी के आग्रह पर केदारनाथ जी काव्यपाठ के लिए तैयार हो गये। फिर क्या हुआ कि आनन फानन में तीस चालीस साहित्य प्रेमियों और स्थानीय कवियों को मोबाइल पर सूचित करके  सभा में बुलाया गया। आठ फरवरी को ०३ बजे से सभा के तुलसी सभागार में काव्यपाठ आयोजित हुआ। मंचपर प्रो. केदारनाथ सिंह के साथ डॉ. अरुणेश नीरन और सभा के उपाध्यक्ष के नाते मुझे बैठना हुआ। वीणापाणि के अर्चना-वंदन के बाद सभा के मंत्री सरोज कुमार पांडेय ने स्वागत किया। कवि के परिचय-क्रम में डॉ. अरुणेश नीरन ने कहा कि केदारनाथ सिंह बेहद सहज और सरलमना कवि हैं।

इनकी कविताएँ देशकाल के विविध और व्यापक आयामों  से सार्थक संवाद करती हैं। कवि केदारनाथ जी के काव्य में ग्राम्य लोकजीवन से लेकर महानगरों के जटिल  परिवेश के जितने संवेदी बिंब देखने को मिलते  हैं उतने इनके  समकालीन शायद किसी कवि में नहीं दिखते। विश्व की अनेक भाषाओं में इनकी अनूदित कविताओं का पढ़ा जाना इन्हें  बड़ा कवि बनाता है।

          इसके बाद केदारनाथ सिंहजी मंच पर बैठकर ही लगभग एक घंटे तक एक के बाद एक कविताएँ पढ़कर सुनाते रहे। बात उन्होंने मातृभाषा भोजपुरी से शुरु की और कुछ मिनट तक भोजपुरी में ही बोलते रहे। उन्होंने कहा- 'भोजपुरी हमार घर ह आ हिंदी हमार देस। कब्बो हम घर से निकरि के बाहर देस में पहुंचि जानी आ फेर देस से घूमिघामि के अपनी घर में आजाइलें।  घर से देस आ देस से घर में आवाजाही  होत रहेला।' इसके बाद उन्होंने 'मातृभाषा 'नामक कविता हिंदी में पढ़ी--'ओ मेरी भाषा मैं  लौटता हूँ तुममें जबचुप रहते रहते अकड़ जाती है मेरी  जीभ दुखने लगती है मेरी  आत्मा----'। आगे वे नदियाँ, टूटा हुआ ट्रक, पानी  में घिरे हुए लोग, एक पारिवारिक प्रश्न जैसी आधा दर्जन कविताओं का प्रवाहमय पाठ करते रहे। काव्यपाठ  के बाद सभा की ओर से मैंने डॉ. कवि केदारनाथ सिंह, नीरन जी और उपस्थित श्रोतागण  का आभार जताया।

             अगली बार कविवर केदार जी फरवरी २०१५ में फिर देवरिया आये। दो दिन पहले कुशीनगर किसी सेमिनार में आये थे। उन्हें गोरखपुर  होकर सड़क मार्ग से गाँव चकिया जाना था। देवरिया बीच में ही पड़ता है। इस बार कवि गिरधर करुण गोरखपुर से ही उनके साथ थे। सबसे मिलते जुलते देर हो जाने से रात में प्रेस्टीज इंटर कालेज देवरिया में रुकने का प्रोग्राम बना शाम को मैं, उद्भवजी, सरोजकुमार पांडेय, सतीशचंद्र भास्कर  और दयाशंकर कुशवाहा जी उनसे  मिलने प्रेस्टीज इ.का. पहुँचे। चाय पीते वक्त सब लोगों के बीच तमाम हल्की फुल्की बातें होती रही। नागरी प्रचारिणी सभा का हालचाल और उसमें होने वाली गतिविधियों पर भी चर्चा हुई।

               केदारनाथ सिंह जी उस दिन काफी खुश और अच्छे मूड में थे। इसी क्रम में उन्होंने बताया कि उनकी और गिरधर करुण की ससुराल बिहार के एकमा स्टेशन के पास एक ही गाँव में है इसलिए इनसे मेरा सढ़ुआ नाता चलता है। इस पर देर तक हँसी होती रही। फिर उन्होंने भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद के बारे में संस्मरण सुनाते हुए कहा - कि राजेन्द्र बाबू की पत्नी राजेश्वरी देवी जी जब पहली बार राष्ट्रपति भवन में रहने दिल्ली पहुँची तो उन्हें वहाँ  गिरस्थी जमाने के सिलसिले  में अनाज फटकने वाले सूप की जरूरत पड़ी पर वहाँ  सूप कहाँ  मिले सो उन्होंने राजेन्द्र बाबू से कहलवाया कि किसी से सूप मँगवा दें। संयोग से उसी समय हिंदी की कवयित्री महादेवी वर्मा राष्ट्रपति जी से मिलने राष्ट्रपति भवन पहुँची थीं, तो सूप की चर्चा उनके सामने भी आई। बात आई गई हो गई परंतु महादेवी जी जब इलाहाबाद आईं तो उन्हें  सूप की याद आई फिर उन्होंने एकदर्जन सूप मँगवाकर रख लिया और फिर जब उन्हें दूसरी बार राष्ट्रपति जी से मिलने दिल्ली जाना हुआ तो सूपों काबंडल भी स्टेशन से टैक्सी में रखवा लिया। जब वे राष्ट्रपति भवन के गेट पर पहुँची तो वहाँ सुरक्षाबल टैक्सी मेंरखे सामानो की जाँच करने लगे इससे  महादेवी जी को बड़ी असुविधा महसूस  हुई। फिर जब वर्माजी ने सुरक्षाबलों को बताया कि यह सामान राष्ट्रपति जी की पत्नी राजेश्वरी देवी ने मँगवाया है तब उन्हें भीतर जाने दिया गया।

राजेश्वरी जी इतने सारे सूप एकसाथ देखकर आश्चर्य में पड़गईं और मुस्कराते हुए रखवा लिया। इसी रौ में संपूर्ण क्रांति के महानायक जयप्रकाश नारायण जी के बारे में संस्मरण सुनाते हुए कविवर केदारनाथ जी ने कहा -कि बलिया में उनके गाँव चकिया से जयप्रकाश नारायण का गाँव सिताब दियारा ज्यादा दूर नहीं परंतु वह गंगा के दियारा क्षेत्र में पड़ता है। उस गाँव में सत्ताइस मजरे(टोले) हैं जो कुछ-कुछ दूरी पर बसे हैं, उन दिनों ये मजरे जयप्रकाश बाबू के परिवार के लोगों की जमीदारी में थे। परंतु आजादी  के बाद जमीदारी प्रथा टूटने परजय प्रकाश जी ने अपना पुश्तैनी घर और बगीचे की जमीन छोड़कर बाकी सारी जमीन गरीबों  में बाँट दिया। देश के कोने-कोने की यात्रा से लौटने के बाद जय प्रकाश जी दियारा के अपने गाँव जरूर आते और अपनी पत्नी प्रभावती देवी के साथ कुछ दिन गाँव की अपनी बिखरी में बिताते थे।

केदारनाथ जी ने बताया कि एकबार वे अपने लड़के के साथ जयप्रकाश बाबू से मिलने साइकिल से सिताब दियारा पहुँच गये। उनके बखरी से कुछ घर पहले एक दर्जी की दुकान पर रुककर उनके घर पर होने के बारे में पूछा तो दर्जी ने बताया - अभी  तो वे सुबह दुकान की तरफ आये थे देख लीजिए घर पर ही होंगे। केदारनाथ जी जब उनके घर पहुँचे तो देखा कि जय प्रकाश बाबू बरामदे में ही एक आराम कुर्सी पर लेटे हुए थे। केदार जी ने अपना और बेटे का परिचय देते हुए बताया कि वे दोनो उनसे  मिलने के लिए ही आये हैं। जय प्रकाश बाबू ने दोनों को पास पड़ी कुर्सियों पर बैठने का संकेत करते हुए अंदर चले गये और थोड़ी देर बाद एक हाथ में पेड़े से भरा कटोरा और दूसरे हाथ में पानी भरा जग उठाये आये और पास पड़े टेबल पर रखते  हुए बोले - लो बेटे खाओ, ये पेड़े मैं महाराष्ट्र से लाया हूँ। फिर देर तक गाँव जवार और देशकाल की बात करते रहे ।

जय प्रकाश बाबू इतने सरल थे कि नौकर चाकरों के होते हुए भी जलपान का पात्र् स्वयं लाये। अभी  केदारनाथ जी वहाँ  बैठे ही थे कि इसी बीच एक हट्टे कट्ठे उम्रदराज व्यक्ति बैलों की नाद में सानी देकर भिगोया हुआ हाथ लिए वहाँ आये और बोले - "का हो जयप्रकाश कब अइल ह। ढेर दिन हो गइल तोहरे साथे खइले"। जयप्रकाश जी बोले - हँहो भाई ! अच्छा त काल्हि एंहिंजे दुआर पर लिट्टी-चोखा लागी आ साथ हीं खाइल जाई।

           समकालीन विश्व कविता  के चमकते  नक्षत्र स्व. प्रो. केदारनाथ सिंह तो बेशक हमारे बीच आज नहीं हैं लेकिन उनके  साथ बिताए गये कुछ पलों की स्मृतियाँ हमारे साथ हैं जो उनका चले जाना सहज स्वीकार करने  को तैयार नहीं हैं। लगता है वे मानो सामने बैठे आजभी भोजपुरी में अपना और गाँव जवार का सुखम दुखम बतिया रहे हैं। नागरी प्रचारिणी  सभा देवरिया(उ.प्र.) उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करती है।

 


इंद्रकुमार दीक्षित

मंत्री, ना.प्र.सभा देवरिया(उ.प्र.)

पता-वार्डनं.५/४५ मुंसिफकालोनी

रामनाथ देवरिया (उत्तरी) देवरिया (२७४००१)

 

कविता


सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

सूरज संग स्त्री का नाता 

स्त्रियाँ

चाहती थीं

अपने जीवन से बुहार दें

सारे अवांछित

धूल-कण और

फेंक आएँ किसी चौराहे पर,

 

जहाँ हफ्ते भर के

पुराने टोटके और

नींबू-मिर्ची फेंक

दिए जाते हैं

 

उड़ेल आएँ सारे दुःख

किसी कुएँ के

मुँड़ेर पर,

जहाँ वह घिसता रहे

रस्सी संग पत्थर की पीठ पर

 

किसी नदी के किनारे छोड़ आएँ

परेशानियों की गठरी

जैसे लोग छोड़ आते हैं

पूजा के सूखे फूल

 

कृष्णपक्ष की किसी रात

गली  के अँधेरे मोड़ पर

उतार आएँ

मन के सारे बोझ

और फिर एक शाम

अपनी सारी परेशानियों को

मुट्ठी में भर

चुपके से चल दी स्त्री

अचानक याद आया

माँ कहती थी

शाम ढले घर से कूड़ा

बाहर नहीं निकालते

 

तब लौट आई स्त्री

इस संकल्प के साथ कि कल सुबह ही

अपनी सारी परेशानियाँ

बाँट लूँगी सूरज संग

 

इस तरह

स्त्री का सूर्य संग

सुख-दुख के साझेदारी

का रिश्ता बन गया

जिसे रोज सुबह वह

एक लोटे जल के साथ

सौंप आती है अपने दिन भर का

हिसाब-किताब

-०-

सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

राँची


विशेष

ज्ञानपीठ पुरस्कार : भाषा-सेतु की रचना

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

उर्दू कवि गुलज़ार और संस्कृत विद्वान जगद्गुरु रामभद्राचार्य की महान शख्सियतों को मान्यता देते हुए 58वें ज्ञानपीठ पुरस्कारों (2023) की घोषणा साहित्यिक क्षेत्र से कहीं आगे तक प्रतिध्वनित होने वाली परिघटना है। भाषाई तनावों और बढ़ते विभाजनों से भरे समकालीन माहौल में, इस संयुक्त मान्यता का महत्व व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक है। यह शब्दों से बना एक पुल है, जो हमें भाषा और साझा सांस्कृतिक विरासत की एकीकृत शक्ति की याद दिलाता है।

गुलज़ार का नाम भावपूर्ण कविता और गहन गीतों का पर्याय बन चुका है, जिन्होंने कई पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित किया है। उनका काव्य भाषिक, सामाजिक या धार्मिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना दर्शकों को प्रभावित करता है। ठेठ देसी सौंदर्यबोध और कथन की निजी शैली उन्हें उच्च कोटि का भारतीय कवि बनाती हैं।

अपनी अद्भुत मेधा और आध्यात्मिक चिंतन के लिए प्रसिद्ध जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने अपना जीवन संस्कृत और संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर रखा है। विविध शैलियों को शामिल करते हुए उनका विपुल साहित्यिक अवदान शास्त्रीय ज्ञान और लोकमानस के बीच की दूरी को पाटता है।

गुलज़ार एवं रामभद्राचार्य

इन दो अनुकरणीय शख्सियतों को दिया गया पुरस्कार, केवल व्यक्तिगत स्वीकृति नहीं, बल्कि एक दूरगामी बयान है। यह विविध भाषाओं और परंपराओं के अंतर्निहित मूल्य पर जोर देता है, हमें याद दिलाता है कि भारत का सांस्कृतिक ताना-बाना अनेक बहुरंगी धागों की खूबसूरत बुनावट का परिणाम है। संस्कृत और उर्दू साहित्य की इन विभूतियों को एक साथ दिया जाने वाला यह सम्मान उस ओछी सियासत के मुँह पर तमाचा है जो दिन-रात भाषा-भिन्नता के नाम पर इस महादेश को परस्पर विरोधी टुकड़ों में बाँटने की साज़िशें रचा करती है।

बढ़ती भाषाई चिंताओं और कुछ भाषाओं को दूसरों पर प्राथमिकता देने के प्रयासों से बोझिल राष्ट्रीय परिदृश्य में, ज्ञानपीठ समिति का यह निर्णय शीतल-मंद-सुगंध बयार के झोंके की तरह  है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि भारत की पहचान उसकी भाषाई विविधता से समृद्ध ही होती है, कम कभी नहीं।

ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए गुलज़ार और रामभद्राचार्य का चयन अंतर-सांस्कृतिक संवाद और समझ के महत्व को रेखांकित करता है। अलग-अलग भाषाई दुनियाओं का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होने वाली ये विभूतियाँ वास्तव में एक ही सांस्कृतिक विरासत की वाहक हैं, क्योंकि दोनों की जड़ें अत्यंत उर्वर भारतीय भूमि से रस ग्रहण करती हैं। इनका साहित्य एक समावेशी और जीवंत राष्ट्रीय संस्कृति का बोध कराता है। इनके अवदान की यह स्वीकृति न केवल सामयिक है,  बल्कि राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक भी है। ऐसे माहौल में जहाँ ‘दूसरे’ के प्रति संदेह और शत्रुता बढ़ती जा रही है, विविध साहित्यिक आवाजों का जश्न मनाना समावेशिता और स्वीकृति का एक शक्तिशाली संदेश देता है।

ग़ौरतलब है कि इस पुरस्कार का प्रभाव प्रतीकात्मकता के पार भी बहुत आगे तक जाने वाला है। यह ठोस कार्रवाई के लिए उत्प्रेरक के रूप में काम कर सकता है। शैक्षणिक संस्थान भाषा सीखने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए इस क्षण का लाभ उठा सकते हैं। विभिन्न भाषाओं के लेखकों की विशेषता वाले साहित्यिक कार्यक्रम और संवाद समझ और सराहना के रास्ते बन सकते हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय विविध लेखकों के कार्यों को उजागर करने वाले विशेष संग्रह तैयार कर सकते हैं, जिससे उन्हें व्यापक दर्शकों के लिए सुलभ बनाया जा सके। यानी, गुलज़ार और रामभद्राचार्य को दिए गए ज्ञानपीठ पुरस्कारों का जश्न मनाकर, हमें केवल एक पल की चमक में डूबना नहीं चाहिए। इसके बजाय, हमें भाषाई पूर्वग्रहों और मतभेदों को पाटने, समावेशिता को बढ़ावा देने और विविध भाषाओं और संस्कृतियों के धागों से बुने हुए राष्ट्रीय ताने-बाने का पोषण करने के लिए इसकी क्षमता का उपयोग करना चाहिए। 

अंततः यह कहना भी ज़रूरी है कि गुलज़ार और रामभद्राचार्य जैसी विराट प्रतिभाओं का सम्मान करके ज्ञानपीठ पुरस्कार स्वयं को सम्मानित कर रहा है!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

 

व्याकरण विमर्श

आसन्न भूतकाल

डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र

हिन्दी में तीन काल हैं – वर्तमान काल, भूतकाल तथा भविष्यत् काल।

यहाँ मैं भविष्यत् काल की बात नहीं करूँगा। सिर्फ वर्तमान काल तथा भूतकाल की बात करूँगा।

वर्तमान काल तथा भूतकाल की पहचान क्या है?

सत्ताबोधक या अस्तित्वबोधक ‘होना’ क्रिया के है, हैं, हूँ, हो रूप वर्तमान काल की पहचान हैं तथा था, थे, थी, थीं रूप भूतकाल की पहचान हैं।

जिस वाक्य के अंत में है हैं हूँ हो में से कोई क्रिया हो, तो समझिए वह वाक्य वर्तमान काल का है।

ऐसे ही, जिस वाक्य के अंत में था थे थी थीं में से कोई क्रिया हो, तो समझिए वह वाक्य भूतकाल का है।

अब इनके उपभेद की बात करते हैं।

मुख्य क्रिया के अंत में ता ते ती में से कोई प्रत्यय लगा हो तो ऐसे क्रियारूप क्रिया की अपूर्णता का बोध कराते हैं – पढ़ता लिखता देखता सुनता

मुख्य क्रिया के अंत में ता ते ती में से कोई प्रत्यय लगा हो और सहायक क्रिया के रूप में है हैं हूँ हो में से कोई हो तो उसे ‘अपूर्ण वर्तमान काल’ कहेंगे -

पढ़ता है/पढ़ते हैं/पढ़ते हो/पढ़ता हूँ/पढ़ती है/पढ़ती हो/पढ़ती हैं।

मुख्य क्रिया के अंत में ता ते ती में से कोई प्रत्यय लगा हो और सहायक क्रिया के रूप में था थे थी थीं में से कोई हो तो उसे ‘अपूर्ण भूतकाल’ कहेंगे –

पढ़ता था/पढ़ते थे /पढ़ती थी/पढ़ती थीं।

मुख्य क्रिया की धातु के साथ ‘रहा रही रहे’ में से कोई एक लगा हो तथा सहायक क्रिया के रूप में है हैं हूँ हो में से कोई हो, तो उसे ‘सातत्य वर्तमान काल’ कहेंगे –

पढ़ रहा है/पढ़ रहे हैं/पढ़ रही है/पढ़ रहे हो।

मुख्य क्रिया की धातु के साथ ‘रहा रही रहे’ में से कोई एक लगा हो तथा सहायक क्रिया के रूप में है था थे थी थीं में से कोई हो, तो उसे ‘सातत्य भूतकाल’ कहेंगे –

पढ़ रहा था/पढ़ रहे थे/पढ़ रही थी/पढ़ रहा थीं।

मुख्य क्रिया के अंत में आ ए ई में से कोई प्रत्यय लगा हो और सहायक क्रिया के रूप में है हैं हूँ हो में से कोई हो तो उसे ‘पूर्ण वर्तमान काल’ कहेंगे -

मैंने उपन्यास पढ़ा है/ मैंने दो उपन्यास पढ़े हैं / मैंने कहानी पढ़ी है/ मैंने दो कहानियाँ पढ़ी हैं /

मुख्य क्रिया के अंत में आ ए ई में से कोई प्रत्यय लगा हो और सहायक क्रिया के रूप में था थे थी थीं में से कोई हो तो उसे ‘पूर्ण भूतकाल’ कहेंगे -

मैंने उपन्यास पढ़ा था/ मैंने दो उपन्यास पढ़े थे/ मैंने कहानी पढ़ी थी/ मैंने दो कहानियाँ पढ़ी थीं।

हिन्दी में एक ऐसा भी प्रयोग आता है, जिसमें है हैं, हूँ हो या था थे थी थीं में से कोई क्रिया नहीं होती। तब प्रश्न उठता है कि ऐसे वाक्यों को वर्तमान काल में रखें या भूतकाल में?

मैंने कहा/उसने सुना/तुमने लिखा/उसने पढ़ा/हमने देखा।

ऐसे वाक्य किस काल के कहे जाएँगे? इनके साथ है हैं हूँ हो में से कोई लगा होता, तो वर्तमान काल, था थे थी थीं में से कोई लगा होता तो भूतकाल।

परंतु कुछ न लगा हो तो क्या?

इसके लिए एक रास्ता निकाला गया है। ऐसे वाक्यों का नाम ‘आसन्न भूतकाल’ रखा गया है।

 

डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र

40, साईंपार्क सोसाइटी, वड़ताल रोड

बाकरोल-388315,

आणंद (गुजरात)

 

शब्द-ज्ञान

 

डॉ. अशोक गिरि

1.

सिरका = धूप में सड़ाकर खमीर उठाया हुआ अंगूर/ ईख आदि का रस

सिर का = सिर से सम्बन्धित ----।

2.

कालखण्ड = कलेजा  (यकृत)

काल खण्ड = समय का भाग।

3.

भूतत्व = भूतपन

भू-तत्व = पृथ्वी के रचने का विज्ञान।

4.

उपमाता = उपमा देने वाला

उप-माता = सौतेली माता

5.

आजकल = इन दिनों

आज-कल = आज और कल।

6.

कुशासन = बुरा शासन  

कुश-आसन = घास का आसन।

7.

कुदान = कूदने की क्रिया

कु-दान = अशुभ अवसर पर दिया गया दान।

8.

नागिन =मादा नाग/क्रूर स्त्री  

ना गिन = गिनने को मना करना।

 

डॉ. अशोक गिरि

बी-36, बी.ई.एल. कॉलोनी,

कोटद्वार (उत्तराखण्ड)

 

 

शब्द संज्ञान

 


डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र

आजन्म शब्द का अर्थ एवं वाक्य में प्रयोग

अर्थ – कुछ मित्रों ने आजन्म शब्द के जो अर्थ बताएँ हैं, वे इस प्रकार हैं –

जन्म से, जन्म भर, जन्म से शुरू होने वाला, ज़िंदगी भर, जन्म से ही, जीवन भर, पूरे जीवन भर, जन्म से लेकर, जन्म के साथ, जब तक जिए तब तक, आजीवन, आ- का अर्थ (आरंभ) से लेकर...(अंत) तक।

आजन्म शब्द संज्ञा शब्द जन्म के साथ आ (आङ्) उपसर्ग (मूलत: अव्यय) के योग से बना है।

इसमें अव्ययीभाव समास होने के कारण पूरा शब्द (आजन्म) अव्यय है।

प्रश्न यह है कि आजन्म शब्द का अर्थ क्या है?

अर्थ करते समय कुछ लोगों ने आ उपसर्ग (अव्यय) और जन्म का अर्थ अलग-अलग किया है – जन्म से, जन्म से ही, जन्म से लेकर, जन्म के साथ।

इस प्रकार दोनों शब्दों का अलग-अलग अर्थ करना ठीक नहीं है। दोनों मिलकर एक शब्द बन गए हैं और वह भी अव्यय।

ऐसे में अर्थ पूरे शब्द का होगा। उसके घटकों का अलग-अलग अर्थ नहीं।

वास्तव में आजन्म शब्द हिन्दी में (संस्कृत का पता नहीं) अर्थ होता है आजीवन या जीवन पर्यंत।

हिन्दी में जन्म शब्द अंग्रेजी के बर्थ शब्द का पर्याय तो है ही। बल्कि वही अधिक चलता है। परंतु हिन्दी में जन्म का एक अर्थ जीवन भी है। अक्सर लोग कहते हैं – जनम (जीवन) अकारथ (व्यर्थ) गया। जनम भर (जीवन भर) तुम्हारी गुलामी नहीं कर सकता। (ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलेंगे)

आजन्म शब्द के साथ जन्म (बर्थ) का संबंध नहीं है। बल्कि जीवन का अर्थ जुड़ा है।

आजन्म शब्द का अर्थ समझाने वाले पचासों वाक्य आए हैं – फेसबुक से लेकर वॉट्सेप के चार समूहों तक। उनमें से कुछ वाक्यों की यहाँ व्याख्या/विश्लेषण करना चाहता हूँ -

वह आजन्म गरीब ही रहा।

वह आजन्म ब्रह्मचारी रहा।

उसे आजन्म कठोर कारावास में रहना पड़ेगा।

गाँधीजी आजन्म भारत की भलाई के लिए काम करते रहे।

वह आजन्म दान-धर्म करता रहा।

किशोर आजन्म विकलांग रहेगा l

मै आजन्म हिन्दी पढ़ती रहूँगी।

वह आजन्म अविवाहित रहा।

मैं आजन्म आपका आभारी रहूँगा

भीष्म पितामह आजन्म ब्रह्मचारी रहे।

इन वाक्यों में आजन्म शब्द का प्रयोग सही अर्थ (आजीवन/जीवन पर्यंत) में किया गया है।

परंतु जिन लोगों ने आजन्म का अर्थ जन्म से, जन्म से ही, जन्म से लेकर, जन्म के साथ, जन्म से शुरू होने वाला किया है, उनके वाक्य गलत हैं –

वह आजन्म अंघा है।

यह वाक्य गलत है। होना चाहिए – वह जन्म से अंधा है।

जन्म से अंधा तथा आजन्म अंधा का अर्थ एक नहीं है।

महिमा आजन्म सुन्दर है। यह वाक्य भी गलत है। जन्म से सुंदर बताने के लिए आजन्म शब्द का प्रयोग नहीं होगा।

 


डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र

40, साईंपार्क सोसाइटी, वड़ताल रोड

बाकरोल-388315,

आणंद (गुजरात)

 

अक्टूबर 2026, अंक 76

  शब्द-सृष्टि अक्टूबर 2026, अंक 76 संपादकीय – स्वागत है दीपोत्सव ! – डॉ. पूर्वा शर्मा   परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से..... – दि...