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बुधवार, 30 सितंबर 2026

काव्य

 


1.

वन्दे मातरम्

कर्मवीर सिंह

वन्दे मातरम् - वन्दे मातरम्,

वन्दे मातरम् भारती भारतम्।

विश्व की अग्रगामीधरा भारतम् ॥

 

मस्तक मुकुट हिमगिरि नग शिखा,

पद-पंकज प्रक्षालित करे जलनिधि।

सप्त नदियाँ प्रवाहित निशि वासरे,

प्राणवायु सुगन्धा सजीवन वटी।

जन्मभूमि भरत भारती भव्यता,

प्रेमभूमि ये दुष्यन्त शाकुन्तलम् ॥

 

योग का लाभकारी दिया बोध भी,

जो समूचा जगत कृतार्थ हुआ।

अहिंसा का पुजारी भी शान्ति प्रिय,

आ गया जो शरण में सुरक्षित हुआ।

मानवीय मूल्यों से सुपोषित हुआ,

सभ्यता संस्कृति का भी आदरम् ॥

 

भाषा की विविधता में भी एकता,

धर्म ग्रन्थों मतों का अनूठा मिलन।

सामूहिक उत्सवों की बिखरती छटा,

मेले पर्वों का सुखकारी आगमन।

मार्मिक वेदना का अनूठा मिलन,

मेरे देश का ये विशेषण परम् ॥

***

2.

हिन्दी भाषा

 

सबकी आशा हिन्दी भाषा,

भारत की परिभाषा है।

चिरकालिक ये पुरातनी भी,

सनातनी जिज्ञासा है॥

 

कण-कण में ये रची-बसी है,

रोम-रोम में रमी हुई।

अंग-अंग में राग-रंग में,

रक्त कणों में जमी हुई।

थमी हुई है सदा-सदा से,

जन-जन की बनी पिपासा है।

सबकी आशा हिन्दी भाषा,

भारत की परिभाषा है।

 

अनुमोदन में सम्बोधन में,

सम्भाषण में उद्बोधन में।

आद्योपान्त है सार्वभौम में,

इस सृष्टि के जड़-चेतन में।

सिरजन में है अचर-सचर के,

नियति ने इसे तराशा है॥

सबकी आशा हिन्दी भाषा,

भारत की अभिलाषा है।

 

ये संतों ग्रन्थों की वाणी,

ये सत् पन्थों की वाणी है,

देश काल के हर विप्लव की,

आगम निगम बखानी है।

क्षत्राणी के हर जौहर की,

स्वाभिमानी आशा है॥

सबकी आशा हिन्दी भाषा,

भारत की परिभाषा है।

 

उदयाचल से अस्ताचल में,

क्षितिज के हर एक सम्बल में।

दशों दिशाओं की हलचल में,

नियति के हर घर्षण बल में।

कलकल में नदियों की हरदम,

असीम जलधि की प्रत्याशा है॥

सबकी आशा हिन्दी भाषा,

भारत की परिभाषा है।

 

भौगोलिक गतिविधि में हिन्दी,

अन्तरिक्ष जलनिधि में हिन्दी।

नक्षत्रों की गणना विधि हिन्दी,

कल्प युगों की अवधि हिन्दी,

रिद्धि-सिद्धि ब्रह्मांड की है ये,

गूढ़ तथ्यों की परिभाषा है॥

सबकी आशा हिन्दी भाषा,

भारत की परिभाषा है।

***

कुण्डलियाँ

3.

हिन्दी महीने

 

एक साल में देखिये, होते बारह माह।

फागुन चैत बैसाख, शुरू करें हम राह॥

शुरू करें हम राह, जेठ साढ़ सावन मिले।

भादो असौज संग, कातक अगहन भी चले॥

‘कर्मवीर’ यह बात, सुन पूस माह का हाल।

देखो आये घूम, कुछ ही समय एक साल॥

 

तिथियाँ

 

मावस से पून्नो तलक, तिथियों का गणमान।

एक-एक कर जानिये, सहज भाव पहचान॥

सहज भाव पहचान, सीख भी सरल रहेगी।

पड़वा दोयज तीज, चौथ पाँचों छठ होगी॥

सातो आठो देख, नौमी दसमी एकादस।

दुवासी तिरोस्सी, चौदस पून्नो अमावस॥

***


कर्मवीर सिंह

जालपुर बिजनौर

सितंबर 2026, अंक 75

  शब्द-सृष्टि सितंबर 2026, अंक 7 5 संपादकीय – चलते-चलते पचहत्तर तक....... – डॉ. पूर्वा शर्मा अभिमत – ‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला ...