1.
बादल
डाल गया
शिवमोहन
सिंह
गगन
बिछाकर एक दुशाला,
बादल
डाल गया।
सूरज
की आँखों में जैसे,
काजल
डाल गया।
आग
लगाकर अंगारा तन,
ताल-ताल
में डूबा है।
खाली
मंगल कलश उठाए,
बंजारा
मन ऊबा है।
सूखा
ताल,
चमन में ताला,
पागल
डाल गया।
सूरज
की आँखों में जैसे,
काजल
डाल गया।
सात
रंग का हार गले में,
डाल
घटा कब सोती है।
मरुथल
में जंगल के सपने,
सीधे-सीधे
बोती है।
परती
की झोली में,
प्रश्नों
का हल डाल गया।
सूरज
की आँखों में जैसे,
काजल
डाल गया ।
अफवाहों
की रेत उड़ाकर,
हवा
कहाँ तक जाएगी ।
बूँद-
बूँद में घटा उतरकर,
झूमर-झूमर
गायेगी।
पाँव-पाँव
में राग सृष्टि का,
पायल
डाल गया।
सूरज
की आँखों में जैसे,
काजल
डाल गया।
***
2.
सावन
आना तुम
दादुर
झींगुर गीत सुनाते,
नूपुर
है गुमसुम ।
दिन
फुहार के मन को भाते,
सावन
आना तुम ।।
भीग
गयी है मन की माटी,
अंकुर फूटे हैं ।
जाने
को उस पार लहर के
लंगर
छूटे हैं ।
बीत
रहे अब दिन अषाढ़ के
मत
इतराना तुम ।।
दिन
फुहार के मन को भाते
सावन
आना तुम ।।
नजरों
में इठलाती बूँदें
रुनझुन
रचती हैं ।
रोम
रोम में छुअन रेशमी
सिहरन
भरती हैं ।
पुरवाई
तो पेंग भरेगी
कजरी
गाना तुम ।।
दिन
फुहार के मन को भाते
सावन
आना तुम ।।
धानी
चूनर ओढ़ धरित्री
स्वप्न
सजाएगी ।
नदिया
लेकर थाल शगुन की
जल
छलकाएगी ।
एक
हरेला पर्व मना लें,
ऐसे
आना तुम ।।
दिन
फुहार के मन को भाते
सावन
आना तुम ।।
***
3.
सावन
आया है
बूँदों
वाली छतरी में तन,
मन
हरिआया है।
मौसम
के घर गठरी लेकर,
सावन
आया है।।
व्यस्त
हुईं सब गर्म हवाएँ
सीकर
ढोने में ।
माटी
वाले हाथ लगे हैं
मोती
बोने में ।
पात-पात
को पावस ने
मल-मल
नहलाया है।
आज
बयारों ने धीरे से
पल्ला
खोला है।
हिलकोरों
के दिन आए हैं
दादुर
बोला है।
बौछारों
के पीछे-पीछे
बादल
आया है।
आँचल
बाँध सजी पुरवाई
ऊँची
पेंग भरे।
डाल-डाल
रौनक लहराई
मन-मन
मोद झरे।
अधरों
नें कजरी में दिल का
हाल
सुनाया है।
परती
में पैरा अँकुराया
धरा
सुहागन-सी।
घूम
रही घनघटा सजीली
एक
पनिहारन-सी।
झरते
मांगल गीत धरा पर
पर्व
मनाया है।
उतर
रही हैं शोख घटाएँ,
नूपुर
टूटेंगे।
हरियाली
में अरमानों के
कोंपल
फूटेंगे।
खेत-खेत
में देवालय का
रूप
समाया है।
..................सावन आया है।
***
4.
साध
अवनि की
साध
अवनि की अभी अधूरी,
घन
में प्रीत पिरोना है।
बूँद-बूँद
जल भर अंजुरी में,
धरती
में ही बोना है।
मेघ
सजीले नेह लगाकर,
द्वारा
हमारे आते हैं ।
और
यहां हम धूल-धुएँ से,
माथे
तिलक लगाते हैं।
चंद
दिनों के नौले-धारे,
फिर
मरघट का कोना है।
बूँद-बूँद
जल......
गाँव
शहर के पक्के नाले,
आस
बहा ले जाते हैं।
पथराए
नलकूप ताल सब
निर्झर
पाठ पढ़ाते हैं।
और
जलस्तर नीचे भागे
ऊपर
नैन भिगोना है।
बूँद-बूँद
जल.....
कितना
दूर हुआ है कानन,
बादल
की बौछारों से।
हरियाली
को आग लगी है,
रेती
कूल कछारों से ।
ऋतुओं
का बरताव नियति का
टूटा
एक खिलौना है।
बूँद-बूँद
जल....
कितना
मूल्य चुकाया हमने,
निर्मल
धार बहाने में।
प्राणों
की आहुति दे जाते,
पाखी
प्यास बुझाने में।
जल
का संचय जीवन संचय
कानन-कानन
सोना है।
बूँद-बूँद
जल.....
***
शिवमोहन
सिंह
देहरादून,
उत्तराखंड

