बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

खण्ड-1

 


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‘रामायण’ और ‘महाभारत’ : एक विरासत

भारतीय ज्ञान के अमर कोष समान ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ दोनों भारतीय मनीषा के वे ग्रंथ हैं जिसने विगत ढाई-तीन हजार वर्षों से हमारे सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन को गढ़ा है।

डॉ. निधि सिन्हा के शब्दों में – “रामकथा भारतीय संस्कृति में लोकमंगलकारी आदर्शों को प्रस्तुत करती है।.... अमर गाथा रामकथा हमारी अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। महर्षि वाल्मीकि से लेकर आज तक अनेक विद्वानों ने इस कथा का गान किया है। भारत में ही नहीं, विदेशों में भी रामकथा पूर्णत: व्याप्त है, श्रद्धेय है। रामकथा हमारे लोक जीवन से ओतप्रोत अमरकथा है, जिसमें लोकजीवन अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ मूर्त हुआ है। इसमें लोकसंग्रह की भावना की प्रमुखता है। इस कथा में कर्म के उज्ज्वलतम रूप की प्रतिष्ठा हुई है जो मनुष्य के हृदय को सहज ही प्रभावित करती है।” [लोक मानस में राम संस्कृति भाग-दो, वाणी प्रकाशन, पृ.630]

भारतीय साहित्य का ‘रामायण’ रूपी यह आदि आर्ष काव्य ज्ञान, भक्ति, दर्शन, समाज-संस्कृति के आदर्श व मूल्यों की अमूल्य निधि है। इस काव्य की कथा तथा इसके पात्र विश्व समाज के समक्ष ज्ञान-दर्शन तथा मनुष्य जीवन के संस्कार-कर्म-आचार-व्यवहार के महान उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व राजनीतिक विषयों से संदर्भित ‘महाभारत’ विश्व का सबसे बृहद् काव्य है। विषय-वस्तु के वैविध्य व उसके विस्तार के लिहाज़ से सर्वाधिक समृद्ध इस काव्य के बारे में कहा गया है कि ‘यन्न  भारते तन्न भारते’ अर्थात् जो यहाँ (महाभारत) निरूपित-चित्रित है वह कहीं न कहीं अवश्य मिल जाए‌गा और जो यहाँ नहीं है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलेगा। “धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षेच भरतर्षम् चरिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित ।” महाभारत को पंचम वेद कहा गया है। इसे भारत के सांस्कृतिक विषयों का विराट कोश तथा आचार की संहिता के रूप में देखा गया है। विषय वस्तु की विशालता और वैविध्य को लेकर डॉ. जे. आर. बोरसे का मत देखिए – “महाभारत संस्कृत साहित्य का एक बृहद् विश्वकोश है। वेदव्यास जी ने स्वयं अपनी संहिता के विषयों का निरूपण ब्रहमा जी से किया था, जो इस प्रकार है – इसमें वैदिक और लौकिक सभी विषय हैं। इसमें वेदान्त सहित उपनिषद, वेदों का क्रिया विस्तार, इतिहास, पुराण, भूत, भविष्य और वर्तमान के वृतांत, बुढ़ापा, मृत्यु, भय, व्याधि आदि के भाव-अभाव का निर्णय, आश्रम और वर्णों का, धर्मपुराणों का सार, तपस्या, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी चंद्र, सूर्य, नक्षत्र और युगों का वर्णन, ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, अध्यात्म, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, देवता और मनुष्यों की उत्पति, पवित्र तीर्थ, पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन, पूर्व कल्प, दिव्य नगर, युद्ध कौशल, विविध भाषा, विविध जाति, लोक व्यवहार और सबमें व्याप्त परमात्मा का भी वर्णन है।... इसके अध्ययन से केवल तात्कालीक, सामाजिक, पारिवारिक, वैयक्तिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, शैक्षिक, भौगोलिक परिस्थितियों का परिचय ही नहीं होता; अपितु धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तत्वों का सांगोपांग ज्ञान भी प्राप्त होता है।” [स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी काव्य में महाभारत के पात्र, डॉ. जे. आर. बोरसे पृ. 68]

असल में भारतीय मनीषा, भारतीय जीवन दर्शन, भारतीय ज्ञान आदि को जानने-समझने के बहुत बड़े आधार है ये दोनों ग्रंथ । इनके अध्ययन, दोहन-मंथन से हमें ज्ञान विज्ञान का नवनीत प्राप्त होता है। महाभारत की ही कोख से जन्मी ‘भगवद्‌गीता’ भी विश्व की महान रचना, जो ज्ञान का नवनीत है। युगों-युगों से यह गीता-ज्ञान मनुष्य जीवन को हर विषय में मार्गदर्शित करता रहा है। ‘गीता’ हिन्दू धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है। गीता की रचना के बाद हिन्दू धर्म के जो भी व्याख्याता और सुधारक भारत में जनमें, उन्होंने अपनी पक्षसिद्धि के लिए गीता की व्याख्या अवश्य लिखी है। वेदों और उपनिवदों की विचारधारा स्फटिक के समान उज्ज्वल होकर गीता में प्रकट हुई।”

 

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खण्ड-1

 


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वैदिक ज्ञान साहित्य

भारतीय ज्ञान की सुव्यवस्थित रूप से प्राप्त परंपरा का प्रारंभ वैदिक ज्ञान-साहित्य से होता है । उपलब्ध इस ज्ञान परंपरा का प्रारंभिक चरण ज्ञान के स्तर, वैविध्य व परिमाण की दृष्टि से बेजोड़ रहा है। वैदिक ज्ञान साहित्य में ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद, ये चार वेद तथा ब्राह्मणग्रंथ, आरण्यक ग्रंथ तथा उपनिषद ।

‘वेद’ मतलव – ज्ञान। ‘विद्यते ज्ञायतेऽनेनेति वेदः।’ कहते हैं कि प्राचीन काल में और आज भी, समाज हो या राजनीति, भूगोल हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र, सभी के संबंध में गंभीर व गहन ज्ञान प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत यानी वेद । “वेद विश्वसाहित्य की सबसे प्राचीन रचना है। यह प्राचीनतम मनुष्य के धार्मिक और दार्शनिक विचारों का मानवभाषा में सर्वप्रथम परिचय प्रदान करता है। डॉ. राधाकृष्णन ने कहा है – वेद मानव मन से प्रादुर्भूत ऐसे नितांत आदि‌कालीन ग्रंथ हैं जिन्हें हम अपनी निधि समझते हैं। विल्सन की ये पंक्तियाँ – वेदों में हम उन सबके विषय में जो प्राचीनता के बारे में विचार करने पर अत्यन्त रोचक प्रतीत होता है, पर्याप्त जानकारी मिलती है। ... इसलिए वेद को अमूल्य निधि के रूप में माना गया है।..... वेदों को परम सत्य माना गया है। उनमें लौकिक-अलौकिक सभी विषयों का ज्ञान भरा पड़ा है।” (भारतीय दर्शन की रूपरेखा, प्रो. हरेन्द्रप्रसाद सिंहा, पृ. 32)

वेदों के और भी कई गंभीर अध्येताओं ने अपने अध्ययन में ऐसे विषयों की लंबी सूची दी है, जिन विषयों से संबंध गंभीर व विस्तृत ज्ञान इनमें निहित है। यथा ब्रह्म, ब्रह्मांड, देवता, प्रकृति, इतिहास, गणित, ज्योतिष, खगोल, भूगोल, आचार-विचार, रीति-रिवाज, धर्म आदि आदि। इस तरह भारतीय साहित्य व संस्कृति के इस प्राचीन ग्रंथों में बहुआयामी ज्ञान का वर्णन है।

शिक्षा, छन्द, ज्योतिष, निरूक्त, कल्प और व्याकरण, ये छह वेद के अंग अर्थात् वेदांग, जो वेद को समझने-समझाने, उसके सही अर्थ बताने में एक तरह से एक शिक्षक की ही भूमिका का निर्वाह करते हैं। “शिक्षा, छन्द, निरुक्त और व्याकरण असल में यही चार वेदांग हैं जिनका संबंध वेद के भाषा विषयक विज्ञान से है। किन्तु दो और विद्याओं को मिलाकर वेदांग छह कहे जाते हैं।”(संस्कृति की चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृ. 93)

वेद के इन छह अंगों को, उनके महत्व की दृष्टि से इस तरह से भी बताया गया है

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते॥

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।

तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महियते॥

अर्थात् छन्द, कल्प, ज्योतिष, निरुक्त, शिक्षा तथा व्याकरण क्रमश: वेदों के पाद, हाथ, नेत्र, कान, नाक और मुख कहा गया।  

विशेषतः आत्मज्ञान, दर्शन के साथ-साथ धर्म, पर्यावरण, साहित्य जैसे विषयों की विस्तृत चर्चा की दृष्टि से वेदों के पश्चात उपनिषदों को देखा जाता है। उपनिषदों तथा उपनिषद काल की महत्ता तथा आगे अन्य दर्शनों पर इसके प्रभाव को लेकर लेकर डॉ. रामधारीसिंह दिनकर अपनी ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक में लिखते हैं – “उपनिषद हिन्दुत्व के आधारभूत ग्रंथ हैं और उन्हें समझे बिना हिन्दुत्व को समझना असम्भव माना जाता रहा है। उपनिषदों के काल में खासकर यज्ञ का स्थान ज्ञान ले लेता है। और प्रजापति का स्थान ब्रहम। इसी युग में आकर कर्म का अर्थ विस्तृत हो जाता है। अब कर्म का अभिप्राय केवल यज्ञ न रहकर उन सारे कृत्यों से हो जाना है, जिनके कारण मनुष्य को पुनर्जन्म लेना पड़ता है। जन्मान्तरवाद और कर्मफलवाद इस युग में पूर्ण रूप से स्थापित हो गए और तब से वे केवल हिन्दुत्व के ही नहीं: बौद्धमत और जैनमत के भी आधार रहे हैं। उपनिषदों ने मोक्ष को संसार का समाधान बतलाया और यह कहा कि मोक्ष का मार्ग ज्ञान है। यह ‌सिद्धांत भी बौद्ध और जैनों ने ज्यों का त्यों ग्रहण कर किया । ज्ञान की इस युग में इतनी महिमा बढ़ी कि वर्णाश्रम और यज्ञवाद, दोनों बहुत पीछे छूट गए।” (संस्कृति की चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृ. 100-101)

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भारतीय ज्ञान परंपरा

विश्व के समक्ष अपने उदात्त विचार व उदार भाव से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के महामंत्र को रखकर, और उसे अपने सद् व्यवहार से चरितार्थ करने वाला भारतवर्ष अपनी सहज और उत्पाद्य प्रतिभा को लेकर भी पूरे विश्व में अपनी एक खास पहचान रखना है। कहते-देखते हैं कि भारत ज्ञान की भूमि । ज्ञान ही यहाँ सर्वोपरि अतः ज्ञानार्जन ही यहाँ श्रेष्ठ कर्म । इसका प्रमाण है कि यहाँ जीवन व्यवहार के हर क्षेत्र में बुद्धि-प्रतिभा ने अपार महत ग्रंथों की रचना की है।

कोई भी ज्ञान-स्पर्शित भारतीय मस्तिष्क इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं होगा कि भारतीय ज्ञान की परंपरा बड़ी सुदीर्घ, सुदृढ़ एवं विषयगत वैविध्य से काफ़ी संपन्न -समृद्ध रही है। प्रारंभ से ही इस परंपरा का उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगी विकास करते हुए उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सही समझ देना रहा है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में वेद, उपनिषद, पुराण, ब्राह्मणग्रंथ, रामायण, महाभारत, भगवद‌गीता जैसे धार्मिक-आध्यात्मिक व दर्शन ग्रंथों को सबसे पहले देखा जाता है जो भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है। “भारतीय संस्कृति का दार्शनिक पक्ष धर्म ग्रंथों में उपलब्ध होता है। वेद, शास्त्र, दर्शन, उपनिषद, ब्राहमणग्रंथ, अरण्यक, पुराण, नीति, धर्म आदि अनेक धर्म ग्रंथ हमें उस विचारधारा का अनुयायी बनाते हैं जो मानवप्राणी को आदर्शवादी, निर्मल चरित्र, कर्तव्यपरायण, सहृदय एवं संयमी बनाने में पूर्णतया समर्थ है।” (भारतीय संस्कृति के आधरभूत तत्त्व, पं. श्रीराम शर्मा, पृ. 3.135)

उक्त ग्रंथों के अतिरिक्त ज्ञान-विज्ञान के अन्य विषयों – योग, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, साहित्य, व्याकरण, विज्ञान, वाणिज्य, कलाएँ प्रभृति से संबंधी ज्ञान  व तत्संबंधी ग्रंथों तथा इनकी महत्ता-उपयोगिता को हम बराबर देखते हैं। प्राचीन भारतीय ज्ञान की आज के संदर्भ में प्रासंगिकता व महत्ता अधिक रही है। आज प्राचीन ज्ञान की आवश्कता, खासकर उस ज्ञान की जो हमें धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक संद‌र्भों से जोड़े, आदर्श-उज्ज्वल चरित्र निर्मित करें, भारतीयता, राष्ट्रीयता की भावना से भरपूर रखें। तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा के विचार से – “तकनीकी और विज्ञान का इस्तेमाल आज हिंसा के लिए हो रहा है जो गलत है। आज की 21वीं सदी को शांत व संवाद की सदी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से ही बनाया जा सकता है। इस निधि का समावेश हमें आज की आधुनिक शिक्षा में करना होगा।” ” (राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की गंगोत्री भारतीय ज्ञान परंपरा, सं. अनिल कुमार राय, पृ. 48-49)

यह ज्ञान परंपरा जैनिज़्म, बुद्धइज़्म, प्राचीन ज्ञान ग्रंथों की व्याख्याएँ-व्याख्याता, मध्यकालीन एवं आधुनिक अनेक चिंतकों-सर्जकों-शास्त्रों-ग्रंथों-पंथों-संप्रदायों-अनुसंधानों आविष्कारों से बहुआयामी रूप में अग्रसर होती रही और इसकी ख्याति-प्रसिद्धि भारत तक ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रचारित होती रही है।

हम सब जानते ही हैं कि ज्ञानार्जन तथा ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रमुख माध्यम व मंच शिक्षा और शैक्षिक संस्थाएँ हैं। ज्ञान परंपरा की तरह ही भारतीय शिक्षा प्रणाली भी बहुत ही गौरवशाली रही। “ऋग्वेद के समय से ही शिक्षा प्रणाली जीवन को नैतिक, भौतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक मूल्यों पर केंद्रित होकर विनम्रता, सत्यता, अनुशासन, आत्मनिर्भरता और सभी के लिए सम्मान जैसे मूल्यों पर जोर देती है।”

संक्षेप में, भारतीय ज्ञान परंपरा हमारे धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक ज्ञान की बड़ी ही मूल्यवान संपदा है, जो लौकिक-अलौकिक जगत, आत्मा-परमात्मा, भौतिक-अध्यात्मिक जीवन, सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों इत्यादि से हमें अवगत कराते हुए हमारी समस्याओं के समाधान के उपाय सुझाते हुए विकासपथ पर अग्रसर होने में बड़ी ही सहायक भूमिका का निर्वाह करती है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान के विकास-क्रम को लेकर एक मत देखिए – “मानव ने आदिम युग [पाषाण युग] से लेकर 21 वीं सदी के हाइपर-इलेक्ट्रोनिक युग तक निरंतर आगे बढ़ते रहने के लिए अपने द्वारा अर्जित नवीनतर ज्ञान के आधार पर, हर दिशा-क्षेत्र में उत्तरोत्तर नई/नए दिशाओं/रास्तों की खोज की। अतः मानय ने अपने विभिन्न ज्ञानानुशासनों यथा – दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, औद्योगिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक आदि क्षेत्रों को लेकर, जटिल से जटिल समस्याओं को एक नवीन / परिशोधित, परिष्कृत वर्तमान की ओर ले जाने हेतु नाना दिशाएँ चिह्नित की तथा शोध एवं गहन विमर्श को आगे ले जाने के उद्देश्य से लगातार नए संप्रेषणीय माध्यमों का, जिससे ज्ञान पुनुरुत्थान को गति मिली और नवीन ज्ञान परंपरा का आगाज हुआ।” ” (राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की गंगोत्री भारतीय ज्ञान परंपरा,सं. अनिल कुमार राय, पृ. 47-48)

वैसे भारतीय ज्ञान की शिष्ट व अभिजात्य संदर्भों से संबद्ध लिखित और शास्त्रीय-साहित्यिक परंपरा बड़ी ही प्रबुद्ध व प्रभावशाली रही है, परंतु इसी के समानांतर ‘लोक’ की और लोक में मौखिक-कंठस्थ ज्ञानपरंपरा भी अबाधित रूप से प्रवाहित रही है जो शास्त्रों-ग्रंथों-सिद्धांतों के एक विशेष अनुशासन से मुक्त और ज्यादा व्यावहारिक ज्ञान पर, अनुभवों पर आधारित रही। इस संदर्भ में हम ‘लोक’ को एक पारिभाषिक शब्द के रूप में ही देख सकते हैं, जो समाज का एक ऐसा विशिष्ट अंग या वर्ग है जो तथाकथित अशिक्षित या अर्धशिक्षित और घोर परंपराप्रिय होते हुए भी वह ज्ञान से, विशेषतः व्यावहारिक ज्ञान से शून्य नहीं होता। शिक्षा-प्रशिक्षा, शास्त्रों-पुस्तकों के ज्ञान से भले ही वह दूर हो लेकिन व्यावहरिक-अनुभवजन्य ज्ञान से वह ‘लोक’ बड़ा ही समृद्ध । पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस संबंध में बड़ी ही मायने की बात कही है “लोक का अर्थ केवल गाँव या जनपद नहीं किन्तु गाँवों और नगरों में बसी वह समस्त जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है।

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खण्ड-1

 

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ज्ञान


‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।’

–      भगवदगीता

अर्थात् संसार में ज्ञान के समान और कुछ पवित्र नहीं है।

भारतीय मेधा के अन्य महान ग्रंथों – वेद, पुराण, उपनिषद आदि में भी ज्ञान की सर्वोपरिता को स्वीकार किया गया है। असल में मनुष्य जीवन की तमाम अर्जित-विकसित उपलब्धियों में ज्ञान और विद्या की महत्ता सर्वाधिक रही है। कारण स्पष्ट है – हमारे जीवन की समस्त श्रेष्ठताओं का मूलाधार ज्ञान है। हमारे गुण, कर्म, स्वभाव संबंधी दोषों को दूर कर हमारे चरित्र को औदात्य प्रदान करने तथा ‘स्व’ के साथ-साथ समाज विकास व हमारे अंदर परहित की भावना को जगाने का काम ज्ञान ही करता है। अत: ज्ञानार्जन व ज्ञान का प्रचार-प्रसार मनुष्य का प्रथम और परम धर्म है। “ज्ञान की साधना करना और उसके अनुसार आचरण कर अपने उपार्जित ज्ञान से दूसरों का मार्गदर्शन करना ज्ञानयज्ञ कहा गया है। जिसे सर्वोत्कृष्ट बताते हुए गीताकार ने लिखा है – श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञात्ज्ञानयज्ञ: परंतपः । – हे परंतप ! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।” [उद्धृत - भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्व, पं. श्रीराम शर्मा, पृ. 3.147]

दरअसल मनुष्य की एक विशेष पहचान का मुख्य आधार ज्ञान ही है। हमारे व्यक्तित्व को निखारने, हमारे सत्कर्म- सद् व्यवहार को सक्रियता प्रदान करने में ज्ञान की महती भूमिका रही है। हम देखते हैं कि देश और दुनिया के कृती व्यक्तित्वों की ख्याति और महानता का आधार उनका ज्ञान ही था। मसलन – राम, कृष्ण, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, चाणक्य, ईसा मसीह, सुकरात, अरस्तू आदि । अपनी प्रतिभा के बलपर इन व्यक्तित्वों ने मनुष्यता का संदेश जन जन तक पहुँचाया ।

ज्ञान की महत्ता-उपयोगिता स्वयंसिद्ध है, किंतु ये भी स्मरण रहे कि ज्ञान की प्राप्ति, ज्ञान का अर्जन उतना सरल और सुलभ नहीं होता। इसके लिए आवश्यक है साधना, सत्संग, स्वाध्याय, अध्ययन, चिंतन-मनन साथ ही महात्माओं का सानिध्य, सन्मार्ग पर चलना आदि आदि, जो है बड़ा पुरुषार्थ का काम। और इस पुरुषार्थ की फलश्रुति है अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की प्राप्ति । ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अंधकार पर प्रकाश की जीत । भारतीय संस्कृति के केन्द्र में रहा यह सूत्र ज्ञान रूपी प्रकाश की प्राप्ति हेतु अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करना।

वैसे तो हम जो जानते हैं, जिसे हम समझते-पह‌चानते हैं, वह भी ज्ञान ही हैं; किन्तु यहाँ हमारी चर्चा का संबंध व उद्देश्य ज्ञान के इस अर्थ, इतने सतही और सामान्य अर्थ आशय से कुछ ज्यादा ही ऊपर और विशेष ही है। असल में हमारे अध्येय-विवेच्य विषय के संदर्भ में ज्ञान से अभिप्राय – चिंतन-मनन, अध्ययन, अनुभव, अभ्यास, ध्यान एकाग्रता से स्वयं को तथा किसी बाहरी तत्व या विषय-क्षेत्र की वास्तविक-विशेष पहचान, उसकी प्रकृति-महत्ता-उपयोगिता की सही समझ का विकसित होना तथा तत्संबंधी विशिष्ट धारणा-मान्यता-स्थापना को समाज के समक्ष रखना ज्ञान है। पर्यायता की दृष्टि से इस ज्ञान की प्राप्ति के आधार तथा इसके बुनियादी स्वरूप में मेधा, प्रतिभा, मनीषा, बुद्धि, प्रज्ञा, विद्या प्रभृत्ति शब्दों को भी देख सकते हैं।

ज्ञानी और उसके ज्ञान को लेकर सामान्यतया हम ये देखते हैं कि किसी विषय के संबंध में व्यक्ति विशेष की अपनी मौलिक समझ व दृष्टिकोण और इसे और ज्यादा अध्ययन-मनन से विकसित कर उस विषय को लेकर उस व्यक्ति की महत्वपूर्ण मान्यताएँ-स्थापनाएँ जो समाजोपयोगी होने पर समाज द्वारा स्वीकृत होती है, जो ज्ञान है। दूसरी ओर विविध स्रोतों से किसी विषय संबंधी सूचनाओं-जानकारियों के एकत्रीकरण को भी ज्ञान के अंतर्गत लिया जाता है। चाहे तो व्यक्ति के ज्ञान के संबंध में उक्त दोनों प्रकार के ज्ञान को हम क्रमशः प्रथम ज्ञान और द्वितीय ज्ञान भी कह सकते हैं। आध्यात्मिक एवं भौतिक, दोनों प्रकार के ज्ञान में इस तरह की बात कर सकते हैं।

‘स्व’ को जाने-समझे बगैर सचराचर को जानना-ब्रह्मांड को समझना, सृष्टि-समाज को पहचानना लगभग असंभव। पहले हमें हमारे भीतर के ‘स्व’ का, स्वयं का बोध जरूरी। इसके बिना तो बाहरी सत्यों का उद्‌घाटन संभव ही नहीं। महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू के शब्द हैं – स्वयं को जानना समस्त ज्ञान का आरंभ है।

यह बताने की जरूरत नहीं है कि समस्त जीवसृ‌ष्टि में, सृष्टि के करोड़ों प्राणियों में श्रेष्ठ व सबसे ताकतवर प्राणी मनुष्य है। कारण है उसके पास सोचने-विचारने की क्षमता है। उसके पास बुद्धि है। उसके पास भाषा है। आज मानव जीवन की सारी उपलब्धियाँ – दर्शन, शिक्षा, विद्या, अध्यात्म, साहित्य, व्याकरण, ज्योतिष, विज्ञान, कला, राजनीति आदि आदि सब इस बुद्धि एवं विचार-संपदा से और भाषा से उपजा है।

ज्ञान की आधारभूमि विचार ही है। कहा भी गया है कि विचारों का संचय ही ज्ञान है। लेकिन किसी विषय संबंधी विचार के लिए पहले उस विषय के प्रति-उस वस्तु के प्रति लगाव, उसके वास्तविक रूप को जानने के लिए उसके प्रति स्वयं की प्रतिबद्धता व समर्पित भाव का होना जरूरी है। परोक्ष की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव ज्यादा जरूरी। क्योंकि ज्ञान की पहचान महज तथ्यों- सूचनाओं को अलग-अलग स्रोतों से एकत्र करने तक ही मर्यादित नहीं है, अपितु इसके साथ मनुष्य की स्वयं की समझ तथा चिंतन से, उनके तर्कों से,उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता से उसकी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त बौद्धिक अनुभव से बनी-गढ़ी  महत्त्वपूर्ण धर‌णाएँ भी हैं।

मनुष्य की सकारात्मक सोच उसकी अज्ञानता को दूर करने का प्रथम उपाय है। एक रिसर्चर  के मतानुसार – “Ten minutes positive thinking counter balances all the negativities  of your whole day.”

ज्ञान के सृजन-अर्जन तथा उसके प्रयोग-उपयोग को लेकर बिल्स ने ज्ञान के मुख्यतः तीन चरण बताए हैं – 1. विकासात्मक चरण, जिसमें ज्ञान विविध प्रकार की संस्थाओं, समाजों एवं संस्कृतियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है। 2. शैक्षिक चरण, इसमें शिक्षा के माध्यम से छात्रों को ज्ञान सिखाया जाता है। 3. व्यावहारिक चरण, ज्ञान के इस चरण में अर्जित किए गए ज्ञान का प्रयोग-उपयोग वर्तमान की समस्याओं का समाधान करने में किया जाता है।

ज्ञान का क्षेत्र असीमित है। हर विषय व वस्तु ज्ञानमय है। किंतु मनुष्य का ज्ञान, बड़े से बडे ज्ञानी पुरुष का भी ज्ञान सीमित होता है। कोई और कई विशेषज्ञ हो सकते हैं, बहुज्ञ हो सकते हैं, परंतु सर्वज्ञ होना संभव नहीं है। किसी ने वैसे तो बड़ी सामान्य बात कही पर बात बड़ी सत्य कही कि हम जो जानते हैं वो बूँद के बराबर है और जो नहीं जानते वो महासागर के समान है। हाँ, हमारे यहाँ इस बारे में ईश्वर को लेकर धारणा थोड़ी अलग है। मुंडकोपनिषद् में कथन है –

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमय तयः ।

–      भगवान सबकुछ जानने वाले और सर्वज्ञ हैं।

सृष्टि (मानव संस्कृति) के उद्‌भव से वर्तमान तक मनुष्य नये-नये विषयों के ज्ञानार्जन का अभिलाषी रहा है। जीवन से जुड़े हुए धर्म, दर्शन, कला, व्याकरण, विज्ञान, वाणिज्य, ज्योतिष, भूगोल, आयुर्वेद आदि अनेकों विषयों के ज्ञान को अलग-अलग माध्यमों से व्यक्त होता रहा है। विशेषत: भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में ज्ञान की महत्ता और उपयोगिता को हमारी बाहरी भौतिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा मूलतः हमारे नैतिक, वैचारिक, आध्यात्मिक, शारीरिक-मानसिक स्वस्थता व क्षमता के विकास तथा लोकहित- लोककल्याण के संदर्भ में देखा गया है।    “ ज्ञान का लक्ष्य मनुष्य की भौतिक सुविधाओं का संवर्धन नहीं है वरन् सबके  कल्याण के लिए व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं का विकास करना है, यह वह अवस्था है, जो ज्ञान को अंतिम एवं निर्णायक रूप में व्याख्यायित करती है, भगवान बुद्ध ने इसे ‘निर्वाण’ कहा है, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं वरन् समस्त मनुष्य समाज की पीड़ाओं का निर्वाण’।” (राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की गंगोत्री भारतीय ज्ञान परंपरा,सं. अनिल कुमार राय, पृ. 17)

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अक्टूबर 2026, अंक 76

  शब्द-सृष्टि अक्टूबर 2026, अंक 76 संपादकीय – स्वागत है दीपोत्सव ! – डॉ. पूर्वा शर्मा   परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से..... – दि...