शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

कविता



बसंत राग

दुष्यन्त कुमार व्यास

पुरवा बहती धीरे-धीरे, मद्धम-मद्धम शोर करे ।

प्रियतम के आने की बतियाँ, गाकर मन में भोर करे।।

 

पीला पहनो पीला ओढ़ो ,

       और पिया की  बात करो।

पीली सरसों खेत खड़ी है,

       पिया संग में रास करो।

प्रियतम ने भेजी है पतिया,

       पीले चावल भेजें हैं।

प्राणों से प्यारी हो पगली,

       अगनित चुम्बन भेजें हैं।

 

ऋतु बदली है धीरे-धीरे,काम हृदय में ज्वार भरे।

इस कारण तो षड्ऋतुओं पर,यह बसंत अब राज करे ।।

 

पवन बसंती पीली चूनर ,

        गेहूँ की पीली  बाली ।

आज पपीहा पापी बोले,

        पिहू-पिहू करके आली।।

पत्ता-पत्ता महक रहा है,

          नवपल्लव की धूम लगी।

फगुनाहट के ढोल सुहाने,

         पिया मिलन की आस जगी।

 

पहलौठी का सूरज गोदी, और महावर पैर धरे।

बेटे की माता कहलाकर, सारे घर में राज करे।।

 

टेसू केसर से दमके तो,

      आज मदन ज्वाला भड़की।

सेमल के फूलों से जैसे ,

           कुंजों में अगनी दहकी।

महुआ गमक रहा पेड़ों पर,

             हवा नशीली हो आई।

आज पिया ने थामी बहियाँ,

             अँगिया ढीली हो पाई।

 

कंगन बाजे नथनी काँपे, कमरबंद कटि को हेरे।

कामिनियों के मन पर मनसिज, पापी बन कर राज करे।।

 

मदन चलाता पंच बाण है,

        हाथों में लेकर सायक।

कुसुमाकर के तीर मृदुल हैं,

       और कुसुम उनके वाहक।

चाह जगाता, प्यास बढ़ाता,

        लगा प्रेम की चिनगारी।

रसिक जनों के ह्रदय बींधता,

         मन्मथ देता मधु-गारी।

तृषित जनों को देकर प्याला,नयनों से वह वार करे।

भू भृंगी से चैन चुराकर,अबला सब पर राज करे।।

 

छह ऋतुएँ हैं कालचक्र की,

     करी समय की शुभ गणना।

पतझड़ को पीछे छोड़ा था,

        दिया धरा को नव गहना।

नवल पात नव कुसुम राग नव,

            नव पर नव दी फुलवारी।

नव जीवन का नया मंत्र  दे ,

               नई सृष्टि की तैयारी।

 

नव कानन में डाले झूले, नव प्यारी ज्यौं पैंग भरे।

जगे काम के सारे साथी, कुसुमाकर तब राज करे ।।

***



दुष्यन्त कुमार व्यास

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्राध्यापक(गणित)

कस्तूरबा नगर गली नंबर 6

रतलाम - मध्यप्रदेश

मुक्तक

नव संवत्सर

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

 

स्वागत हो नवागत का, है बेला हर्ष की आई

गूँजे ज्ञान की वीणा, बजे खुशियों की शहनाई

किरण कलियों से कहती है गाओ, मुस्कुराओ तुम

पताका स्नेह-सौरभ की पवन ने आन फहराई ।

 

कटें कंटक सभी पथ के, रहे निर्मूल बाधाएँ

परस्पर प्रेम के बंधन, बंधे फिर छूट न जाएँ

हो दीपित आस का दीपक, रहे उजियार हर मन में

जगमग जगमगाए जग, विजय अँधियार पर पाएँ ।।

 

 

सरस सद्भावनाओं का, हृदय को घर बनाना है

दया, ममता से, धीरज से, फिर उसको सजाना है

नवल है वर्ष, लें संकल्प, सभी कल्याण से पूरित

सभी को प्यार देना है, सभी से प्यार पाना है ।

 

विश्व बन्धुत्व थाती है, इसे मन में बसाना तुम

चरण की रज जिसे समझा, माथे से लगाना तुम

क्षमा और शीलता की भी, बना करके हदें रखना

सबक इतिहास से सीखा, उसे मत भूल जाना तुम ।।

 

नियम से है बँधा जग ये, धर्म सारे बताते हैं जीवन-पथ के साथी हैं, सुख-दुख आते जाते हैं

निराशा और हताशा का, करें निस्तार निज मन से

आशा और उमंगों से चलो इसको सजाते हैं ।। 



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

वापी, गुजरात

शनिवार, 31 जनवरी 2026

जनवरी 2026, अंक 67

 

शब्द-सृष्टि

जनवरी 2026, अंक 67

परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से…

संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल!

दिन कुछ ख़ास है!

आलेख – अनादि सूर्य – डॉ. सुशीला ओझा

कविता – गणतंत्र – प्रेम नारायन तिवारी

आलेख – निराला जयंती-वसंत पंचमी विशेष : रँग गई पग-पग धन्य धरा – डॉ. ऋषभदेव शर्मा

कविता – मैं तिरंगा हूँ – डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

आलेख – वसंत पंचमी: प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव – डॉ. घनश्याम बादल

विशेष

कविता – डियर दिसंबर, तुम जा रहे हो… – डॉ.अनु मेहता खन्ना

आलेख – विश्व-मानचित्र के परिप्रेक्ष्य में हिंदी (वैश्विक प्रसार, भाषिक भूगोल और प्रथम स्थान का विश्लेषण) – डॉ. ऋषभदेव शर्मा

लघुकथा

पत्थर की बंदरिया – प्रेम नारायन तिवारी 

स्थान-महिमा

आलेख – विश्व-शांति की जन्मदात्री ‘लुम्बिनी’ – श्रीराम पुकार शर्मा

चोका  

ख़ामोशी – प्रीति अग्रवाल

अन्य कविताएँ

कविता – माँ – प्रेम नारायन तिवारी

कविता – 1.अपना अंबर 2. सत्या का गौरा पूजन– दुष्यंत कुमार व्यास

कविता – नई सुबह – डॉ. राजकुमार शांडिल्य

कविता – नेता जी सुभाष चन्द्र बोस – सुरेश चौधरी

कविता – 1. महाप्राण निराला 2. स्वामी विवेकानंद 3. प्रभु श्रीराम – इंद्र कुमार दीक्षित

कविता – 1. रूपमाला छंद के तीन रूप - कर्म-माता सीता-जय हनुमान 2. यथार्थ (पूर्णिका) – डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

दिन कुछ ख़ास है!

 


आलेख

वसंत पंचमी:

प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव

डॉ. घनश्याम बादल

भारतीय परंपरा और श्रीमद् भागवत गीता में  वसंत को ऋतुराज कहा गया है,’ऋतूनां कुसुमाकरः अर्थात् ऋतुओं में मैं वसंत हूँ, जहाँ सृजन, सौंदर्य और चेतना अपने चरम पर होती है। बसंत का सौंदर्य एवं महत्व देखकर ही इसे ऋतुराज की संज्ञा दी गई है। वसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का सजीव प्रतीक है- जहाँ धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं।

तिथि मात्र नहीं बसंत

वसंत पंचमी केवल पंचांग में अंकित एक तिथि मात्र नहीं, अपितु भारतीय चेतना का वह क्षण है जब जड़ता के लंबे शीतकाल के बाद जीवन पुनः मुस्कुराने लगता है। यह ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मा, प्रकृति और समाज‌ तीनों के नवजागरण का पर्व है। श्वेत शीत के बाद पीत वसंत का आगमन जैसे कहता है-अब भीतर और बाहर, दोनों ही स्तरों पर ऊर्जा को जगाने एवं सृजन का समय है।

धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भ

वसंत पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि चेतना की धारा हैं। वह चेतना जो अज्ञान के तम को चीरकर विवेक का प्रकाश फैलाती है। इसीलिए इस दिन पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन-कार्य का पूजन होता है।

या कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना

श्लोक हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का स्वरूप शुद्ध, शांत और उज्ज्वल होता है, ठीक उसी तरह जैसे वसंत का प्रकाश। आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी आंतरिक ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। जैसे धरती के भीतर बीज फूटते हैं, वैसे ही साधक के भीतर सुप्त चेतना जागती है। योग और तंत्र परंपरा में इस काल को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ  माना गया है ।

प्रकृति और विज्ञान का संगम

वैज्ञानिक दृष्टि से वसंत पंचमी के आसपास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दिनों की अवधि बढ़ने लगती है, सूर्य की किरणें अधिक सीधी और ऊर्जा-समृद्ध हो जाती हैं। इसका प्रभाव सीधे मानव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है।

मौसम विज्ञान के अनुसार भी वसंत ऋतु में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे “प्रसन्नता दायक हार्मोन” का स्तर बढ़ता है अवसाद, जड़ता और आलस्य में कमी आती है। सृजनात्मकता और सीखने की क्षमता तीव्र होती है । इसीलिए प्राचीन भारत में गुरुकुलों में नए अध्ययन सत्र, संगीत-नाट्य अभ्यास और शास्त्रार्थ इसी काल में प्रारंभ होते थे।

मनोविज्ञान और आत्मिक चेतना

मनोवैज्ञानिक रूप से वसंत पंचमी आशा का पर्व है। शीतकाल मानव मन में एक प्रकार की संकुचनशीलता ले आता है। कम प्रकाश, कम ऊर्जा, अधिक अंतर्मुखता। वसंत इस संकुचन को तोड़ता है। पीला रंग, जो वसंत पंचमी का प्रतीक है, ऊर्जा, ऊष्मा,आशावाद, बौद्धिक स्पष्टता और आत्मविश्वास का रंग माना जाता है।  इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले पकवान (केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) परंपरा में शामिल हैं। यह रंग मन को संदेश देता है- संकुचन एवं आलस का समय यानी शीतकाल अब चला गया इसलिए  आगे बढ़ो,सीखो और रचो।”

भौगोलिक परिवर्तन और जीवन

भौगोलिक दृष्टि से वसंत पंचमी कृषि चक्र का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रबी की फसलें पकने लगती हैं, सरसों के खेत पीले फूलों से भर जाते हैं। यह दृश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक लोकजीवन में वसंत का स्वागत गीतों के माध्यम से होता है-

फागुन आयो रे, रंग बरसाओ रे,

सरसों फूली,धरती बोली,जीवन गुनगुनाओ रे

जैसे लोकगीतों में किसान की आशा, प्रकृति से उसका संवाद और जीवन के प्रति उसका उल्लास समाहित होता है।

वसंत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा

वसंत पंचमी के साथ ही फाग, होली, रास और प्रेम-उत्सवों की शृंखला आरंभ होती है। कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में वसंत को प्रेम और सृजन की ऋतु कहा है। यह प्रेम केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकृति से, मनुष्य का मनुष्य से और साधक का ब्रह्म से प्रेम है। आधुनिक संदर्भ में वसंत पंचमी

आज के यांत्रिक और तनावग्रस्त जीवन में वसंत पंचमी हमें रुककर देखने, महसूस करने और स्वयं से जुड़ने का अवसर देती है। यह पर्व याद दिलाता है कि ज्ञान केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संतुलन और प्रकृति-संगति में भी निहित है। यदि हम वसंत पंचमी को केवल रस्म न बनाकर, आत्मचिंतन का दिन नई सीख शुरू करने का संकल्प, भीतर की नकारात्मकता त्यागने का अवसर बना लें, तो यह पर्व वास्तव में आत्मिक पुनर्जन्म का उत्सव बन सकता है।

यह पर्व संदेश देता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर नवीनता, विवेक और करुणा का वसंत ला सकता है। वसंत पंचमी  शाश्वत संदेश  है-

तम से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर, और अस्तित्व से आत्मबोध की ओर बढ़ना । दुखों के पुराने पत्तों को त्याग कर प्रसन्नता एवं नवीनता के नए अंकुरण को धारण करना।

***

डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड - 247667


दिन कुछ ख़ास है!

कविता


गणतंत्र

प्रेम नारायन तिवारी

 

लाखों बलिदानों का प्रतिफल,

यह गणतंत्र हमारा है।

हमको यह गणतंत्र हमारा,

प्राणों से भी प्यारा है।

आओ हम सब उन वीरों की,

याद करें कुछ कुर्बानी,

जिनके दम पे लालकिले पर,

दिखे तिरंगा प्यारा है।।

 

कुँववर,जफर, तात्या नाना संग,

लड़ी थी झांसी की रानी।

अमरकथा मंगल पाण्डेय की,

जिनने बगावत की ठानी।

मुगल ,मराठे लड़े थे मिलकर,

युद्ध घोर सत्तावन में।

छिटपुट युद्ध लड़े हम तबसे,

हार कभी भी न मानी।।

 

बटुकेश्वर, अशफाक, भगतसिंह,

चन्द्रशेखर को याद करें।

लाहिड़ी, रौशन, बिस्मिल्ल जैसे,

वीरों की जय नाद करें।

गाँधी, नेहरू संग जय सुभाष की,

नारा जोर लगाकर हम।

सीमा पर अमर शहीदों का हम,

प्रेम सहित गुणगान करें।।

 

याद करें हम आज उन्हें भी,

जो गुमनाम शहीद हुए।

जिनके लिए मुहर्रम आया,

लेकिन कभी न ईद हुए।

लड़ते- लडते देश की खातिर,

तन का लहू लुटा डाले,

सजी चिता न खुदी कब्र ही,

शव खा पोषित गिद्ध हुए।।

 

आओ करें प्रतिज्ञा हम सब,

अब ना इसे गंवायेंगे।

इसकी खातिर हँसते हँसते,

अपना शीश कटायेंगे।

भ्रस्टाचारी, लुटेरों सुन लो,

प्रेम तुम्हारी खैर नहीं,

जैसे अंग्रेजों को था खदेड़ा,

वैसे तुम्हें भगायेंगे।।

***
 


प्रेम नारायन तिवारी

रुद्रपुर देवरिया

अक्टूबर 2026, अंक 76

  शब्द-सृष्टि अक्टूबर 2026, अंक 76 संपादकीय – स्वागत है दीपोत्सव ! – डॉ. पूर्वा शर्मा   परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से..... – दि...