शनिवार, 30 मई 2026

मई 2026, अंक 71

  



शब्द-सृष्टि
मई 2026, अंक 71














शुक्रवार, 29 मई 2026

दोहे



 मालिनी त्रिवेदी पाठक

देखो दर्पण क्या कहे,

वही आप हैं आप?

कैसी काली पड़ गई,

अंतर्मन में छाप।।

 

धन सत्ता का यह नशा,

देगा क्या परिणाम।

स्वार्थ कपट के मेल से,

कब तक होगा काम।।

 

अंध मार्ग पर चल पड़े,

मानवता को भूल।

चमक-दमक का पथ दिखे,

बिछे वहीं पर शूल।।

 

देशद्रोह लालच किया,

खो बैठे संस्कार।

शिक्षा का भी कर दिया,

खतरनाक व्यापार।।

 

मानव हो पहचान लो,

अपना सच्चा रूप।

सत्य मार्ग पर चल पड़ो,

जहाँ सुनहरी धूप।।

*** 


मालिनी त्रिवेदी पाठक

वडोदरा गुजरात




विशेष

 


कवीन्द्र रवीन्द्र शरणम् : आत्मानुभूति से उद्भूत एक साहित्यिक समर्पण

सुरेश चौधरी इंदु


“आमि ढालिबो करुणा-धारा / आमि भाँगिबो पाषाण कारा

आमि जगत प्लाबिया बेडाबो गहिया / आकुल पागोल पारा।”

करुणा की यह अविरल धारा केवल एक कवि का उद्घोष नहीं, बल्कि मानवता के अंतःकरण में स्पंदित होने वाली वह शाश्वत चेतना है, जिसका मूर्त रूप हैं रबीन्द्र नाथ टैगोर। उनका साहित्य—जिसे हम ‘रवीन्द्र-साहित्य’ के नाम से जानते हैं—एक ऐसे भाव-सागर की अनुभूति कराता है, जिसमें अवगाहन करने वाला व्यक्ति निरंतर डूबता चला जाता है, किन्तु उसे किनारा नहीं मिलता; क्योंकि वह किनारा नहीं, बल्कि अनंत की यात्रा है।

साहित्य से संस्कार तक : एक अंतर्धारा

मैं स्वयं को साहित्य का औपचारिक विद्यार्थी नहीं मानता, किन्तु संस्कारों की भूमि में अंकुरित वह चेतना, जो बाल्यकाल से ही वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, महाभारत, भगवद्गीता और पुराणों के अध्ययन से सिंचित हुई—वह अंततः साहित्य की ओर ही प्रवाहित हुई। ननिहाल के विशाल पुस्तकालय में Suryakant Tripathi Nirala, Jaishankar Prasad, Ramdhari Singh Dinkar, Maithili Sharan Gupt जैसे महान साहित्यकारों की कृतियों ने भावभूमि को समृद्ध किया और छायावाद की प्रांजलता ने मन को विशेष रूप से आकर्षित किया।

परंतु एक प्रश्न बार-बार उद्वेलित करता रहा—जब हिंदी साहित्य में इतनी ऊँचाइयाँ हैं, तो फिर Gitanjali के रचयिता रवीन्द्रनाथ को वह वैश्विक प्रतिष्ठा क्यों? हिंदी अनुवादों में वह आकर्षण क्यों नहीं दिखता?

अनुवाद और मूल के मध्य का अंतर

यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक गहन साहित्यिक अनुभव की ओर संकेत करता है। मैंने अनुभव किया कि जब कोई कवि जिस भाषा में सोचता है, उसी में सृजन करता है, तब उसके शब्दों में भावों की जो सहजता और गहराई होती है, वह अनुवाद में पूर्णतः स्थानांतरित नहीं हो पाती। यही कारण था कि प्रारंभ में रवीन्द्र-साहित्य के हिंदी अनुवाद उन्हें आकृष्ट नहीं कर सके।

किन्तु Kolkata आगमन के पश्चात जब बंगला भाषा और संस्कृति से साक्षात्कार हुआ, तब धीरे-धीरे रवीन्द्रनाथ का वास्तविक स्वरूप उद्घाटित होने लगा। देवनागरी लिपि में लिखित बंगला कृतियों, तथा गीतबितान जैसे ग्रंथों के अध्ययन ने एक नए साहित्यिक संसार के द्वार खोल दिए।

आत्मानुभूति का पुनर्जागरण

जीवन के व्यावसायिक और रोगग्रस्त चरणों के बीच साहित्य से दूरी बनी रही, किन्तु 2010 के पश्चात पुनः एक आत्मिक जागरण हुआ। इसी क्रम में पहली कविता का सृजन हुआ—“जाग-जाग, हे नारी जाग”—जो भीतर सुप्त काव्य-धारा के पुनः प्रवाह का संकेत था।

लेखन के इस पुनरारंभ में छायावादी संस्कारों की छाप स्पष्ट दिखाई दी—निराला की निर्भीकता, प्रसाद की गहनता, पंत की कोमलता और दिनकर की ओजस्विता। परंतु इन सबके मध्य कहीं न कहीं रवीन्द्रनाथ की करुणा और व्यापक दृष्टि का बीजारोपण भी होने लगा।

रवीन्द्र का साक्षात्कार : शब्द से परे

जैसे-जैसे रवीन्द्रनाथ का मूल साहित्य पढ़ा गया, वैसे-वैसे यह अनुभूति प्रबल होती गई कि उनका प्रत्येक शब्द क्षरता से परे, एक शाश्वत अनुभूति का वाहक है। वह केवल काव्य नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है—एक ऐसा रहस्यमय संसार, जिसमें प्रवेश करने के बाद व्यक्ति स्वयं को भूल जाता है।

इसी भावावेश में लेखक के अंतःकरण से यह स्तुति स्वतः प्रस्फुटित हुई—

गुरुवर नमन शतशत नमन

साहित्य प्रगल्भ पराकाष्ठा

नव-तरंग अंतस की आस्था,

विभावरी मंडित व्योम पर

विधु सम अवभासित

जन गण मन अधिनायक

सत्यनिष्ठ जन नायक

विशालता का  उद्गम

दूरदर्शिता का परिचायक,

नवरचना संवाहक

नव प्रेरणा संचारक

हृदयंगम रोचित कला प्रसारक,

विश्व भारती विचारक,

चित्र कला, संगीत कला, साहित्य कलाधिपति

अद्भुत विलक्षण प्रतिभाधिपति,

गीत गीतांजलि भाव भावांजलि अतिमति

पुरुष्कृत कलावती

भारत भाल के द्यूतित श्रृंगार

परमात्मा के अप्रतिम उपहार,

नमस्कार नमस्कार नमस्कार !

यह केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक साधक का अपने आराध्य के प्रति समर्पण है।

भावानुवाद : एक साधना

रवीन्द्र-साहित्य के प्रति इस आकर्षण ने एक नई साधना को जन्म दिया—भावानुवाद की साधना। उद्देश्य केवल शब्दों का अनुवाद नहीं, बल्कि उस मूल भाव की धड़कन को पकड़ना था। “आज खेला भंगार खेलिबे” और “माया मोन बिहारीणी” जैसे गीतों पर अनेक बार प्रयास किए गए, जब तक कि मूल भाव के समीप पहुँचने का संतोष न मिला।

इस प्रक्रिया में संगीत का समावेश भी हुआ—रवीन्द्र-संगीत की परंपरा में गीतों को ढालने का प्रयास, संगीतकारों और नवोदित गायकों के सहयोग से, इस साधना को एक जीवंत रूप देने लगा।

समर्पण और संतोष

इस प्रकार कवि गुरु की 68 कविताओं का छन्दों में अनुवाद का कार्य पूर्ण हुआ और एक मानसिक संतुष्टि की प्राप्ति भी। यह अनुवाद केवल अनुवाद नहीं  बल्कि एक दीर्घ आत्मिक यात्रा का परिणाम है—संस्कारों से आरंभ होकर जिज्ञासा, संघर्ष, अनुभूति और अंततः समर्पण तक की यात्रा।

यह उनकी अनेक कृतियों में से एक होते हुए भी, उन्हें जो संतोष प्रदान करती है, वह अवर्णनीय है। यह संतोष इसलिए भी विशेष है, क्योंकि इसमें केवल साहित्य नहीं, बल्कि आत्मा की सहभागिता है।

उपसंहार : रवीन्द्र की शाश्वत प्रासंगिकता

रवीन्द्रनाथ का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। वह मनुष्य को उसकी सीमाओं से परे ले जाकर एक व्यापक मानवतावादी दृष्टि प्रदान करता है। विषम परिस्थितियों में वह मार्गदर्शक बनता है, और जीवन के संघर्षों में निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

अंततः, यही प्रार्थना मुखरित होती है—

तेजस   रूप   लिए   प्रभु,  द्वार   मेरे  आना

नाथ  तमस  अंतस  का, सूरज बन मिटाना

तेजस.....

 

अंदर   सरिता  में  जब,  बाढ़  सी  आती है

आशाओं  का  मर्दन,  नित्य  कर  जाती  है

ले  वारि  मेघ  से  तुम, छटा प्रिय बिखराना

तेजस....

रवीन्द्र-जयंती के इस पावन अवसर पर, यह लेख उसी करुणा-धारा के प्रति एक विनम्र अर्घ्य है—जिसने न केवल साहित्य को, बल्कि समूची मानवता को आलोकित किया है।

***


सुरेश चौधरी इंदु

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता 700046


संस्मरणात्मक आलेख

 



भारतीय मनीषा के साकार विग्रह  :  पं० विद्यानिवास मिश्र

   शशिबिन्दुनारायण मिश्र

    आज लोक-संस्कृति में रचे-बसे, संस्कृत के वरद-पुत्र और अक्षर-पुरुष पं० विद्यानिवास मिश्र पर अपने ढंग से विचार करने बैठा हूँ। मैंने कहीं पढ़ा था --साहित्यकार अनिर्वाचित विशुद्ध जनप्रतिनिधि होता है। यह सूक्ति पढ़कर विद्यानिवास मिश्र जी का विराट व्यक्तित्व एकबारगी मन-मस्तिष्क में कौंध उठता है। व्यक्ति जहाँ जन्म लेता है, कुछ सीखते हुए पलता- बढ़ता है, अन्न-जल ग्रहण करता है, शिक्षा ग्रहण करता है, वहाँ से आत्मीय लगाव और विशिष्टताओं पर गर्व स्वाभाविक होता है। व्यक्ति उस मिट्टी का जीवन भर कर्जदार रहता है। कवि रामनरेश त्रिपाठी की काव्य पंक्तियाँ हैं --

तुम जिसका जल अन्न ग्रहण कर, बड़े हुए लेकर जिसकी रज।

तन  रहते  कैसे  तज  दोगे  उसकोहे ! वीरों  के वंशज।।”

   यह अकारण नहीं है क्योंकि हम जीवन में विकास के लिए अनुभूतियों से लेकर समस्त प्रकार के पोषण का सारा रस उस मिट्टी से ही खींचते हैं, जहाँ पर हम जन्म लेकर पलते-बढ़ते हैं। यदि उस अञ्चल की मिट्टी कुछ विशेष और महान् प्रतिभाओं को जन्म देती है और उससे पूरे समाज व देश का हित होता है तो पूरे अञ्चल की मिट्टी गर्वोन्नत होती है, उससे जुड़ा हुआ प्रत्येक जन गौरव की अनुभूति करता है, भले ही उससे प्रत्यक्ष जुड़ाव अथवा लाभ हो अथवा न हो। हम सबका जन्म गोरखपुर जिले के राप्ती-गोर्रा दोआब में स्थित गाँव में हुआ है। बिशुनपुरा, रानापार, पकड़डीहा और डुमरी ये तीन-चार गाँव आपस में सटे हुए हैं। अब ये सभी एक गाँव जैसे लगते हैं। इन्हीं गाँवों में गणेशदत्त मिश्र मदनेश’, मुनिवर मिश्र, प्रसिद्ध नारायण मिश्र, महीपति नारायण मिश्र, पं. विद्यानिवास मिश्र, डॉ रामदरश मिश्र तथा रामनवल मिश्र आदि अनेक प्रतिष्ठित मनस्वी साधक विद्वान्, कवि और साहित्यकार हुए हैं। इन गाँवों से चारों दिशाओं में समान दूरी पर राप्ती- गोर्रा नामक दो नदियाँ हैं, यद्यपि गोर्रा, राप्ती की ही शाखा है। यह भौगोलिक दृष्टि से पूरी तरह से कछार क्षेत्र माना जाता है। पं० विद्यानिवास मिश्र हमवतन हैं। मेरा गाँव रानापार (रणपाल) और उनका गाँव पकड़डीहा दो गाँव होते हुए भी उनके घर की दूरी मेरे घर से एक किलोमीटर से भी कम अर्थात् बमुश्किल पाँच-छह सौ मीटर होगी। हम सगोत्रीय भी हैं। हम लोग मूलतः पयासी और बनकटा के वत्सगोत्रीय ब्राह्मण हैं। पयासी और बनकटा दोनों गाँव देवरिया जिले में हिरण्यावती अर्थात् छोटी गण्डकी के दोनों ओर स्थित हैं। पयासी तक आते-आते हिरण्यावती (छोटी गण्डकी) पश्चिम की ओर बहती है अर्थात् उसकी धारा उलटी हो जाती है। इसकी धार्मिक महत्ता को लेकर उस अञ्चल में यह कहावत प्रचलित है --”सौ काशी, न एक पयासी।” यह छोटी गण्डकी आगे बहते हुए भागलपुर के पास सरयू नदी में मिल जाती है। वत्स गोत्रीय सरयूपारीण ब्राह्मणों का मूल उद्गम पयासी और बनकटा ही माना जाता है। त्यागशील महर्षि दधीचि के कुल में सारस्वत और उनके पुत्र वत्स हुए,इसी कुल में ऋषि च्यवन का भी नाम आता है, लेकिन गोत्र प्रर्वतक ऋषि वत्स हुए। वत्स ऋषि का ऋषित्व चारों वेदों में दृष्टिगोचर होता है। ऋग्वेद के सूक्त 8.6 की प्रथम ऋचा यजुर्वेद 7.40 में संग्रहीत है। इसके मन्त्रद्रष्टा ऋषि वत्सको ही स्वीकार किया गया है --”महेन्द्री गायत्री वत्सदृष्टा। य: ओजसा वत्सो गायत्रीम्।” वत्स गोत्रीय ब्राह्मणों के मूल स्थान पयासी, बनकटा के अतिरिक्त गाना, हरियैया, नगहरा, पीड़हरा, राढ़ी आदि भी हैं। लेकिन पयासी से ही देश के अन्य भागों में वात्स्यायनों का विस्तार हुआ है। लगभग चार सौ साल पहले किसी आक्रान्ता आततायी से अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए विद्यानिवास मिश्र जी के पूर्वज पयासी से चलकर बस्ती के तत्कालीन पालवंश राजाओं के संरक्षण में बस्ती जिले के एक गाँव में स्थापित हुए और बहुत सारी भूमि उन्हें दान में मिली, ये लोग बस्ती के पाल राजाओं के कुलगुरु भी हुए, कालान्तर में सौ-डेढ़ सौ साल बाद पुनः सोहगौरा के श्रीमुख शाण्डिल्य गोत्रीय ब्राह्मणों के सिलसिले से विद्यानिवास जी के पूर्वज बस्ती से पकड़डीहा गाँव आ गये। पकड़डीहा गाँव पाकड़ और डीह दो शब्दों का युग्म है। गणेश पाण्डेय उर्फ वैद्य जी के घर के पास वह पाकड़ का पेड़ हाल के दिनों तक देखा गया था और डीह का थान तो विद्यानिवास जी के घर के सामने आज भी विद्यमान है। पाकड़ और डीह ही धीरे-धीरे पकड़डीह और बाद में समय के साथ पकड़डीहा हो गया। धर्मभ्रष्ट आक्रांताओं ने धर्म और संस्कृति पर सबसे पहले और अधिक चोट की थी। जिनके लिए कभी भी संस्कृति और धर्म महत्त्वपूर्ण नहीं रहे, वे ही कन्वर्ट हुए। मेरे पूर्वज भी किसी आततायी आक्रान्ता से धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए लगभग चार सौ साल पहले पयासी से सतासी कोस के तत्कालीन राजा ठाकुर वसंत सिंह के संरक्षण और बहुत अधिक भूमि के दान के साथ रानापार (रणपाल) आकर स्थापित हुए थे। उन्हीं राजा ठाकुर वसंत सिंह के नाम पर गोरखपुर शहर में वसंतपुरनामक मुहल्ला है।

वर्तमान में हम लोग गोरखपुर के राप्ती- गोर्रा दोआब कछार- अञ्चल में तीन-चार सौ वर्षों से स्थापित हैं। पं० विद्यानिवास मिश्र इसी अञ्चल की एक महान् साहित्यिक विभूति हैं, हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी के अग्रणी विद्वान् और रचनाकार तथा भारतीय मनीषा के साकार विग्रह पं. विद्यानिवास मिश्र, जिनका जन्म पकड़ीहा में 14 जनवरी सन् 1926 को हुआ था। विद्यानिवास मिश्र का पूरा व्यक्तित्व उनके नाम के अनुरूप था। वे अपने समय के भारत के प्रतिष्ठित विद्वानों और साहित्यकारों में से एक थे। हिन्दी के श्रेष्ठ आलोचकों ने उन्हें स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में हिन्दी ललित निबन्धों का प्रतिमान कहा है। विद्यानिवास मिश्र प्रसिद्ध शिक्षाविद और शैक्षिक दुनिया के कुशल प्रशासक भी थे। विद्यानिवास मिश्र के पिता पं० प्रसिद्ध नारायण मिश्र और उनके दो चाचे महिपति नारायण मिश्र व मुनिवर पण्डित भी काफी पढ़े-लिखे, शास्त्रज्ञान सम्पन्न असाधारण लोग थे। दी० द० उ० गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना में पं० प्रसिद्धनारायण मिश्र का नाम भी आता है। बिशुनपुरा मिडिल स्कूल और जनता विद्या विकास समिति, बाढ़ पीड़ित क्षेत्र बिशुनपुरा द्वारा संचालित विद्यालय की स्थापना और गति देने में क्षेत्र के अनेक मनीषियों के साथ विद्यानिवास मिश्र के सगे चाचा पं० महीपति नारायण मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उसी आजू- बाजू में मनीषी रचनाकार पं० गणेशदत्त मिश्र मदनेश’ (जन्म- सन् 1891), काफी बाद में डॉ रामदरश मिश्र (जन्म- सन् 15 अगस्त 1924), तथा भोजपुरी कवि रामनवल मिश्र (जन्म- 1922) व प्रभाकरधर दुबे लण्ठ (जन्म- 1944) उसके तीन-चार किलोमीटर दक्षिण राप्ती नदी के तट पर स्थित गजपुर में प्रख्यात साहित्यकार मन्नन द्विवेदी गजपुरी (जन्म- सन् 1885), कवि रामाधार त्रिपाठी जीवन (जन्म- सन् 1903), हमारे यहाँ से राप्ती नदी के तट पर स्थित कनइल गाँव में कृष्णमुरारी शुक्ल भकोलजैसी विलक्षण साहित्यिक प्रतिभाएँ पैदा हुईं थीं। जिनके अवदान से हिन्दी साहित्य धन्य है। प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रोफ़ेसर अनन्त मिश्र ने पं० विद्यानिवास मिश्र के विराट व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हुए लिखा है --”पण्डित जी अपने समय के अपने नाम के नाम के अनुरूप वेद, वेदांग के ज्ञाता, कोशकर्ता, शास्त्र और श्रुतिधर, कला और संस्कृति के अध्येता, उच्च कोटि के आचार्य, सम्पादक, विद्यानुरागी, श्रेष्ठ विद्वानों के संगी और अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। वे एक प्रकार से नूतन व्यास थे जिनमें विचित्र विश्लेषण और संश्लेषण की शक्ति थी। वे ज्ञान के आकाश में उज्ज्वल नक्षत्र थे। ....  ... उनकी वाणी, वर्षों तक दक्षिण से लेकर उत्तर तक की सभाओं में जो रस बरसाती रही है, उसकी स्मृति आज भी है। तकनीक के इस युग में जो उनकी वाग्मिता आकाशवाणी और अन्य संस्थानों में सुरक्षित है, वह प्रमाण है कि वे कितने विराट पण्डित और सृजनशील प्रभावशाली कृती थे। ...  ..... ... वाङ्मय जगत में उन्होंने संस्कृत- व्याकरण, हिन्दी की शिल्प संरचना और वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत की समकालीन पुनः व्याख्या की। एक तरह से उनकी पुनर्रचना की। सबसे ज्यादा उनकी ख्याति उनके निबन्धों के कारण है।”

    पं. विद्यानिवास मिश्र जी से प्रथम व्यक्तिगत मुलाकात होने से पहले ही यू. पी. बोर्ड की इण्टरमीडिएट कक्षाओं के हिन्दी पाठ्यक्रम की गद्य पुस्तक में उनका हिमालयशीर्षक निबन्ध हमने पढ़ी थी। पढ़ाई के दौरान पाठ्यक्रम में जिसे हम पढ़ रहे होते हैं, यदि वह जीवित है तो उसके प्रति स्वाभाविक आदर का भाव रहता है, मिलने की उत्कट इच्छा भी। इण्टरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में उसी निबन्ध से एक सूक्ति पूछी गयी थी-- हिमालय भारत का गर्वोन्नत किरीट है।यह अब तक स्मरण में है। मन-मस्तिष्क में भाव कौंधने लगा कि उनसे व्यक्तिगत मुलाकात करनी है। संयोग देखिए उसी वर्ष पता चला कि उन्हें पितरों को पिण्डदान और श्राद्ध कर्म करने के लिए गया- ठाकुरद्वाराजाना है। कुआर महीने का पितृपक्ष (पितरपख) का समय था। पकड़डीहा गाँव पर उत्तराभिमुख खपरैल वाले अपने मकान के बरामदे में वे बैठे हुए थे, साथ में गोपालापुर के पं० वंशराज त्रिपाठी व रामस्वरूप त्रिपाठी उर्फ दुबरी पण्डित, डुमरैला के मदनमोहन राय, सरार के जगतनारायण धर दुबे, डुमरी के रामनवल मिश्र व सीताराम मिश्र और पकड़डीहा के गणेश पाण्डेय व इन्द्रजीतलाल श्रीवास्तव आदि दरी पर दर्जनों लोग उनके साथ बैठे हुए थे। प्रणाम कर मैं भी वहीं दरी पर बैठ गया, लेकिन उनके निबन्धों पर अथवा उनसे व्यक्तिगत तौर पर कोई बातचीत उस समय नहीं हो सकी, अवसर भी उचित नहीं था। लेकिन उनके इस प्रथम दर्शन से मेरा मन पूर्णतः प्रसादित होता हुआ निरन्तर उसकी अविच्छिन्नता का अनुभव करता रहा। साल- डेढ़ साल बाद बनारस भारतीय स्थल सेना की कोई परीक्षा देने गया। तब विद्यानिवास मिश्र जी सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में कुलपति थे। परीक्षा उपरान्त दोपहर बाद कुलपति आवास पर सीधे पहुँचा और विचित्र दृश्य देखा। विश्वविद्यालय के दर्जनों छात्र नेता किसी समस्या को लेकर कुलपति के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे --”अभी तो ये अंगड़ाई है। आगे और लड़ाई है।” आदि। लगा कि भेंट नहीं हो सकेगी, बैरंग लौटना होगा। छात्र नेता कुलपति से मिलकर हर हाल में अपनी बात रखना चाहते थे। पुलिस कर्मी उन्हें रोक रहे थे। सुरक्षा कर्मियों ने अंदर जाकर छात्र नेताओं के बारे में सूचना दी। पण्डित विद्यानिवास मिश्र धोती-कुर्ता में और खडाऊँ पहने तत्काल बाहर आये। मैंने देखा कि पण्डित जी की चुटिया बँधी हुई है और मुख मण्डल विद्या के दर्प से दपदपा रहा है। उनमें विद्या की साधना और तप का तेज था, आचरण की पवित्रता के साथ धर्म के प्रति आदर का भाव था। जिसका सामने वाले पर प्रभाव पड़े बगैर नहीं रहता था। पण्डित जी के सामने पड़ते ही छात्र नेता एकदम शान्त हो गये थे, जो छात्र नेता नारेबाजी कर रहे थे उन्होंने आगे बढ़कर चरणस्पर्श किया, कुलपति के सामने खड़े-खड़े अपनी बात रखी और यथोचित आश्वासन पाकर छात्र तुरन्त चले गये थे। यह दृश्य मेरी आँखों के सामने घटित हुआ था। पण्डित जी ने छात्रों से बहुत कम बात की थी, शान्त और सरलता पूर्वक बात की, अलबत्ता उन्हें समस्या निराकरण के लिए गम्भीरता पूर्वक उचित आश्वासन दिया था। अब कुलपतियों का छात्र नेताओं पर वैसा प्रभाव नहीं दिखता है, क्योंकि उनके पास वैसा त्याग, गम्भीरता और विवेक नहीं है। हम भी छात्र जैसे ही वहाँ खड़े-खड़े यह सब देख रहे थे, उसके बाद इंस्पेक्टर जैसे दिखने वाले एक पुलिस कर्मी ने आवास के बाहर मुझे खड़े देखकर डपटकर पूछा कि यहाँ क्यों खड़े हो? आगे कुछ और बोलता, तुरन्त उसके निकट जाकर गोरखपुर का उच्चारण कर अपना नाम और पता बताया, तब पुलिस कर्मी ने मेरे नाम-पते वाले कागज़ के टुकड़े को अन्दर ले जाकर दिया। मैं अन्दर बुला लिया गया। पण्डित जी ने पूरा परिचय जानकर बनारस आने का कारण पूछा। धीरे-धीरे भुवन भास्कर अस्ताचलगामी हो रहे थे। रात को वहीं कुलपति आवास पर ही ठहरा। शुरू से लेकर अन्त तक पण्डित जी ने हर बात भोजपुरी में ही की । एक भी वाक्य हिन्दी में नहीं। कुलपति आवास पर ड्यूटी दे रहे सुरक्षा कर्मियों और अन्यों के साथ मेस में मेरा रात्रि का भोजन नहीं बना। रात्रि का और अगली सुबह का मैंने उनकी धर्मपत्नी के हाथों बना भोजन उनके साथ चौके में काष्ठपीठ (पीढ़ा) पर ही बैठ कर किया था। उस समय लिखना शुरू कर दिया था। टूटे-फूटे भावों के साथ कुछ रचनाएँ मेरे साथ थीं, उन्हें दिखाया। हू-ब-हू उनकी टिप्पणी तो याद नहीं आ रही है। कुछ ऐसे ही कहा था कि ऐसे नहीं लिखा जाता है, अभी खूब पढ़ना चाहिए कि वर्तमान में श्रेष्ठ और नया साहित्य कैसे रचा जा रहा है। यह भाव भी उन्होंने भोजपुरी में ही व्यक्त किया था। उन्होंने बातचीत में मेरे प्रपितामह कवि मदनेशजी के बारे में बताया था कि वे फ़लसफ़ा अन्दाज़ के मस्त कवि थे। विद्यानिवास जी के सगे चाचा पं० मुनिवर मिश्र से और मनीषी कवि पं० गणेशदत्त मिश्र मदनेशसे शास्त्रों पर खूब छनती थी। दोनों संस्कृत के बड़े पण्डित और शास्त्रज्ञान से परिपूर्ण थे। अच्छी तरह याद है कि पण्डित जी ने गोरखपुर में डॉ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी और डॉ अनन्त मिश्र जी से मिलकर मार्गदर्शन लेते रहने की भी बात मुझसे कही थी। पं० विद्यानिवास मिश्र से मेरी दो दर्जन से अधिक व्यक्तिगत मुलाकातें हुई थीं, मैंने यह अनुभव किया कि उनका व्यक्तित्व चुम्बकीय व्यक्तित्व था, सामने पड़ने वाला उनका हो जाता था। पं० विद्यानिवास मिश्र प्राथमिक विद्यालय बिशुनपुरा के अपने गुरु पं० रामचन्द्र तिवारी से लेकर पढ़ाई-लिखाई के अन्त तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संस्कृत विषय में अपने गुरु प्रोफ़ेसर क्षेत्रेशचन्द चट्टोपाध्याय तक अपने सभी श्रेष्ठ गुरुजनों के प्रति सदैव श्रद्धावनत रहे। प्रोफ़ेसर क्षेत्रेशचन्द चट्टोपाध्याय का तो वे बार-बार आदरपूर्वक स्मरण करते हैं। उनके व्यक्तित्व की विराटता का यह भी एक हिस्सा था। अपने प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक के बारे में उन्होंने बताया था कि कक्षा तीन में पढ़ते हुए तत्कालीन अध्यापक रामचन्द्र तिवारी के घर किसी की मृत्यु होने पर भी स्कूल बन्द होने के निर्धारित समय से पहले उनका घर न जाना और छात्रों के सामने मृत्यु की सूचना देने वाले गाँव के कहार से यह कहना कि बच्चे और गाँव के लोग क्या सोचेंगे?” यह कर्त्तव्यनिष्ठा की पराकाष्ठा कही जा सकती है। इस घटनाक्रम ने भी विद्यानिवास मिश्र के जीवन को बदलने में महती भूमिका निभाई और उनमें भी उसी तरह की कर्त्तव्यनिष्ठा का भाव आता गया। यह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था। बिशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय के तत्कालीन सहायक अध्यापक रामचन्द्र तिवारी की कर्त्तव्यनिष्ठा, सख्त अनुशासन और समय की पाबन्दी का विद्यानिवास मिश्र पर गहरा प्रभाव पड़ा। प्राथमिक विद्यालय बिशुनपुरा में ही कार्यरत एक और तत्कालीन शिक्षक बाबू जीतबन्धन सिंह, जो कि भाषा के बहुत अच्छे शिक्षक रहे- को भी वे बार-बार आदरपूर्वक स्मरण करते थे। पं० विद्यानिवास मिश्र ने अपनी पुस्तक चिड़िया रैन बसेरामें पढ़ाई के बाद के दिनों को याद करते हुए लिखा है --”अध्ययन की दीक्षा मैंने अपने गुरुओं से ली। सबसे अधिक पं० क्षेत्रेश चंद्र जी से। वे कहते थे -यह मानकर चलो कि ज्ञान अखण्ड होता है। जब तक समग्र दृष्टि से किसी भी विषय का अध्ययन नहीं होता, किसी देश या देश की प्रकृति का अध्ययन नहीं होता। तब तक जानना निष्प्रयोजन होता है। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन से मैंने कर्म-दीक्षा, परिश्रम की दीक्षा ली है। उनके साथ अट्ठारह-अट्ठारह घंटे तक कोश का कार्य किया, बीच-बीच में ज्ञान- विज्ञान के विविध क्षेत्रों की जानकारी ली और सबसे अधिक दीक्षा इस बात की ली कि ऐसा कोई नहीं है जिसके पास ज्ञान की कोई अद्वितीय अछूती किरण न हो, इसलिए साधारण से साधारण की भी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।”

विद्यानिवास मिश्र का एक और गुण जो मुझे सर्वाधिक प्रभावित करता है, वह यह कि अपनी भूल को स्वीकारने से सम्मान ही बढ़ता है। मानव रूप में जन्मा हुआ कोई भी गलती से परे नहीं है। अपनी गलती स्वीकार करना अपमानजनक है, यह अहंकारपूर्ण सोच व्यक्ति को बहुत नीचे गिराती है। अन्दर गलती का अहसास होने पर भी प्रकट रूप से मानने के साहस के बिना उसे सही ठहराते जाना ही मानव की भयंकर भूल होती है और उसकी मूढ़ता प्रमाणित होती जाती है। अपनी गलतियों को विनीत भाव और सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर व्यक्ति बहुत बड़ा हो जाता है। यह हार जाना अथवा ज़लील होना नहीं होता है। पं० विद्यानिवास मिश्र के अनेक लेखों / निबन्धों में ऐसा भाव व्यञ्जित हुआ है। पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने 1992 में कविकुल गुरु महाकवि कालिदास पर एक समीक्षात्मक निबन्ध लिखा था। कालिदास को समझने के क्रम में वे उस समय के कश्मीर शैव दर्शन के महान् वेत्ता पण्डित रामेश्वर झा के पास गये थे। रामेश्वर झा के पास पहुँचने पर विद्यानिवास जी ने उनसे कुछ सवाल पूछे। विद्यानिवास जी से झा साहब बोले, “किस लिए पूछ रहे हो?” विद्यानिवास मिश्र ने कहा, “आत्मानम् विद्धि’! पण्डित रामेश्वर झा ने डाँटकर कहा --”ग़लत, ‘आत्मने विद्धिआत्मानम् विद्धिक्या होता है, जानना होता है, अपने लिए होता है। आत्मने विद्धिजान जाओगे। अरे, अपने लिए जानो।” आगे विद्यानिवास जी लिखते हैं --”तब से मैंने अपने लिए कालिदास को चाहा है, अपने लिए पढ़ा है और जब पढ़ा तो शुरू-शुरू में कालिदास से मैं बड़ा नाराज था। उसी नाराजगी का फल आज भोग रहा हूँ।–

“सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां भ्रष्टं मया नूपुरमेकमुर्व्याम्।

अदृश्यत त्वच्चरणारविन्द विश्लेषदु:खादिवबद्धमौनम्।।”

 (रघुवंशम्)

वास्तव में हिन्दी में इतना ईमानदार और सहज रचनाकार शायद ही कोई हो। पण्डित विद्यानिवास मिश्र की इस सहजता और साधारणता पर मन रीझता है। उन्होंने अपने एक निबन्ध में अपने एक गुरु पण्डित गंगानाथ झा के हवाले से लिखा है --”जो विषय तुम्हें न आता हो, उसके बारे में स्पष्ट कहो --यह मुझे नहीं आता है, इसके बारे में अध्ययन करके कुछ कह सकूँगा। उन्होंने एक बार दूसरे विद्वान् का तर्क स्वयं बिना जाँच-पड़ताल के दुहराने पर डाँटा था।”  सचमुच में ज्ञान-साधना अतृप्त रहने पर ही फलीभूत होती है। विद्यानिवास मिश्र ने अपने हर निबन्ध में कुछ विशेष शब्दों के नये अर्थों से पाठकों को परिचित कराते चलते हैं। स्वाध्याय : भक्ति का पुरुषार्थनिबन्ध में आस्तिकताका अलग ढंग से अर्थ खोलते हुए वे कहते हैं --”आस्तिकता का अर्थ प्रभु के प्रति विश्वास नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर स्थित प्रभु की शक्ति के प्रति विश्वास है और उसके अनन्त प्रवाहों को एक साथ देखने का अभ्यास है। आस्तिकता मनुष्य को ही नहीं, प्राणिजगत् चर-अचर को छूती है।”  पं० विद्यानिवास मिश्र हिन्दी जगत् में अपनी विशाल हृदयता और उदारता के लिए भी जाने गये। प्रसंगवश एक घटना का स्मरण हो आया है। पं० विद्यानिवास मिश्र का रीतिविज्ञानशीर्षक से आलोचनात्मक निबन्धों का एक संकलन 1974 में प्रकाशित हुआ था, इस पुस्तक में उन्होंने जीवन के विविध पक्षों को रीति के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है, जिसमें जीवन का रस, आनन्द, प्रेम और प्रकृति का चित्रण भी शामिल है। रीतिविज्ञान में शैलीगत प्रयोग भी विवेचित है, जिसे पण्डित जी संस्कृत के अभिजात प्रभाव और लोकभाषा के गँवई गंध को मिलाकर भाषा का प्रयोग करते हैं। साथ ही इसमें भारतीय साहित्य और संस्कृति के गहरे पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। डॉ बच्चन सिंह उक्त रीतिविज्ञान पुस्तक के प्रकाशन के एकाध साल बाद उसकी तल्ख़ समीक्षा की थी। (वही डॉ बच्चन सिंह जो हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’, ‘आलोचक और आलोचना’, ‘क्रान्तिकारी कवि निराला’, और हिन्दी आलोचना के बीज’, प्रभृति दर्जनों श्रेष्ठ आलोचनात्मक कृतियों के गहरी अन्तर्दृष्टि के समालोचक और रचनाकार हैं) डॉ बच्चन सिंह की वह समीक्षा अभी प्रकाशित नहीं हुई थी। डॉ नामवर सिंह को जैसे ही पता चला कि बच्चन सिंह ने विद्यानिवास मिश्र की रीतिविज्ञान पुस्तक की तल्ख़ समीक्षा लिखी है जो अभी अप्रकाशित है, डॉ बच्चन सिंह के यहाँ पहुँचे और माँगकर पढ़ने के लिए ले गये और पढ़कर तुरन्त ही आलोचनापत्रिका के अगले अंक में प्रथम लेख के रूप में बच्चन सिंह से बिना पूछे छाप दिया। नामवर जी का यह काम सुशोभन तो नहीं ही कहा जायेगा। हो सकता है कि डॉ बच्चन सिंह उस समीक्षा को समय मिलने पर प्रकाशन से पहले दुबारा संशोधित करते। कई बार अपने ही लेख पर कुछ समय बाद तटस्थ भाव से विचार करने पर रचनाकार द्वारा उसमें आमूल-चूल परिवर्तन करने का मन करने लगता है और रचना यदि प्रकाशित नहीं हुई है तो रचनाकार उस रचना में आवश्यक बदलाव कर भी देता है। हर छोटे-बड़े रचनाकार के साथ ऐसा होता है। डॉ बच्चन सिंह को जब अपनी समीक्षा आलोचनापत्रिका में प्रकाशित होने की खबर मिली और उसे पढ़ी तो निम्नलिखित शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। हू-ब-हू उन्हीं के शब्दों में -- “नामवर जी स्वयं अपने को विवादास्पद बनाये रखते हैं और अगर उन्हें कोई दूसरा मिल जाए, तो उसे भी अपनी श्रेणी में घसीट लाते हैं। फिर उन्होंने वागीश शुक्ल से एक लेख मेरे विरुद्ध लिखवाया -असंसदीय शब्दों से भरा हुआ।” नामवर सिंह इतना ही नहीं करते हैं, वागीश शुक्ल से असंसदीय शब्दों का प्रयोग कराकर उस आलेख को पुनः आलोचनामें प्रकाशित कर उसकी एक प्रति डॉ० बच्चन सिंह के पास शिमला भेज दी। डॉ बच्चन सिंह उस समय शिमला विश्वविद्यालय में कुलपति थे। मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष माने जाने वाले डॉ० नामवर सिंह के लेखकीय स्वभाव का एक हिस्सा ऐसा भी रहा है। डॉ बच्चन सिंह आगे लिखते हैं --”पण्डित जी ने कभी उसका जिक्र मुझसे नहीं किया। अब तो किसी की किताब की प्रतिकूल समीक्षा छप गयी तो वह जन्म भर वैरी बन जाता है। उसके भाई-भतीजे समीक्षक के विरुद्ध पत्र-पत्रिकाओं में गालियाँ उगलते हैं। राजनीतिक दलों की तरह भाई-भतीजावाद और जातिवाद विष की तरह फैलता जा रहा है। पण्डित जी से तुलना करने पर -मनुष्य के रूप में तुलना करने पर -यही कहना पड़ता है कि कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगुआ तेली।” (डॉ बच्चन सिंह ने लीला का संवरण -समयशीर्षक अपने एक संस्मरणात्मक आलेख में इसका उल्लेख प्रसंगवश किया है। इस तरह की उनकी उदारता के और भी उदाहरण हैं। हिन्दी और संस्कृत में सौ से अधिक अति महत्त्वपूर्ण कृतियों का लेखन और संपादन करने वाले पं० विद्यानिवास मिश्र ने अंग्रेजी में भी दक्षतापूर्वक लेखन किया है , जिससे भारत सरकार ने उनकी विलक्षण साहित्यिक मेधा, सतत लेखन और सुदीर्घ साहित्य साधना के परिणामस्वरूप पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया, उन्हें साहित्य अकादमी की आजीवन महत्तर सदस्यता सम्मान पूर्वक दी गयी थी। पण्डित विद्यानिवास जी द्वारा साहित्य और भाषा पर केन्द्रित हिन्दी व संस्कृत में मौलिक और संपादित उच्च कोटि की शताधिक कृतियाँ रची गयी हैं। पण्डित जी की अंग्रेजी भाषा में भी अत्यन्त उच्च कोटि की पाँच पुस्तकें प्रकाशित हैं।

            178 पृष्ठों की सन् 1966 में प्रकाशित उनकी पहली अंग्रेजी की पुस्तक 1- ‘The Descriptive technique of Panini’ -यह पुस्तक ऋषि पाणिनि की अष्टाध्यायी का समग्र और सरल विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इस कृति को पढ़कर ब्लूमफिल्ड जैसे पाश्चात्य भाषावैज्ञानिक ने “An unparalleled creation of human intellect” बताया था। पं० विद्यानिवास मिश्र की दूसरी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग्रेजी पुस्तक 2- “Perception of Vedas” इस पुस्तक में उन्होंने वैदिक साहित्य का सार कुल 17 अध्यायों में अत्यन्त सहज और विस्तार से प्रस्तुत किया है। उनकी तीसरी अंग्रेजी पुस्तक है --3- “Essential of Hindu Dharm” - पाँच अध्यायों में विभक्त 198 पृष्ठों की यह पुस्तक समूचे विश्व को हिन्दू धर्म के मूल तत्वों, रीति-नीति और स्वरूप से समग्रता से परिचित कराती है। पं० जी की चौथी अंग्रेजी पुस्तक -4- Foundation of Indian Esthetics” है, इस पुस्तक में सौंदर्य, वाक्, रस, सहृदय और भक्ति की व्यापक व्याख्या की गयी है। साथ ही इसमें भारतीय विश्व- दृष्टि और साहित्यिक- आस्वाद की प्रक्रिया को सरलता पूर्वक समझाया गया है।

डॉ० विद्यानिवास मिश्र की पाँचवीं अंग्रेजी पुस्तक -5- “The Structure of Indian mind “ है। इस पुस्तक में उन्होंने बताया है कि भारतीय मन कैसे सोचता है, उसकी सोच की जड़ें कहाँ हैं और पश्चिमी मन से कैसे वह अलग है। विद्यानिवास जी इस पुस्तक में भारतीय परम्परा के विविध ग्रन्थों और प्रथाओं के आधार पर भारतीय चिंतन शैली की संरचना खोलते हैं और भारतीय चिंतकों पाणिनि, भर्तृहरि, कालिदास, सूरदास और तुलसीदास के चिंतन के योगदान पर चर्चा करते हैं।

     विद्यानिवास मिश्र का अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी और लोकभाषा (भोजपुरी, ब्रजभाषा और अवधी) तथा भाषाशास्त्र पर अप्रतिम अधिकार था। पं० विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की चेतनानिबन्ध में लिखा है --”भारतीय साहित्य की मर्यादा शिवमयता ही है।”  संस्कृत भाषा के बारे में आपका विचार है कि --”भाषा के लिए संस्कृतनाम पाणिनि के बाद प्रयोग में आया, सबसे पहले वाल्मीकि रामायण में संस्कृतशब्द भाषा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त मिलता है।”  मन्त्रों के बारे में विद्यानिवास जी कहते हैं --”वैदिक साहित्य का मुख्य आधार मन्त्र हैं। मन्त्र ही ब्रह्म हैं, वही देवता और मनुष्य के बीच सेतु हैं। मन्त्र मनुष्य के भीतर के सोए हुए देवता को जगाता है।”

संस्कृत और संस्कृतिनामक निबन्ध में वे कहते हैं कि --”संस्कृत और संस्कृति एक दूसरे के पर्याय अनायास नहीं बने हैं। संस्कृति के बारे में सर्वमान्य अवधारणा है कि वह मनुष्य समुदाय की सर्जनात्मक शक्ति है। इस अवधारणा की तुलना जब हम वैदिक वाक् की अवधारणा से करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि वह वाक् ही संस्कृति है। उसका नाम संस्कृत बिल्कुल यथार्थ है। संस्कृत भी संस्कार से बना है जिसका अर्थ भीतर के गुण को उभारकर ऊपर लाना है, ऊपर से कोई गुण आरोपित करना नहीं है। वैयाकरण वररुचि ने साफ-साफ कहा कि - प्रकृति: संस्कृतं तस्मादुद्भूतं प्राकृतम्, संस्कृति ही प्रकृति है। संस्कृति अपनी उदारता और व्यापकता के कारण ही बिना आधुनिक भाषाओं से प्रतिस्पर्धा किये चिंतन की भाषा के रूप में विकसित होती रही।”

            विख्यात कवि, आलोचक और संस्कृतिकर्मी डॉ० अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि –“विद्यानिवास मिश्र हमारे समय के उन व्यक्तियों में से थे, जिन्होंने बुद्धि, चिंतन, साहित्य, पत्रकारिता, अध्यापन और सत्ता के बहुत सारे लोग को आपस में जोड़ा था। वे हिन्दी के सर्वाधिक प्रभावशाली वक्ताओं में से एक थे। जिस तरह सहज प्रवाहमयता के साथ वे लिखते थे, उसी तरह बोलते भी थे। उनके लिखे और बोले में अन्तर नहीं रहता था। देश में ऐसी कोई हिन्दी संस्था को बताना कठिन है जिसका उनसे सम्बन्ध न रहा हो। विद्यानिवास मिश्र की मित्र और भक्त मण्डली आसेतुहिमालय फैली हुई थी। उनका निधन एक गहरे अर्थ में सच्ची सामाजिक क्षति भी है।”

पं० विद्यानिवास मिश्र का राज्यसभा सदस्य रहते हुए नवम्बर वर्ष 2003 में मेरे विद्यालय में आना हुआ था। तत्कालीन प्रधानाचार्य तथा कहानीकार व एकांकीकार प्रभुनाथ सिंह प्रजेशने प्रिंसिपल बनने के बाद यह पहला बड़ा कार्य किया था, विद्यालय में पं० विद्यानिवास मिश्र के अभिनन्दन का भव्य आयोजन करना। वैसा भव्य साहित्यिक- सांस्कृतिक आयोजन फिर उस विद्यालय में नहीं हो सका, न उसके पूर्व और न उसके बाद। उस दिव्य समारोह में मञ्च- सञ्चालन के लिए सर्वसम्मति से हिन्दी / संस्कृत के अनुभवी विद्वान् और उसी विद्यालय से सेवानिवृत्त हिन्दी प्रवक्ता पं० सुरेश दत्त त्रिपाठी का नाम पहले से ही तय किया गया था, लेकिन सुरेश दत्त त्रिपाठी जी ऐन मौके पर कार्यक्रम शुरू होने से दो-तीन घण्टे पहले सञ्चालन करने से मना कर दिया। त्रिपाठी जी ने तत्कालीन प्रबन्धक हिफजुर्रहमान और प्रधानाचार्य प्रभुनाथ सिंह से मेरी अनुपस्थिति में मेरे नाम का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि आकाशवाणी में शशिबिन्दु नारायण मिश्र को मैंने बोलते हुए सुना है, वे सञ्चालन बढ़िया करेंगे, सञ्चालन उनसे ही कराया जाये। बहरहाल मेरे घर पर रामप्यारे परिचारक इस कार्य के लिए इमरजेंसी की सूचना लेकर पहुँचे और कहा कि मैनेजर और प्रिंसिपल ने आपको तत्काल बुलाया है। सुरेश दत्त त्रिपाठी जी हाईस्कूल संस्कृत विषय में और प्रभुनाथ सिंह जी जूनियर कक्षाओं में हिन्दी विषय में मेरे छात्र जीवन में शिक्षक रहे हैं। वाग्देवी की महान् कृपा से त्रिपाठी जी का और प्रभुनाथ सिंह जी का मुझ पर इस कार्य के निमित्त जो विश्वास किया गया, उसकी बेहतर ढंग से रक्षा हो सकी थी और स्वयं पं० विद्यानिवास मिश्र जी द्वारा मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहना कि तुमने अच्छी तैयारी से सञ्चालन किया है।इससे धन्यता का अनुभव हुआ था, पर सच में मुझे तैयारी का मौका मिला ही नहीं था। विद्यानिवास जी का मुझ पर तब से स्नेह और भी बढ़ गया था। कह सकता हूँ पं० विद्यानिवास मिश्र जी साक्षात् संस्कृति - पुरुष थे। अन्त में पं० विद्यानिवास मिश्र जी के गोरखपुर विश्वविद्यालय में एम० ए० संस्कृत विषय में सन् 1964-1966 बैच के टॉपर शिष्य रहे और बाद में उसी संस्कृत विभाग में वर्ष 2000 में प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त डॉ दशरथ प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में अपनी बात समाप्त करता हूँ –“प्रातः स्मरणीय,पूज्यपाद -मेरे गुरु पं० विद्यानिवास मिश्र सहज प्रतिभा के बहुश्रुत विद्वान् थे। गुरु जी ने कभी पुस्तक देखकर नहीं पढ़ाया। उनकी प्रतिभा, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी और भाषाविज्ञान में अप्रतिम थी। ऐसे साधक विद्वान् विश्व में बार-बार नहीं आते। उस महान् आत्मा को मेरा प्रणाम।”

 

शशिबिन्दुनारायण मिश्र

रानापार, बिशुनपुरा,

गोरखपुर,  उत्तर प्रदेश,

पिनकोड -273405

कविता


मनोरम छंद

1

हाय गर्मी

डॉ. अनिल कुमार बाजपेई ‘काव्यांश’

  

हाय  गर्मी   हाय गर्मी।

हे प्रभो कुछ डाल नर्मी।।

आसमानी   आग  बरसे।

चैन सुख को लोग तरसे।।

 

जल रही धू-धू धरा ये।

हे मनुज ये क्या किया रे।।

पेड़ सारे काट डाले।

खेत सारे पाट डाले।।

 

बन  रहे ऊँचे  भवन  क्यूँ।

जल रहे जंगल सघन क्यूँ।।

छील  डाली घास सारी।

लील डाली आस सारी।।

 

बन रही चौड़ी सड़क हैं।

पेड़  कटते बेधड़क हैं।।

हर तरफ सीमेंट पत्थर।

हाल होते और बद्तर।।

 

चेत जा अब भी समय है।

आ रही निश्चित प्रलय है।।

आग  पीना  आग  खाना।

आग ही अंतिम ठिकाना।।

***

 

वाचिक राधा छंद

2

सत्यपथ

 

सत्य नित होता प्रताड़ित यातना झेले ।

झूठ के मुख पर सदा मुस्कान है खेले ।।

अंत में पर सत्य की ही जीत है होती ।

झूठ की झूठी हँसी फिर बाद में रोती ।।

 

सत्य  होकर  भी अकेला ही पड़े भारी ।

झूठ के सौ पाँव फिर भी व्याप्त लाचारी ।।

सत्य  के चारों  तरफ सूरज करे फेरे ।

झूठ को तो भोर में भी घोर तम घेरे ।।

 

हाय पर मानव कहाँ ये बात सब माने ।

नित्य  ही  गाता  रहे वह झूठ के गाने ।।

झूठ  से अर्जित प्रतिष्ठा  में  रहे  फूला ।

छद्म सुख आनन्द का वो झूलता झूला ।।

 

सत्यपथ के जो पथिक हैँ शान से चलते ।

झूठ  के  राही  स्वयं को उम्र भर छलते ।।

इसलिए  मानव अभी से चेत तुम जाना ।

अन्यथा  तुझको  पड़ेगा व्यर्थ पछताना ।।

***

माधव मालती छंद

3

माँ

 

माँ उमा में माँ जया में, माँ बसी माँ भगवती में।

माँ यशोदा माँ अहिल्या, माँ विराजीं हैं सती में।।

उर्मिला  के आँसुओं में, देवकी  की  पीर में है।।

मांडवी  के  मौन  में है, माँ सिया के  नीर में है।।

 

स्वर्ग सी है गोद माँ की,कृष्ण सँग बलराम खेले।

शत्रुघन लक्ष्मण भरत के,साथ में श्रीराम खेले।।

श्री गजानन पार्वती की,गोद में सुखधाम पाते।

अंजना की गोद हनुमन,खेलते अभिराम पाते।।

 

देवकी की गोद पावन,जन्म लेते थे कन्हैया ।

पल बढ़े होते जहाँ पर,थीं यशोदा-गोद मैया ।।

युग बदल जाएँ करोड़ों,माँ सदा ही माँ रहेगी ।

चोट जब संतान खाये,आँख माँ की ही बहेगी ।।

***

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर