अंतर्राष्ट्रीय
योग दिवस :
योग
:भारत की अमूल्य निधि, विश्व कल्याण का
मार्ग
डॉ.
घनश्याम बादल
समय,
देश, भाषा और संस्कृति की सीमाओं को लांघकर
सम्पूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुई मानव सभ्यता की ज्ञान-परंपराओं में
योग ऐसी महान भारतीय परंपरा है, जिसने केवल शरीर और मन के संतुलन का मार्ग दिखाया है
और आत्मिक उन्नयन और वैश्विक सद्भाव का भी संदेश दिया है।
आज
जब संसार तनाव, अवसाद, असंतुलित
जीवनशैली, पर्यावरणीय संकट और मानसिक अशांति जैसी समस्याओं
से जूझ रहा है, तब योग मानवता के लिए एक प्रभावी और
वैज्ञानिक समाधान के रूप में उभरकर सामने आया है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष 21 जून को सम्पूर्ण विश्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस उत्साहपूर्वक मनाया
जाता है।
‘योग’ शब्द संस्कृत धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका
अर्थ है – जोड़ना, मिलाना अथवा एकीकरण करना। योग का वास्तविक
अर्थ है व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि
और आत्मा का समन्वय स्थापित करना। भारतीय दर्शन में योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं
है, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित
और सार्थक बनाने की एक संपूर्ण पद्धति है। इसी भावना को भगवद्गीता में व्यक्त किया
गया है- “समत्वं योग उच्यते।”
अर्थात् जीवन की
विभिन्न परिस्थितियों में संतुलन और समभाव बनाए रखना ही योग है।
योग
की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। इसके प्रारम्भिक संकेत वेदों,
उपनिषदों और पुराणों में मिलते हैं। महर्षि पतंजलि ने योग को
व्यवस्थित रूप प्रदान करते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रंथ योगसूत्र में योग की परिभाषा
दी –
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
अर्थात्
चित्त की वृत्तियों का निरोध या नियंत्रण ही योग है। महर्षि पतंजलि को योग दर्शन
का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। इनके अतिरिक्त महर्षि याज्ञवल्क्य,
गोरखनाथ, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, स्वामी शिवानन्द, बी.के.एस. अयंगर, पट्टाभि जोइस, स्वामी रामदेव तथा सद्गुरु जैसे अनेक योगाचार्यों ने योग के प्रचार-प्रसार
में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
योग
की अनेक शाखाएँ और पद्धतियों में राजयोग मन और ध्यान पर केन्द्रित है,
हठयोग शरीर और प्राणशक्ति के संतुलन पर बल देता है, कर्मयोग निष्काम कर्म का मार्ग दिखाता है, भक्तियोग
ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का मार्ग है, ज्ञानयोग
आत्मबोध और विवेक का मार्ग है तथा कुण्डलिनी योग आंतरिक चेतना के जागरण से
सम्बन्धित है। इन विभिन्न शाखाओं का अंतिम उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का समग्र
विकास और आत्मसाक्षात्कार है।
आधुनिक
युग में तो योग की उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गई है। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में
लोग तनाव,
उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा,
अनिद्रा, अवसाद और हृदय रोग जैसी समस्याओं से
ग्रस्त हैं। योगासन, प्राणायाम और ध्यान इन समस्याओं के
नियंत्रण और रोकथाम में अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। नियमित योगाभ्यास शरीर का
लचीलापन बढ़ाता है, रक्तसंचार को सुधारता है, प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाता है तथा मानसिक एकाग्रता और आत्मविश्वास
को विकसित करता है। वैज्ञानिक शोधों ने भी सिद्ध किया है कि योग तनाव हार्मोन को
कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।
योग
का महत्व केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति के नैतिक,
आध्यात्मिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
योग मनुष्य को संयम, अनुशासन, धैर्य,
करुणा और आत्मनियंत्रण का पाठ पढ़ाता है। यह व्यक्ति को बाहरी भौतिक
आकर्षणों से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। भारतीय
संस्कृति में योग को आत्मा और परमात्मा के मिलन का माध्यम माना गया है। इसी कारण
योग धर्म से ऊपर उठकर एक सार्वभौमिक जीवन-पद्धति के रूप में स्वीकार किया गया है।
योग
की जड़ें भारतीय सनातन परंपरा में हैं, किन्तु
इसका उद्देश्य किसी विशेष मत, पंथ या संप्रदाय का प्रचार
नहीं, बल्कि मानव कल्याण है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योग को
प्रतिष्ठित कराने में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2014 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव
को अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ और 177 देशों ने
सह-प्रायोजक बनकर इसका समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप 11
दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। 21
जून को इसलिए चुना गया क्योंकि यह वर्ष का सबसे लंबा दिन माना जाता है और भारतीय
परंपरा में इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
2015 में पहला अंतर्राष्ट्रीय
योग दिवस मनाया गया और तब से लेकर आज तक विश्व के लगभग सभी देशों में लाखों लोग
योगाभ्यास के माध्यम से इस दिवस को मनाते हैं। न्यूयॉर्क, लंदन,
पेरिस, टोक्यो, मॉस्को,
सिडनी और दुबई जैसे महानगरों में सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक योग
कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और ‘वसुधैव
कुटुम्बकम्’ की भावना का जीवंत उदाहरण है। योग ने भारत को विश्व मंच पर एक ऐसी
पहचान प्रदान की है जो शक्ति, शांति और स्वास्थ्य के समन्वय
का प्रतीक है।
आज
आवश्यकता इस बात की है कि योग को केवल एक वार्षिक उत्सव तक सीमित न रखा जाए,
बल्कि इसे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यालयों और परिवारों में योग की
संस्कृति विकसित की जानी चाहिए। योग हमें यह सिखाता है कि वास्तविक विकास केवल
आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन और जागृत चेतना से संभव है।
योग भारत की प्राचीन विरासत होने के साथ-साथ
आधुनिक विश्व की आवश्यकता भी है। यह शरीर को स्वस्थ, मन
को शांत, बुद्धि को प्रखर और आत्मा को प्रकाशित करता है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता
को संतुलित, स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन की ओर ले जाने वाला
वैश्विक अभियान है। आज जब पूरा विश्व अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है, तब योग का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है-
“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”
अर्थात्
स्वस्थ शरीर ही जीवन के सभी उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन है। योग इसी
स्वस्थ,
संतुलित और सार्थक जीवन की कुंजी है, जिसे
भारत ने विश्व को प्रदान किया है और जिस पर सम्पूर्ण मानवता को गर्व होना चाहिए।
डॉ. घनश्याम बादल


योग के विषय में उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारी देता बहुत अच्छा आलेख । हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर
जवाब देंहटाएं