सोमवार, 31 अगस्त 2026

आलेख

 



विकसित भारत : भाषा की भूमिका

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

2047 में भारत अपनी आज़ादी के सौ साल पूरे करेगा। उस दिन जब देश विकास की नई ऊँचाइयों पर खड़ा होगा, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि हमारी सड़कें कितनी चौड़ी हैं या जीडीपी कितनी ऊँची है। असली सवाल होगा कि, क्या आम भारतीय अपनी भाषा में सपने देख पा रहा है, अपनी भाषा में सीख पा रहा है और अपनी भाषा में आगे बढ़ पा रहा है?

विकास सिर्फ फैक्ट्रियों, फ्लाईओवरों और फाइनेंस का खेल नहीं है। विकास तब पूरा होता है जब ज्ञान, अवसर और अधिकार आम आदमी तक उसकी अपनी भाषा में पहुँचते हैं। भाषा सिर्फ बात करने का ज़रिया नहीं। भाषा सोचने, समझने, सृजन करने और आत्मविश्वास जगाने का माध्यम है। विकसित भारत की नींव भाषा पर ही टिकेगी।

विकसित राष्ट्र का मतलब:

विकसित राष्ट्र का मतलब सिर्फ अमीर होना नहीं है। एक सच्चा विकसित देश वह है जहाँ बच्चे अपनी माँ की भाषा में अच्छे से पढ़-लिख सकें, किसान अपनी भाषा में नई तकनीक समझ सके,  मरीज डॉक्टर से अपनी भाषा में बात कर सके, नौजवान अपनी भाषा में इंजीनियरिंग या मेडिसिन पढ़ सके, और आम नागरिक सरकारी दफ्तर में बिना किसी दुभाषिए के अपना काम करा सके। उल्लेखनीय है कि आर्थिक तरक्की, स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक, संस्कृति और पर्यावरण, इन सबको जोड़ने वाली कड़ी भाषा ही है।

2047 तक भारत क्या वाकई विकसित बन पाएगा:

भारत के पास बहुत कुछ है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी, डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप का जोश और तेजी से बनता इंफ्रास्ट्रक्चर। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और नई शिक्षा नीति जैसे अभियान उम्मीद जगाते हैं।

लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। शिक्षा की गुणवत्ता, बेरोज़गारी, क्षेत्रीय असमानता और सबसे बड़ी बात…भाषा की दीवार! आज भी उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और अच्छे रोजगार का बड़ा दरवाज़ा अंग्रेजी की चाभी से  ही खुलता है न! नतीज़ा यह है कि गाँव और छोटे शहरों का होनहार नौजवान अक्सर पीछे छूट जाता है। सिर्फ इसलिए कि उसकी भाषा ‘विकास की भाषा’ नहीं मानी जाती।

2047 का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब विकास सिर्फ आँकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि हर नागरिक तक पहुँचे। और इसके लिए भाषा को केंद्र में लाना होगा।

            विकास की असली ताकत है भाषा:

दुनिया का इतिहास गवाह है। जिन देशों ने अपनी भाषा को ज्ञान और विज्ञान की भाषा बनाया, वे तेज़ी से आगे बढ़े। जापान, दक्षिण कोरिया, चीन,  सबने अपनी भाषा में पढ़ाई और रिसर्च को प्राथमिकता दी। नतीज़ा सबके सामने है। अपनी भाषा में जब ज्ञान पैदा होता है तो समझ गहरी होती है, नवाचार बढ़ता है, उत्पादकता सुधरती हैऔर आत्मविश्वास जागता है।

            भाषा सिर्फ औज़ार नहीं, विकास की रीढ़ है:

बहुभाषिकता बोझ नहीं, खजाना है। भारत की सबसे बड़ी पहचान उसकी भाषाई विविधता है। इतनी भाषाएँ, इतनी बोलियाँ! यह दुनिया में कहीं और नहीं मिलता। कई लोग इसे समस्या मानते हैं। प्रशासन में मुश्किल, परीक्षाओं में उलझन, अनुवाद का झंझट; ये सब सच हैं। लेकिन दूसरी तरफ देखिए। हर भाषा अपने साथ एक अलग नज़रिया, एक अलग अनुभव और एक अलग ज्ञान लेकर आती है। यही विविधता रचनात्मकता और नवाचार की असली पूँजी है। बहुभाषी भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में आसानी से काम कर सकता है। क्षेत्रीय भाषाएँ स्थानीय व्यापार, पर्यटन, सिनेमा और साहित्य को ताकत देती हैं।

आज तकनीक ने बहुत सी पुरानी मुश्किलें आसान कर दी हैं। मशीन ट्रांसलेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल टूल्स भाषाओं के बीच पुल बना रहे हैं। अगर हम सही नीति अपनाएँ तो बहुभाषिकता विकास की रफ्तार बढ़ा सकती है, घटा नहीं सकती।

जनता की भाषा बनाम ताकत की भाषा:

यहाँ सबसे बड़ा सवाल है कि,  आम आदमी जिस भाषा में सोचता है, हँसता है, गाली देता है और सपने देखता है, क्या वही भाषा उसके विकास की भाषा भी है?

आज भी विज्ञान, तकनीक, कानून, मेडिसिन और ऊँची नौकरियों की भाषा मुख्य रूप से अंग्रेज़ी है। अंग्रेज़ी जानना बुरी बात नहीं। वैश्विक दुनिया में यह ज़रूरी कौशल है। समस्या तब पैदा होती है, जब अंग्रेज़ी ज्ञान और अवसर की अनिवार्य शर्त बन जाती है। तब भाषा सिर्फ माध्यम नहीं रहती, वह सामाजिक दीवार बन जाती है। ग्रामीण इलाके का मेधावी छात्र, छोटे शहर की लड़की या आम नागरिक अक्सर इसलिए पीछे रह जाते  हैं क्योंकि किताबें, परीक्षाएँ और नौकरियाँ उनकी भाषा में नहीं हैं। विकसित भारत तभी बनेगा जब यह दीवार गिरेगी।

कैसे गिरेगी भाषा की दीवार:

सबसे पहले ज़रूरत है भारतीय भाषाओं में मौलिक और उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री की। सिर्फ अनुवाद काफी नहीं। विज्ञान, तकनीक, कानून और मेडिसिन की किताबें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी जानी चाहिए।

तकनीक इस काम को आसान बना रही है। सरकार की “भाषिणी” जैसी पहलें, डिजिटल शब्दकोश और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अनुवाद सिस्टम भाषाई अंतर को पाटने में मदद कर रहे हैं। अगर हम इन उपकरणों को और मज़बूत करें तो ज्ञान की पहुँच बहुत बढ़ सकती है।

शिक्षा में मातृभाषा को प्राथमिकता देनी होगी। नई शिक्षा नीति इसी दिशा में है। बच्चे जिस भाषा में सहज हैं, उसी में उन्हें पढ़ाया जाए। अंग्रेजी को हटाएँ नहीं, बल्कि अतिरिक्त कौशल के रूप में सिखाएँ।

प्रशासन और न्याय व्यवस्था को भी जनता की भाषा में लाना होगा। सरकारी योजनाएँ, फॉर्म, अदालती प्रक्रियाएँ, सब सरल और स्पष्ट भाषा में उपलब्ध हों।

सबसे बड़ी चुनौती मानसिकता की है। अभी भी बहुत से लोग मानते हैं कि अंग्रेजी ही आधुनिकता और तरक्की की भाषा है। यह धारणा तभी बदलेगी जब भारतीय भाषाओं में उच्च स्तर का ज्ञान और अच्छे अवसर उपलब्ध होंगे। जिस दिन कोई छात्र हिंदी या तमिल में इंजीनियरिंग पढ़ सकेगा, कोई मरीज अपनी भाषा में डॉक्टर से बात कर सकेगा और कोई किसान अपनी भाषा में नई तकनीक सीख सकेगा, उस दिन असली बदलाव आएगा।

राजभाषाकर्मियों की नई जिम्मेदारी:

अब राजभाषा अधिकारी सिर्फ अनुवाद करने वाले या नियमों की पहरेदारी करने वाले नहीं रह सकते। उनकी नई भूमिका है: भारतीय भाषाओं में ज्ञान सामग्री तैयार करवाना, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भाषाओं को मज़बूत बनाना, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली का मानकीकरण, भाषा प्रौद्योगिकी के विकास में सक्रिय भागीदारी, हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच सेतु बनना। ऐसा करके ही वे अब विकास के उत्प्रेरक बन सकते हैं।

कुल मिलाकर, विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भाषा को विकास का केंद्रीय स्तंभ माना जाएगा। बहुभाषिकता को बोझ नहीं, संसाधन समझा जाएगा। जनता की भाषा को शक्ति की भाषा बनाया जाएगा। और तकनीक की मदद से भाषाई दूरी को पाटा जाएगा। क्योंकि भाषा सिर्फ संवाद नहीं है। भाषा पहचान है, आत्मविश्वास है और विकास की असली कुंजी है। 2047 का भारत तभी सच्चा विकसित भारत बनेगा, जबकि हर नागरिक अपनी भाषा में गर्व के साथ आगे बढ़ सके।

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डॉ. ऋषभदेव शर्मा 

परामर्शी (हिंदी)

दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र

मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी

हैदराबाद

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1 टिप्पणी:

  1. सुचिंतित आलेख, निःसंदेह भाषा औजार नहीं विकास की रीढ़ है, विकास की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब हम सब परस्पर अपनी भाषा में बात करेंगे. लेखक का यह कथन सत्य है कि 'कुल मिलाकर, विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भाषा को विकास का केंद्रीय स्तंभ माना जाएगा। बहुभाषिकता को बोझ नहीं, संसाधन समझा जाएगा'.. महत्वपूर्ण आलेख हेतु डॉ. ऋषभदेव जी को बहुत बहुत बधाई

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