बुधवार, 30 सितंबर 2026

संस्मरण


‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला आशीर्वाद

डॉ. स्मिता मिश्र

यह सर्वविदित है कि मेरे श्रद्धेय पिता शताब्दी-साहित्यकार डॉ० रामदरश मिश्र के आरम्भिक काव्यगुरु मनीषी रचनाकार पं० गणेशदत्त मिश्र ‘मदनेश’ थे। उन्हीं के आशीर्वाद और सत्प्रेरणा से पिता जी में कविता का आदिस्रोत फूटा था और वे कविता की राह पर हमेशा के लिए चल पड़े थे। पिता जी ने अपने आरम्भिक काव्यगुरु के रूप में मदनेश जी को अपनी अनेक कृतियों में आदरपूर्वक याद किया है। पर अफसोस है कि मुझे मदनेश जी का कोई व्यवस्थित साहित्य पढ़ने को अब तक नहीं मिल सका। इधर सुखद सूचना मिली है कि मदनेश जी के सुयोग्य प्रपौत्र साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न और लेखन कर्म से भी जुड़े श्री शशिबिन्दु नारायण मिश्र अपने प्रपितामह मदनेश जी की कृतियों को तलाशने और सहेजने में जी- जान से जुटे हुए हैं। लगता है कि मदनेश जी बड़े रचनाकार होकर भी अपनी रचनाओं के प्रकाशन और उससे होने वाली यशाकांक्षा तथा लाभों से बेपरवाह थे। शशिबिन्दु जी 4- 5 वर्ष मुझसे छोटे हैं, और वे आज से 35-40 वर्ष पहले से पिता जी (रामदरश मिश्र) के पास अत्यन्त शालीन भाव से दिल्ली स्थित उत्तम नगर आवास पर आते रहे हैं, माता- पिता दोनों लोगों से मदनेश जी के बारे में बात करके जानकारी जुटाते हुए मैं देखती रही हूँ। पिता जी जब भी गोरखपुर जाते तब भी शशिबिन्दु जी का उनसे मिलना-जुलना अवश्य होता था। पिता जी से शशिबिन्दु जी के बहुत सारे पत्र-व्यवहार भी हुए हैं, उसे मैंने देखा और पढ़ा है। शशिबिन्दु जी जब भी पिता जी के पास आते, तो अक्सर मुझसे भी भेंट हो जाया करती थी। 5-6 वर्ष पहले की एक घटना याद आ रही है, माता-पिता दोनों लोग जीवित थे,-शशिबिन्दु जी दिल्ली आये हुए थे, माता-पिता के पास बैठकर बातचीत चल रही थी, माँ सरस्वती देवी ने शशिबिन्दु से कहा - बेटा ! ऐसा कभी नहीं होता है कि साहित्य की चर्चा चल रही हो,कवि जी मदनेश जी की मस्ती और जिन्दादिली को याद न करते हों।” शशिबिन्दु जी ने इस बातचीत को अपने मोबाइल में रिकार्ड भी किया है।

पिछले वर्ष 2025 और इस वर्ष भी मेरा एक बड़े उद्देश्य को लेकर अपने गाँव (डुमरी) बहुत बार जाना-आना हुआ, तो शशिबिन्दु जी उस सन्दर्भ में काफी उपयोगी सिद्ध हुए।  सबको पता है कि - ‘रामदरश मिश्र के साहित्य में जल जवार और जीवन’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन रानापार में अतिशय भव्यता से हुआ था, जिसमें देश के अनेक जाने- माने साहित्यकार आये थे।

खैर, यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई है कि शशिबिन्दु जी ने आजादी पूर्व की अनेक पत्र- पत्रिकाओं में यत्र- तत्र प्रकाशित मदनेश जी की कुछ रचनाओं का संकलन किया है और शशिबिन्दु जी के सम्पादन में मदनेश जी की एक पुस्तक आ रही है। इसके लिए मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद और शुभकामना देती हूँ। यह शशिबिन्दु जी की आत्मशक्ति की प्रबलता ही है कि मदनेश जी की मृत्यु के करीब 50 वर्षों बाद भी दत्तचित्त होकर इस काम में लगे हुए हैं। साहित्यिक दृष्टि से उदास और आत्मशक्ति से निराश व्यक्ति यह पवित्र कार्य कदापि नहीं कर सकता है। आत्मशक्ति से युक्त साहित्यिक मिज़ाज का व्यक्ति ही इस तरह की नयी योजना बनाकर उन्हें क्रियान्वित कर सकता है।

वह व्यक्ति निश्चित रूप से बड़ा होता है जो अपने अतिविशिष्ट पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ भाव रखते हुए उन्हें स्मरणीय बनाये रखने के लिए कृत- संकल्पित होता है।

मेरे पिता पद्मश्री स्वर्गीय रामदरश मिश्र पूरी सदी  को नापने वाले संभवतः प्रथम भारतीय साहित्यकार रहे। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के कछार अंचल के अति पिछड़े गाँव डुमरी में सन् 1924 में जन्मे पिता जी ने उस अञ्चल की ऊर्जा लेकर हजारों कविताएँ लिखीं। उनके भीतर बचपन से ही कविता रच- पच रही थी, किंतु उनके कवित्व- अभिव्यक्ति को दिशा सुझाने और माँजने वाले पिता जी से उम्र में 33-34 वर्ष बड़े उस जमाने के प्रतिष्ठित कवि मदनेश जी थे। पं० गणेश दत्त मिश्र पिताजी के प्रथम- काव्य गुरु रहे जिन्हें पिताजी ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘एक दुनिया अपनी’ में बहुत आत्मीयता से याद किया है।

पिता जी ने मदनेश जी के बारे में जो कुछ लिखा, उसे पढ़कर मुझे लगता रहा कि वह केवल एक गुरु का स्मरण भर नहीं है, बल्कि अपने भीतर के उस छोटे से गाँव के लड़के की खोज भी है, जो बहुत संकोच और संकोच से भरे भय के साथ कविता की दुनिया में कदम रख रहा है ।

मैंने मदनेश जी को नहीं देखा किंतु पिताजी की कविताओं, संस्मरणों आत्मकथा, कहानियों में उनकी उपस्थिति को इतना पढ़ा और अनुभव किया कि लगता है कि वे हमारे आसपास ही थे और वास्तव में वे पास के रानापार गाँव के ही थे।

मदनेश जी का गाँव रानापार, मेरे पिता जी के गाँव डुमरी से लगा हुआ है। वे वहाँ के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। लोग उन्हें पंडित कहते थे, कवि कहते थे। पिताजी तब प्राथमिक विद्यालय के छात्र थे। स्वाभाविक ही था कि इतने बड़े व्यक्ति के सामने उनके मन में एक तरह का भय और संकोच हो। लेकिन शायद उस डर के भीतर ही आकर्षण का पहला बीज भी था। क्योंकि पिताजी के भीतर भी तब एक कविता जन्म लेने के लिए बेचैन थी। अभी वह कवि नहीं था। बस कभी- कभी भीतर से झाँकता था और फिर चुप हो जाता था। मदनेश जी से उनका पहला परिचय उनके व्यक्तित्व से नहीं, उनकी कविता से हुआ। बाढ़ के दिनों में स्कूल के बच्चे बाढ़- पीड़ितों के लिए चंदा माँगने निकले थे। मास्टर साहब ने पिताजी से एक गीत गाने को कहा। उन्होंने गाया –

“उजड़ गए हैं फिर क्या बसेंगे

हम पीड़ितों की पुकार सुन लो

ये राप्ती  का कछार सुन लो...।”

गीत उन्हें बहुत अच्छा लगा। बाद में पता चला कि वह गीत मदनेश जी ने लिखा था। देहात में बैठे हुए, किसी बड़े शहर की साहित्यिक सभा में नहीं, किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के लिए नहीं – बल्कि उसी मिट्टी के बीच, उसी जीवन को देखते हुए जिसमें बाढ़ आती थी, घर उजड़ते थे और लोग फिर बसने की कोशिश करते थे। मदनेश जी से  शायद कविता के द्वारा  यही पहला परिचय था – जीवन से निकली हुई कविता का। मदनेश जी से प्रत्यक्ष परिचय कुछ समय बाद हुआ। पिताजी कक्षा चार में पढ़ रहे थे। एक दिन मदनेश जी घूमते- घूमते स्कूल आ गए। मास्टर साहब ने उनसे कहा कि बच्चों को हिंदी पढ़ा दें। उन्होंने “नर हो न निराश करो मन को” कविता जिस तरह पढ़ाई, वह पिताजी के मन में इतनी गहराई से उतर गई कि उसकी अनुगूँज हमेशा बनी रही। फिर एक दिन एक सहपाठी ने कहा – “उसके गाँव का एक लड़का है। शहर में पढ़ता है और कविता लिखता है।” शायद यह बात पिताजी के भीतर कहीं चुभ गई। उन्होंने कहा –“मैं भी लिख सकता हूँ। देखो, आज लिखता हूँ।” उस शाम स्कूल के सामने बगीचे में कांग्रेस की सभा थी। उसी सभा को आधार बनाकर उन्होंने अपनी पहली कविता लिख डाली। कविता लिख तो दी, लेकिन अब समस्या यह थी कि उसे दिखाएँ किसे? अगले दिन मित्र दीनानाथ के साथ वे मदनेश जी के पास पहुँचे।मदनेश जी नीम के नीचे खाट पर बैठे थे। आज सोचती हूँ तो लगता है – वह नीम केवल एक पेड़ नहीं था। वह पिताजी के साहित्यिक जीवन की पहली पाठशाला था। लेकिन उस समय बालक रामदरश के लिए वह जगह भय से भरी हुई थी। जी धक-धक कर रहा था। मन में आशंका थी – इतने बड़े कवि हैं। मेरी पहली, टूटी-फूटी कविता पढ़ेंगे और कहेंगे –‘यह क्या लिख लाए हो!’ शायद कागज़ एक ओर रख देंगे। दीनानाथ ने हिम्मत करके कहा – “पंडित जी, इन्होंने एक कविता लिखी है। पहली कविता है। आपको दिखाने आए हैं।” मदनेश जी ने कविता पढ़ी। फिर उन्होंने जो कहा, वह मेरे पिताजी के जीवन में हमेशा के लिए दर्ज हो गया – “अरे, यह तो बहुत अच्छी कविता है। इसमें तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य के बीज सन्निहित हैं। एक दिन अवश्य अंकुरित होंगे, पल्लवित–पुष्पित होंगे और अपनी सुगंध से दिशाएँ भर देंगे।” उस समय पिताजी उस भाषा का पूरा अर्थ नहीं समझ पाए होंगे। लेकिन बच्चे को यह समझने के लिए किसी शब्दकोश की आवश्यकता नहीं होती कि सामने वाला उसे स्वीकार कर रहा है। वे खिल उठे। जाते-जाते मदनेश जी ने कहा– “हाँ, लिखते रहो और मुझे दिखाते रहो।” फिर जैसे अचानक उन्हें कुछ याद आया – “अरे हाँ, क्या नाम बताया – रामदरश मिश्र? हाँ, रामदरश मिश्र। तुम चन्नर भाई के बेटे हो न?” पिताजी कहते थे कि उस दिन उन्हें सबसे अधिक खुशी इस बात से हुई थी कि मदनेश जी उन्हें जानते हैं। किसी बड़े व्यक्ति का किसी छोटे बच्चे को पहचान लेना भी कभी-कभी उसके जीवन की दिशा बदल देता है। इसके बाद पिताजी कविता लिखने में जुट गए। जो कविता लिखते, मदनेश जी को दिखाते। मदनेश जी जहाँ भी होते, जितने भी व्यस्त होते, उनकी कविताएँ पढ़ते। बहुत ध्यान से पढ़ते। अपनी राय देते। कहीं आवश्यकता होती तो संशोधन करते।

यह केवल कविता की शिक्षा नहीं थी। यह किसी बच्चे को यह विश्वास देने की प्रक्रिया थी कि उसकी आवाज़ का भी कोई अर्थ है। गाँव में लोग मदनेश जी को लेकर दूसरी बातें करते थे। वे कहते – “कितना निकम्मा आदमी है। इतनी बड़ी जमींदारी बर्बाद कर दी। बस दरवाजे पर बैठकर किताबें पढ़ना और टोपी लगाए घूमना।” पिताजी तब इन बातों का अर्थ नहीं समझते थे। उनके लिए मदनेश जी केवल आदर के पात्र थे। बाद के वर्षों में उन्हें समझ आया कि गाँव जिसे निकम्मापन कह रहा था, उसके भीतर एक दूसरी ही साधना चल रही थी। मदनेश जी जमींदार के बेटे थे, लेकिन उनका मन पुस्तकों में था, कविता में था, मनुष्य में था। उनके भीतर एक वाल्मीकि था, एक कालिदास था, एक तुलसी था, एक कबीर था, एक निराला था। वह भीतर का कवि उन्हें संपत्ति जोड़ने से अधिक मनुष्य जोड़ने की ओर ले जाता था। आज पिताजी की कही बातें याद करती हूँ तो मुझे लगता है कि मदनेश जी ने उन्हें केवल छंद, कविता या भाषा नहीं सिखाई। उन्होंने उन्हें उससे भी बड़ी चीज़ दी – विश्वास। एक ऐसे बच्चे पर विश्वास, जो स्वयं अपने भीतर के कवि को लेकर आश्वस्त नहीं था। उन्होंने पहली कविता में भविष्य देख लिया था, जबकि वह बच्चा केवल एक कविता लिखकर आया था। और शायद यही किसी सच्चे गुरु की सबसे बड़ी पहचान है – वह शिष्य में वह देख लेता है, जो शिष्य स्वयं अपने भीतर नहीं देख पाता। मेरे पिताजी के लिए मदनेश जी केवल उनके पहले कविता-गुरु नहीं थे। वे उनके जीवन के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कहा –“तुम लिख सकते हो।” और किसी बनने वाले कवि के लिए इससे बड़ा पहला पुरस्कार क्या हो सकता है?

जब मैं पिताजी की उस आरंभिक यात्रा के बारे में सोचती हूँ, तो मेरी आँखों के सामने बार-बार एक ही दृश्य आता है – एक छोटा-सा गाँव। एक नीम का पेड़। उसके नीचे एक खाट। खाट पर बैठे एक कवि और उनके सामने संकोच से भरा एक छोटा- सा लड़का, जिसके हाथ में उसकी पहली कविता है। मदनेश जी उस कविता को पढ़ रहे हैं। और फिर कह रहे हैं – “लिखते रहो।” शायद उसी क्षण एक कवि का जन्म हुआ था। और शायद उसी क्षण एक गुरु ने अपने शिष्य को वह पहला दीप दिया था, जिसकी रोशनी बहुत दूर तक जानी थी।


डॉ. स्मिता मिश्र

प्रोफेसर

श्री गुरु तेग़ बहादुर खालसा कॉलेज,

दिल्ली विश्वविद्यालय

1 टिप्पणी:

  1. पिता रामदरश मिश्र जी एवं उनके काव्य गुरु मदनेश जी के आत्मीय एवं प्रेरक संस्मरण हेतु डॉ. स्मिता जी को साधुवाद। आदरणीय मिश्र जी का मुझ पर भी अत्यंत स्नेह रहा, उत्तम नगर में उनसे कई मुलाक़ातें हुईं, वहीं उनसे एक साक्षात्कार भी लिया था। नमन उस संत विभूति को 🙏

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