कहानी
बदनाम
बेटी !
डॉ. घनश्याम बादल
नेहा
जब भी शाम को अपने छोटे-से कमरे की खिड़की खोलती, उसकी
नज़र सामने बने आलीशान बंगले पर टिक जाती। चमचमाती कारें, रंग-बिरंगी
रोशनियाँ, सुंदर बगीचा और महंगे कपड़ों में घूमते लोग – उसे
लगता, जैसे दुनिया का सारा सुख उसी घर में बसता हो।
वह
अक्सर अपनी माँ कस्तूरी से कहती, “माँ, क्या गरीब आदमी को बड़े सपने देखने का अधिकार नहीं होता?” कस्तूरी मुस्कुरा देतीं, “सपने देखो बेटी, पर सपनों का रास्ता भी देखना।” नेहा मुस्कुराती, लेकिन
उसके सपनों का रास्ता हमेशा वास्तविकता से अलग होकर गुजरता था।
उसके
पिता जीतपाल सिंह एक छोटे सरकारी कर्मचारी थे। आय सीमित थी और नौकरी भी कभी नियमित
तो कभी अनियमित भुगतान वाली। घर में तीन बेटियाँ – संयोगिता,
सुरुचि और सबसे छोटी नेहा—तथा एक बेटा प्रकाश था। सीमित आय में घर
चलाना ही जीतपाल सिंह के लिए किसी युद्ध से कम नहीं था।
नेहा
सबसे छोटी थी, इसलिए सभी का स्नेह उसी पर अधिक था। वह
अपने भाई प्रकाश और दोनों बहनों पर भावनात्मक रूप से अधिकार भी जमाती थी। उसकी
छोटी-छोटी जिदें अक्सर पूरी हो जातीं। शायद यहीं से उसके भीतर यह विश्वास भी जन्म
लेने लगा कि जीवन उसकी इच्छाओं के अनुसार ही चलना चाहिए।
समय
का पहिया घूमता रहा। एक दिन अचानक हृदयाघात से जीतपाल सिंह चल बसे।घर जैसे एक ही
झटके में बूढ़ा हो गया।माँ कस्तूरी बीमार रहने लगीं। जिम्मेदारी प्रकाश के कंधों
पर आ गई। उसकी पत्नी किरण भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार घर संभाल रही थी।
कुछ
महीनों बाद अनुकंपा नियुक्ति पर दूसरी बेटी सुरुचि को पिता की नौकरी मिल गई। सबको
लगा कि अब परिवार की स्थिति सुधर जाएगी। लेकिन नौकरी मिलने के कुछ समय बाद उसकी
शादी हो गई और धीरे-धीरे उसने मायके से लगभग नाता ही तोड़ लिया। कस्तूरी कई बार
फोन करतीं। “बेटी, कभी मिलने भी आ जाया कर।”
उत्तर
आता – “माँ, बहुत व्यस्त हूँ।”और फोन कट जाता।
उधर
बड़ी बेटी संयोगिता का वैवाहिक जीवन भी सुखद नहीं रहा। एक दिन वह अपने ससुराल से
झगड़कर हमेशा के लिए मायके लौट आई। अब घर में बीमारी,
बेरोज़गारी, तनाव और जिम्मेदारियों का पहाड़
था। लेकिन नेहा अब भी सपने देखती थी।उसे विश्वास था कि उसका जीवन साधारण नहीं
होगा।
इन्हीं
दिनों उसका संपर्क अपने ही निकट रिश्तेदारी के युवक आर्यन से बढ़ा। दोनों बचपन से
एक-दूसरे को जानते थे। आर्यन का व्यापार तेजी से बढ़ रहा था। शहर में उसका नाम था,
पैसा था, प्रतिष्ठा थी।धीरे-धीरे दोनों के बीच
आत्मीयता प्रेम में बदल गई।एक दिन आर्यन ने स्पष्ट कहा – “नेहा, मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।” नेहा चुप रही। वह जानती थी कि समाज इस
रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा। रिश्तेदारी की मर्यादाएँ उनके बीच दीवार बनकर खड़ी
थीं।
लेकिन
दूसरी ओर उसे अपने सारे सपने साकार होते दिखाई दे रहे थे।कुछ दिन बाद उसने यह बात
घर में बताई।सबसे पहले प्रकाश बोला – “यह विवाह नहीं हो सकता। समाज कभी स्वीकार
नहीं करेगा।” किरण ने भी गंभीर स्वर में कहा – “रिश्ते केवल दो लोगों के नहीं होते,
पूरे परिवार के होते हैं।” कस्तूरी ने आँसू भरी आँखों से नेहा की ओर
देखा।
“बेटी... समाज में भी तो जीना है।” लेकिन नेहा का उत्तर स्पष्ट था – “समाज
मेरे लिए कब खड़ा हुआ था? जब पिताजी चले गए थे? जब माँ बीमार थीं? जब घर बिखर रहा था? तब समाज कहाँ था?”कमरे में सन्नाटा छा गया।दिन बीतते
गए। प्रकाश ने समझाया। किरण ने समझाया। संयोगिता ने भी कहा – “हर चमक सोना नहीं
होती नेहा।” लेकिन नेहा निर्णय ले चुकी थी।
एक
दिन वह घर छोड़कर आर्यन के पास चली गई। कुछ रिश्तेदारों ने परिवार का बहिष्कार कर
दिया। मोहल्ले में तरह-तरह की बातें होने लगीं। प्रकाश ने लोगों की बातें
सुनते-सुनते बाहर निकलना कम कर दिया। कस्तूरी की तबीयत और बिगड़ गई। लगभग एक वर्ष
बीत गया।
इसी
बीच एक दिन शहर के बड़े अखबार में एक समाचार प्रकाशित हुआ – “प्रसिद्ध उद्योगपति
आर्यन ने अपनी आधी संपत्ति पत्नी नेहा के नाम की।” पूरा मोहल्ला हैरान रह गया। जिन
लोगों ने सबसे अधिक आलोचना की थी, वही अब धीरे-धीरे
अपने स्वर बदलने लगे।
लगभग
छह महीने बाद प्रकाश के घर एक कार आकर रुकी। उसमें से नेहा उतरी। महँगे वस्त्र,
आत्मविश्वास और चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता। कस्तूरी ने उसे गले लगा
लिया। कुछ देर बाद सब बैठ गए। प्रकाश अब भी चुप था।
नेहा
ने अपने बैग से एक फ़ाइल निकाली। “भैया, इस पर
हस्ताक्षर कर दीजिए।” प्रकाश ने पूछा – “क्या है?”
“हमारे पुराने घर के पुनर्निर्माण की योजना।” प्रकाश चौंक गया।
नेहा
बोली – “मैंने शहर के बाहर एक छोटा अस्पताल बनवाने का निर्णय लिया है। उसका नाम
होगा – “जीतपाल-कस्तूरी सेवा सदन।” किरण अवाक रह गई।
नेहा
आगे बोली – “माँ का इलाज भी वहीं होगा।” प्रकाश की आँखें भर आईं। उसे पहली बार लगा
कि शायद उसने अपनी बहन को केवल उसके निर्णय से आँका था। लेकिन असली आश्चर्य अभी
बाकी था।नेहा ने दूसरी फ़ाइल सामने रखी। “यह संयोगिता दीदी के नाम है।” संयोगिता ने काँपते हाथों से कागज़ खोला। उसमें
एक महिला कौशल केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव था।
“दीदी, अब आपको किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।” तीसरी
फ़ाइल किरण के सामने रखी गई। “भाभी, आपने इस घर को कभी टूटने
नहीं दिया। इस केंद्र की पूरी जिम्मेदारी आपकी होगी।” कमरे में किसी के पास शब्द
नहीं थे। तभी प्रकाश ने धीमे स्वर में पूछा – “नेहा... एक बात बताओ। क्या तुमने यह
विवाह केवल पैसे के लिए किया था?”
नेहा
मुस्कुराई। “यदि केवल पैसे के लिए करती तो आज यहाँ लौटकर क्यों आती?” सब उसकी ओर देखने लगे।नेहा ने गहरी साँस ली। “भैया... आपको एक बात आज तक
नहीं पता।” कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
“पिताजी के जाने के बाद मैंने कई बार देखा था कि माँ दवा न खरीदकर हमारे
लिए राशन ले आती थीं। आपने अपनी पढ़ाई छोड़ी। भाभी ने अपने गहने बेच दिए। संयोगिता
दीदी टूट चुकी थीं। सुरुचि ने मुँह मोड़ लिया था। उस दिन मैंने तय किया था कि मैं
गरीबी से समझौता नहीं करूँगी।” वह कुछ क्षण रुकी। “हाँ... मैंने संपन्न जीवन चाहा
था। लेकिन केवल अपने लिए नहीं। मैं इस परिवार को फिर कभी विवश नहीं देखना चाहती
थी।” किरण की आँखों से आँसू बह निकले।
उसी
समय नेहा ने एक और रहस्य खोला – “और एक बात... आर्यन ने मुझसे विवाह करने से पहले
एक शर्त रखी थी।” सबने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। “उसने कहा था – यदि तुम केवल धन
के लिए आ रही हो तो यह विवाह नहीं होगा। यदि अपने परिवार को साथ लेकर चलना चाहती
हो,
तभी मैं तुम्हारा हाथ पकड़ूँगा।” प्रकाश स्तब्ध रह गया।
जिस
युवक को वह केवल धनवान समझ रहा था, वह भीतर
से इतना उदार निकलेगा, इसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
नेहा
ने मुस्कुराकर कहा – “भैया, रिश्ते समाज बनाता है,
लेकिन परिवार त्याग से बनता है।” उस दिन वर्षों बाद जीतपाल सिंह का
घर फिर से घर लग रहा था।हाँ, एक कमी फिर भी थी। सुरुचि अब भी
नहीं आई थी। लगभग दो महीने बाद एक और घटना हुई। सुरुचि का पति आर्थिक संकट में फँस
गया। जिन लोगों के भरोसे उसने मायके से दूरी बनाई थी, वही
लोग साथ छोड़ गए।आखिरकार वह उसी घर के दरवाजे पर खड़ी थी, जिसे
उसने कभी भुला दिया था।दरवाजा खोला किरण ने।
कुछ
कहने से पहले ही सुरुचि रो पड़ी। नेहा आगे बढ़ी और बिना एक शब्द कहे उसे गले लगा
लिया। प्रकाश ने पहली बार महसूस किया कि परिवार की सबसे बड़ी शक्ति न्याय नहीं,
क्षमा होती है। शाम को आँगन में सब साथ बैठे थे।
कस्तूरी
ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा – “जीतपाल, देखो...
हमारा घर फिर बस गया।” हवा का एक झोंका आया। आँगन में रखा दीपक लौ की तरह डोलकर
फिर स्थिर हो गया।
नेहा
ने उस लौ को देखते हुए मन ही मन कहा—“सपने देखना ग़लत नहीं होता। गलत तब होता है
जब सपनों में अपनों के लिए जगह न बचे।” उस दिन उसे पहली बार लगा कि उसने विलासिता
नहीं,
अपना वास्तविक आसमान पा लिया है।
***
डॉ. घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड - 247667


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