क्रांतिकारी
डॉ.भगवान दास माहौर (शिवजी श्रीवास्तव)
कुमार
कार्तिकेय
शहादत
और विद्वत्ता के दुर्लभ संयोग की गाथा है – क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर
डॉ.
शिवजी श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘क्रांतिकारी
डॉ. भगवान दास माहौर’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे
नायक के जीवन और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है, जिन्हें
इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। यह
पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उस कालखंड का आइना
है जब देश की युवा पीढ़ी ‘क्रांति’ और ‘आजादी’ के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर
थी।
लेखक
ने डॉ. भगवान दास माहौर की जीवन-यात्रा को अत्यंत जीवंत,
भावपूर्ण और ऐतिहासिक सटीकता के साथ प्रस्तुत किया है जहाँ न केवल
उनके अदम्य साहस और प्रतिबद्धता को दिखाया गया है, बल्कि उस
दौर की राजनीति, क्रांतिकारी भावना और आत्म-त्याग की भावना
भी पाठक तक प्रभावित ढंग से पहुँचती है। सम्पूर्ण पुस्तक को निम्नांकित शीर्षकों
में देखा जा सकता है -
1. नायक का
व्यक्तित्व और संघर्ष-
पुस्तक
के मुख्य पात्र डॉ. भगवान दास माहौर एक बहुआयामी व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने
किशोरावस्था में ही क्रांतिकारी अभियान से जुड़ने का निर्णय लिया और ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी’ के अनुशासित सैनिक बने।
चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी के विश्वस्त सहयोगी के रूप में
उन्होंने कठोर-सघन संघर्ष का अनुभव किया। शिवजी श्रीवास्तव ने उनकी ‘भुसावल बम कांड’ से लेकर ‘अंडमान
की सेलुलर जेल’ तक की कठोर यात्रा को बहुत ही मार्मिक ढंग से
चित्रित किया है।
2. कलम और
पिस्तौल का संगम-
इस
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह डॉ. माहौर के बौद्धिक पक्ष को उजागर करती
है। वर्षों तक फरारी जीवन, क्रांतिकारी योजनाओं में
भागीदारी और जेल यात्रा और फिर रोके गये
शिक्षा को बाद में जारी रखते हुए पीएच.डी. तथा शोध-कार्य से उच्च-शैक्षणिक
उपाधियाँ भी अर्जित कीं। जेल से छूटने के बाद उन्होंने जिस तरह से साहित्य और शोध
के क्षेत्र में कार्य किया, वह प्रेरणादायक है। लेखक ने यह
बखूबी दिखाया है कि कैसे एक हाथ में पिस्तौल थामने वाला क्रांतिकारी, दूसरे हाथ में कलम पकड़कर समाज को नई दिशा दे सकता है।
3. लेखन
शैली और शोध-
शिवजी श्रीवास्तव जी की भाषा सरल लेकिन
प्रभावशाली है। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई समझौता नहीं किया है। पुस्तक
को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे पाठक स्वयं उस दौर की गुप्त बैठकों और जेल की
कालकोठरियों का हिस्सा बन गया हो। लेखक का शोध सराहनीय है,
क्योंकि उन्होंने उन छोटी-छोटी घटनाओं को भी संजोया है जो डॉ. माहौर
के चरित्र निर्माण में सहायक रहीं।
पुस्तक
में इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं रह जाता, बल्कि
उन तथ्यों में मानवता, प्रेम, साहस और
स्वाधीनता की चाह का गहरा रंग भर देता है। यह शैली खासकर युवा पाठकों को प्रेरित
करने वाली है कि वे उन वीरों के बलिदानों
को समझे, आत्मसात करें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी
सुनिश्चित करें और आज़ादी की भावना को नई ऊर्जा दें।
4. किसके
लिए है यह पुस्तक?
“क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास
माहौर” उन पाठकों के लिए अनिवार्य है जो भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की गहराई को
समझना चाहते हैं, अनछुई कहानियों को जानना चाहते हैं और जो
प्रेरणादायी जीवन-कथाओं से सीखना चाहते हैं। शिवजी श्रीवास्तव जी ने इस पुस्तक के
माध्यम से एक भूले-बिसरे नायक को वह सम्मान दिलाने का सफल प्रयास किया है, जिसके वे पात्र थे। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि आजादी केवल अहिंसक
आंदोलनों से नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम क्रांतिकारियों के
रक्त और बौद्धिक विमर्श से भी उपजी है। यह पुस्तक इतिहास के उन वीरों को सम्मान
देने वाली एक सशक्त रचना है, जिसे हर स्वतन्त्रता-प्रेमी
पाठक को पढ़ना चाहिए।
एक पंक्ति में: यह पुस्तक “शहादत और
विद्वत्ता” के दुर्लभ संयोग की गाथा है।
***
समीक्षक - कुमार
कार्तिकेय, लेखक - शिवजी श्रीवास्तव, पृष्ठ - 142, मूल्य - 210 रुपये, संस्करण - प्रथम 2025,
प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नई दिल्ली -110070
कुमार
कार्तिकेय
नोएडा
उ. प्र.



मेरी पुस्तक की समीक्षा प्रकाशित करने हेतु धन्यवाद 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया !
जवाब देंहटाएं