बुधवार, 30 सितंबर 2026

ग़ज़ल


दुष्यंत कुमार

नज़ाकत से हमारे दिल पे बिजली क्यूँ गिराती हो,

दग़ा देकर वफ़ा अपनी हमें क्यूँ कर दिखाती हो।

 

सभी को जाम देती हो, मुझे ही टाल जाती हो,

रकीबों से जरा मिलकर, मुझी को क्यूँ सताती हो।

 

क़सम देकर ज़माने की, मुझे क्यूँ भूल जाती हो,

जला कर मेरे ख़त उनको, हवा में क्यूँ उड़ाती हो।

 

जगाती चाह अनबूझी, नयन से क्या इशारा है,

दबाकर होंठ दाँतों से, जिया को क्यूँ जलाती हो।

 

झुकी नज़रें, लपेटा उंगलियों में अपना ही दामन,

गजब शोखी है चेहरे पे, जहाँ से क्यूँ छिपाती हो।

 

लबों पर हैं तबस्सुम पर, निगाहों में शरारत है,

छुपा कर जुल्फ में क़ातिल, घटा घनघोर लाती हो।

 

ज़माने भर से लड़ता हूँ, तुम्हारे इक इशारे पर,

हमेशा तुम मुझे हंस कर,मगर क्यूँ आज़माती हो।

 

चरागों से नहीं ‘दुष्यंत’ ये दिल जलने वाला है,

बुझा कर मेरी उम्मीदें, अँधेरा क्यूँ बढ़ाती हो।

***

दुष्यंत कुमार स्मारक

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्राध्यापक गणित

रतलाम - मध्यप्रदेश


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