आलेख
शिक्षक
गुरु से गूगल तक :
अपरिहार्य
है शिक्षक
डॉ. घनश्याम बादल
किसी
राष्ट्र के भविष्य की सबसे विश्वसनीय तस्वीर उसके विद्यालयों में होती है इसीलिए
शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, समाज के
भविष्य का शिल्पकार है।
भारत
में शिक्षक की भूमिका को समझने के लिए हमें अपनी पुरातन गुरु-परंपरा की ओर देखना
होगा। उस समय गुरु ज्ञान का माध्यम ही नहीं, जीवन का
मार्गदर्शक भी था। विद्यार्थी उसके पास केवल विषय नहीं बल्कि जीवन जीने की कला
सीखता था। गुरु का आचरण शिक्षा का हिस्सा था। उसके शब्दों से अधिक उसकी
जीवन-पद्धति विद्यार्थी को प्रभावित करती थी।
आज
परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल गई हैं। गुरु के स्थान पर शिक्षक है,
गुरुकुल के स्थान पर विद्यालय और पुस्तक के साथ मोबाइल, इंटरनेट तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान की दुनिया को विद्यार्थी की अँगुलियों
तक पहुँचा दिया है। कभी विद्यार्थी ज्ञान के लिए शिक्षक को खोजता था, आज शिक्षक को विद्यार्थी का ध्यान आकर्षित करने के लिए संघर्ष करना पड़ता
है। यही आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी विडंबना है।
ज्ञान
बढ़ा है,
लेकिन क्या ज्ञान का विवेक भी उतना ही बढ़ा है? आज एक विद्यार्थी कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी विषय पर हजारों सूचनाएँ
प्राप्त कर सकता है लेकिन सूचना और ज्ञान अलग-अलग हैं। ज्ञान और विवेक तो उससे भी
अलग हैं। इंटरनेट यह बता सकता है कि दुनिया में क्या हो रहा है, लेकिन यह नहीं बता पाता कि उसमें सही क्या है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर
दे सकती है, लेकिन हर उत्तर को जीवन में लागू करने का निर्णय
मनुष्य को ही लेना होगा।
यहीं
से आधुनिक शिक्षक की वास्तविक भूमिका शुरू होती है।
पुरातन
गुरु के पास सूचनाएँ सीमित थी, लेकिन प्रभाव गहरा
था। आज शिक्षक के पास सूचना देने की आवश्यकता कम हो गई है, लेकिन
दृष्टि देने की आवश्यकता कई गुना बढ़ गई है। उसे विद्यार्थी को यह सिखाना होगा कि
उपलब्ध सूचनाओं में सत्य को कैसे पहचाना जाए, तर्क और अफवाह
में अंतर कैसे किया जाए तथा ज्ञान को जीवन और समाज के हित में कैसे इस्तेमाल किया
जाए।
पुरातन शिक्षा की एक बड़ी ताकत शिक्षक और
विद्यार्थी के बीच का आत्मीय संबंध था।
उसकी क्षमता, स्वभाव, कमजोरियों और संभावनाओं को समझता था। आधुनिक शिक्षा में यह रिश्ता औपचारिक
होता जा रहा है। बड़ी कक्षाएँ, परीक्षा का दबाव, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ और परिणामों की प्रतिस्पर्धा शिक्षक को
विद्यार्थी से दूर कर रही हैं। इस दूरी की कीमत केवल शिक्षा ही नहीं, समाज भी चुका रहा है।
जिस
बच्चे को शिक्षक प्रश्न पूछने पर प्रोत्साहित करता है,
उसमें जिज्ञासा पैदा होती है। जिस बच्चे की हर ग़लती पर उपहास होता
है, उसमें भय पैदा होता है। जिस विद्यार्थी को केवल अंक और
रैंक के तराजू पर तौला जाता है, वह धीरे-धीरे सफलता को जीवन
का एकमात्र मूल्य मानने लगता है। यहां पुरानी और नई शिक्षा दोनों से सीखने की
आवश्यकता है।
पुरातन
व्यवस्था हमें अनुशासन, श्रम, आत्मसंयम, गुरु के प्रति सम्मान और जीवन-मूल्यों की
शिक्षा देती है। आधुनिक ने वैज्ञानिक दृष्टि, स्वतंत्र चिंतन,
तकनीकी दक्षता, रचनात्मकता और करियर के नए
अवसर खोले हैं। समस्या पुराने या नए होने में नहीं, समस्या
किसी एक को पूर्ण सत्य मान लेने में है। पुराना शिक्षक केवल अनुशासन दे और नया
शिक्षक केवल स्वतंत्रता, दोनों अधूरे हैं।
आज
के विद्यार्थी को ऐसा शिक्षक चाहिए जो अनुशासन के साथ संवाद कर सके और स्वतंत्रता
के साथ जिम्मेदारी भी सिखा सके। जो उसे यह कहने का साहस दे कि ‘प्रश्न करो’,
लेकिन साथ ही यह विवेक भी दे कि प्रश्न करने और केवल विरोध करने में
अंतर होता है। आज शिक्षक की भूमिका इसलिए और कठिन हो गई है क्योंकि वह केवल
पाठ्यपुस्तक से प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहा। वह सोशल मीडिया, मनोरंजन
उद्योग, डिजिटल प्रभावकों और असंख्य आभासी सूचनाओं से भी
प्रतिस्पर्धा कर रहा है। विद्यार्थी का ध्यान लगातार बंट रहा है। ऐसे में शिक्षक
को केवल अच्छा वक्ता नहीं, बल्कि अच्छा संवादकर्ता बनना होगा,
विद्यार्थी के मन तक पहुंचना होगा।
करियर
के स्तर पर भी शिक्षक की भूमिका बदल गई है। पहले करियर के विकल्प सीमित थे और
शिक्षक प्रायः कुछ पारंपरिक रास्तों की ओर मार्गदर्शन करता था। आज नई-नई नौकरियाँ
और व्यवसाय सामने आ रहे हैं। तकनीक कई पुराने रोजगारों का स्वरूप बदल रही है और नई
क्षमताओं की मांग पैदा कर रही है। ऐसे में शिक्षक का काम किसी एक पेशे की ओर
धकेलना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को अपनी क्षमता
पहचानने और बदलती दुनिया के अनुरूप सीखते रहने योग्य बनाना है लेकिन करियर से भी
बड़ी चीज है- चरित्र।
यदि
शिक्षा केवल अधिक वेतन पाने की प्रतियोगिता बन गई तो हम कुशल कर्मचारी तो तैयार कर
सकते हैं,
अच्छे नागरिक नहीं। देश को डॉक्टर, इंजीनियर,
वैज्ञानिक, अधिकारी और उद्यमी चाहिए, लेकिन उससे पहले उसे ईमानदार, संवेदनशील और
जिम्मेदार मनुष्य चाहिए।यहीं शिक्षक का राष्ट्र निर्माण से सीधा संबंध स्थापित
होता है।
केवल
विद्यालय नहीं, घर का वातावरण, माता-पिता
का व्यवहार, सामाजिक परिवेश, मीडिया,
मित्र मंडली और डिजिटल संसार से मिलकर बच्चे का व्यक्तित्व बनाते
हैं इसलिए समाज को शिक्षक के साथ सहयोग करना होगा, उस पर
सारी जिम्मेदारी डालकर मुक्त नहीं हो सकते ।
शिक्षक
की भी समाज से कुछ अपेक्षाएँ हैं। उसे सम्मान केवल शिक्षक दिवस पर फूल देकर नहीं,
बल्कि उसकी व्यावसायिक गरिमा स्वीकार करके दिया जाना चाहिए।
अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाना चाहिए। उसे लगातार सीखने और
अपनी शिक्षण क्षमता विकसित करने के अवसर मिलने चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण – उसे
विद्यार्थी के हित में निर्णय लेने का अधिकार और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
आज
का सबसे श्रेष्ठ शिक्षक वह है जो विद्यार्थी को सोचना सिखा दे।वह शिक्षक जो
विद्यार्थी को अपने उत्तर पर निर्भर न बनाए, बल्कि
उसे स्वयं उत्तर खोजने की क्षमता दे। जो परीक्षा में अच्छे अंक के साथ असफलता सहने
का साहस दे। प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग
सिखाए, अधिकारों के साथ कर्तव्य समझाए,तकनीक
का इस्तेमाल करे, लेकिन तकनीक का गुलाम न बने।
यह
कहना कठिन है कि पुरातन शिक्षक श्रेष्ठ था या आधुनिक शिक्षक। पुरातन गुरु के पास
वह आत्मीयता और जीवनानुभव था जिसकी आज कमी महसूस होती है। आधुनिक शिक्षक के पास
विज्ञान और तकनीक की वह शक्ति है जिसकी कल्पना पुरानी शिक्षा व्यवस्था में संभव
नहीं थी। श्रेष्ठता इन दोनों को जोड़ने में है।
हमें
पुराने गुरु का चरित्र और आधुनिक शिक्षक का कौशल, गुरु
की आत्मीयता और आधुनिक शिक्षा की वैज्ञानिकता, परंपरा की
जड़ों और भविष्य की दृष्टि – इन सबको एक साथ लेकर चलने वाला शिक्षक चाहिए। आने
वाले समय में मशीनें बहुत कुछ सिखा देंगी, लेकिन मनुष्य को
मनुष्य बनाने का काम मशीनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए नए युग का शिक्षक ‘ज्ञान
का गोदाम’ नहीं, विवेक का दीपक होना चाहिए।
शिक्षक
विद्यार्थी को यह न बताए कि दुनिया कैसी है,उसे यह
समझने की क्षमता दे कि दुनिया कैसी होनी चाहिए और उसे बेहतर बनाने में उसकी अपनी
भूमिका क्या है। कक्षा में खड़ा शिक्षक इसलिए केवल शिक्षक नहीं,आने वाले भारत का चरित्र-निर्माता है। हमें यह ध्यान में रखकर शिक्षक को
मान, सम्मान और अधिकार व स्वतंत्रता के साथ-साथ दायित्व भी
देना होगा।
डॉ. घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड - 247667


प्राचीन काल से अद्यतन बदलते हुए समय और सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में शिक्षक की भूमिका और महत्ता को प्रतिपादित करता सुन्दर आलेख। डॉ. घनश्याम बादल जी को बधाई।
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