सोमवार, 31 अगस्त 2026

तेवरी

 



डॉ. ऋषभदेव शर्मा

 

है उमस, है घुटन घोर परिवेश में

वे पवन-राग गाते फिरें देश में

 

वे सदा ही रहें युद्ध के वेश में

हम न आएँ कभी किंतु आवेश में

 

‘रोम’ के नाश को एक ‘नीरो’ रहा

आज अनगिन मिलें खद्दरी भेष में

 

दोस्त के व्यंग्य की दोमुखी धार है

काटती सूत्र सब एक लवलेश में

 

नित्य नूतन रहें और रमणीय वे

हम बदलते रहें रोज़ अवशेष में

 

हम अड़े रह गए आचरण में पड़े

वे कुशल हो गए किंतु उपदेश में

 

मूक भाषा नयन की पढ़ो तो पढ़ो

और क्या हम कहें आज संदेश में

***



डॉ. ऋषभदेव शर्मा

परामर्शी (हिंदी)

दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र

मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी

हैदराबाद

1 टिप्पणी:

अक्टूबर 2026, अंक 76

  शब्द-सृष्टि अक्टूबर 2026, अंक 76 संपादकीय – स्वागत है दीपोत्सव ! – डॉ. पूर्वा शर्मा   परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से..... – दि...