बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

आलेख


‘हृदय राम का, पर निर्णय कृष्ण का’

श्रीराम पुकार शर्मा

‘क्या व्यक्ति को अपने जीवन में केवल तथाकथित अच्छा चरित्रवान बने रहना ही पर्याप्त है, या फिर उसके साथ ही बौद्धिक समझदारी भी आवश्यक है?’

आप में से अधिकांश लोगों का उत्तर, जीवन में बौद्धिक समझदारी के पक्ष में ही होगा । यही जीवन का यथार्थ भी है । विशेषकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, तो यह पूर्ण अपेक्षित है । आज कदम-कदम पर लोगों की चतुराई, कुटिलता, स्वार्थ-भाव आदि अपने विविध आडंबरपूर्ण स्वरूप को धारण किए हुए, हमारे मार्ग को रोके खड़े रहते हैं । ऐसे में चरित्रवान बने रहकर हमारी सरलता दुनियादारी के लिए पर्याप्त नहीं रह जाती है, बल्कि कुछ बौद्धिक कठोरता भी आवश्यक हो जाती है । अहंकारी समुद्र के समक्ष सबके प्रति दया-भाव रखने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी को भी, सक्रोध बाण धारण करना ही पड़ा था ।

 “बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति ।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ॥”

--- सुंदरकाण्ड, ५७

यह जीवन एक महासंग्राम है, जिसमें परिस्थितियों के, सम्बन्धों के और कार्य-व्यापारों के घात-प्रतिघात प्रतिपल चलते ही रहते हैं । इसमें मनुष्य को, न केवल बाह्य-परिस्थितियों से, बल्कि कभी-कभी उसे अपनी अंतःभावनाओं से भी जूझना पड़ता है । समय के साथ ही अपने विचारों और व्यवहारों में आंशिक परिवर्तन अनिवार्य हो जाता है । चाहे वह परिवर्तन किसी के अनुकूल हो, या फिर प्रतिकूल ही हो । ऐसी द्वन्द्वात्मक स्थिति में एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है कि क्या हम केवल दूसरों की दृष्टि में ‘अच्छे’ बनकर जीवन को जी सकते हैं, या फिर परिस्थिति के अनुसार अपने विचार को भी बदलना अनिवार्य हो जाता है ? ऐसी ही जटिल द्वंद्वातमक स्थिति के समाधान स्वरूप जीवन का एक महत्वपूर्ण और संतुलित सूत्र उभरता है -

“भाव राम का पावन हो, पर निर्णय कृष्ण का प्रखर;
यही संतुलन जीवन का, बनता है पथ का सच्चा स्वर ।”

समयानुसार मनुष्य के भीतर प्रायः दो प्रेरक शक्तियाँ कार्य करती हैं – प्रथम, - भावना (हृदय) और द्वितीय, - बुद्धि (विवेक) । भावना या हृदय हमें अपने प्रियजनों से जोड़ी रहती है तथा मन में उनके प्रति प्रेम, करुणा और सहानुभूति को जागृत करती है । हमारी यही कोमल भावना, अपने प्रिय जनों की गलतियों या कमियों को ढक देती है; परिणामस्वरूप हमें उनमें कोई दोष दिखाई नहीं देते हैं । जैसे हमें अपने नटखट बालक भी सद्गुणों से पूर्ण प्रतीत होते हैं, क्योंकि वे हमारे हृदय (भावना) से जुड़े रहते हैं, जबकि पराए बालकों के सद्गुण भी हमें दुर्गुण के रूप में दिखाई देते हैं ।

इसके विपरीत, बुद्धि या विवेक, हमें किसी को सही परखने, सही कठोर निर्णय लेने और परिणामों का पूर्व आकलन करने की क्षमता प्रदान करती है । लेकिन देखा गया है कि बुद्धि या विवेक का ज्यादा प्रयोग हम प्रायः अक्सर दूसरों के आचरण को परखने और उनका मूल्यांकन करने में किया करते हैं, अपनों के सम्मुख यह भाव अक्सर नरम पड़ जाते हैं । सांसारिक व्यक्ति के लिए इस कठोर भाव-दृष्टिकोण को भी सर्वथा उचित नहीं ठहराया जा सकता । अतः लोक जीवन में इन दोनों प्रेरक शक्तियों के बीच उचित संतुलन अपेक्षित हो जाता है । संतुलित हृदय और विवेकशील बुद्धि के परस्पर समन्वय से किया गया कर्म ही सर्वदा श्रेष्ठ होता है । श्रीकृष्ण ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में ‘बुद्धि-युक्त’ कर्म करने लिए सभों को प्रेरित किया है -

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥” ५०॥

---- सांख्य योग, श्रीमद्भागवात गीता

अर्थात्, - ‘तू योग या समत्व भाव में लग जा । क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता लाता है और कर्म बंधन से छूटने का उपाय है । जीवन में न केवल हृदय-भाव और न केवल बुद्धि-विवेक, अपितु दोनों का उचित संतुलन ही कर्म को श्रेष्ठ बनाता है ।’

ऐसे में कहा जा सकता है कि यदि व्यक्ति में केवल भावना या हृदय ही प्रधान हो, तो वह परिस्थितियों से वशीभूत होकर अत्यधिक भावुक, संवेदनशील और कभी-कभी विवश या निर्णयहीन हो जाता है । वह अपनों के दुःख और मोह से इतना प्रभावित हो जाता है कि सही और गलत का विवेक खो बैठता है । शैल्य-चिकित्सक के हाथ भी अपने प्रियजनों के शैल्य-कार्य करने में काँप जाते हैं । दूसरी ओर, यदि व्यक्ति में केवल विवेक-बुद्धि ही प्रधान हो, तो वह अत्यधिक तार्किक और निष्ठुर बन सकता है, जिससे सम्बन्धों की ऊष्मा घटकर शुष्क हो जाते हैं । दूसरों या अपरिचितों बच्चों के प्रति हमारा व्यवहार अक्सर कुछ कठोर ही हो जाया करता है । महाराज धृतराष्ट्र सम्राट के उच्च सिंहासन पर बैठकर भी अपने पुत्रों और पाण्डु-पुत्रों के प्रति भावना और बुद्धि का यही समुचित संतुलन स्थापित नहीं कर पाए, फलस्वरूप महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध अवश्यंभावी हो गया ।

अब अपने मूल विषय की ओर लौटें ।

‘भावना राम की’ अर्थात् ‘श्रीराम के समान शुद्ध हृदय की विशालता’ । इस सूत्र के अनुसार अपने हृदय को सरल, निर्मल और मर्यादित बनाना, जिसमें छल, कपट, द्वेष या अहंकार का कोई स्थान न हो, बल्कि करुणा, सत्य और धैर्य का ही अधिष्ठान हो । जैसे श्रीराम जी अपने हृदय की पावनता और अनन्य प्रेम द्वारा समस्त नर-नारी, पशु-पक्षी, यहाँ तक कि राक्षस और शत्रु-पक्ष के लोगों को भी अपना बना लिए थे । जब मनुष्य, हृदय की इस शुद्धता अर्थात् प्रेम की भावना को धारण करता है, तब सबके प्रति उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से विनम्र और संयमित हो जाता है; वह दूसरों के दुःख को समझने में सक्षम हो जाता है और अंततः अपने भीतर गहन संतुष्टि का अनुभव करता है । उसके कर्मों में स्थिरता और संतुलन आ जाता है, जिससे उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है । यह हृदय जनित भावना हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ, चाहे कैसी भी हों, हमारा स्वभाव और आचरण सदैव उत्तम बना रहना चाहिए । यह मनुष्य की कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति और चरित्र की उच्चता का ही दृढ़ प्रतीक है । हृदय की इसी विशालता ने श्रीराम जी को भक्त शबरी में अपनी माता कौसल्या के प्रेम और उसके जूठे फल में मातृ-सुधारस की अनुभूति कारवाई थी ।

 

Sabri was overjoyed to see Ram. She offered the best fruits she had, even  though they were half-eaten by her. Ram accepted them with grace and love,  and blessed her for devotion. #

 

अब ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र के आशय को भी समझ लेवें । इसका तात्पर्य है - ‘श्रीकृष्ण के समान बुद्धि की जागरूकता और परिस्थिति के अनुकूल यथार्थ दृष्टिकोण को अपनाना’ । किसी विषय को विवेकपूर्वक समझना, परिस्थितियों का सूक्ष्म परीक्षण करना, उसका उचित विश्लेषण करना और फिर श्रेष्ठ परिणाम के लिए उचित मार्ग का चयन करना ही ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र की सार्थकता है । जगत में सत्य या धर्म की रक्षा केवल भावना से नहीं, बल्कि उचित निर्णय और साहसिक कार्य के द्वारा ही संभव हो सकता है । यह जीवन केवल सरल और आदर्श परिस्थितियों पर ही निर्भर नहीं रहता, बल्कि इसमें कई बार ऐसे भी क्षण आते हैं, जहाँ परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल हो जाती हैं और सही-गलत की विभाजक रेखा धुंधली पड़ जाती है । ऐसी विषम अवस्था में केवल भावनाओं के आधार पर लिया गया निर्णय, आत्मघाती या नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है । तब बुद्धि-विवेक से युक्त ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र अनिवार्य हो जाता है । जैसे श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध-क्षेत्र में अन्याय का साथ देने वाले कौरव-दल के महारथियों - यथा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, अंगराज कर्ण और दुर्योधन आदि को परास्त करने के लिए कई बार अत्यंत कठोर और व्यावहारिक निर्णय लिये और उसके अनुसार कार्य करवाए थे । युद्ध को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने पहले तो हृदय या भावना का सहारा लिया, लेकिन जब वह निरर्थक हुआ, तब उन्होंने अवश्यंभावी महायुद्ध सम्बन्धित कठोर निर्णय को सुनाया - 

"हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अंतिम संकल्प सुनाता हूँ ।
याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा !"

 - कृष्ण की चेतावनी, रश्मिरथी, ‘दिनकर’


रथ का पहिया लेके #भीष्म की ओर ...

 

इस तरह से परिस्थिति को पहले गहराई और सूक्ष्मता से समझना, प्रत्येक पक्ष का निष्पक्ष विचार करना और फिर उस पर दूरदृष्टि के साथ निर्णय लेना । आवश्यक होने पर कठोर से कठोर कदम उठाने का साहस भी रखना जरूरी है । बुद्धि हमें सिखाती है कि जीवन केवल कोरे आदर्शों से नहीं चल सकता, बल्कि यथार्थ को स्वीकार कर, उचित मार्ग का चयन कर, उस पर चलना भी पुरुषार्थ ही होता है । सत्य या धर्म की रक्षा हेतु कभी-कभी कूटनीति, रणनीति, धैर्य और चतुरता का सहारा लेना भी आवश्यक हो जाता है । प्रत्येक परिस्थिति में एक ही प्रकार का निर्णय या व्यवहार बेकार साबित होता है । जहाँ प्रेम और करुणा हो, वहाँ कठोरता उचित न होता है । परंतु जहाँ अन्याय तथा कपट का वर्चस्व हो, वहाँ सहनशीलता को किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता है, बल्कि विवेक-बुद्ध के आधार पर वहाँ पर कठोर दमन नीति अपनाना ही धर्म होता है ।

वास्तव में, अपनी समस्त मानवीय क्रिया-कलापों में उचित परिमाण में ‘हृदय-भावना’ तथा ‘विवेक-बुद्धि’ का संतुलन बनाए रखना ही जीवन का वास्तविक सौंदर्य है । यदि व्यक्ति में केवल भावना हो और बुद्धि का अभाव हो, तो वह भावुकता के अतिरेक में बहकर एक पक्षीय या आत्मघाती निर्णय ले सकता है । इसके विपरीत, यदि उसमें केवल बुद्धि ही प्रधान हो और भावना का सर्वथा अभाव हो, तो उसका निर्णय निष्ठुर और अमानवीय हो सकता है । अतः आवश्यक है कि हृदय में करुणा हो, पर बुद्धि में पूर्ण स्पष्टता हो । यदि कोई व्यक्ति केवल ‘भावना राम की’ सूत्र को अपनाता है और ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र की उपेक्षा करता है, तो वह जीवन में बार-बार आहत या भ्रमित हो सकता है । उसकी सरलता को लोग उसकी कमजोरी मानकर, उसका अनुचित लाभ उठा सकते हैं । फिर वह स्वयं को असहाय ही महसूस करेगा ।

दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति केवल ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र को अपनाता है और ‘भावना राम की’ सूत्र का त्याग कर देता है, तो उसका जीवन नितांत कठोर और स्वार्थ-प्रधान हो सकता है । वह क्षणिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले, पर उसके मानवीय सम्बन्ध दुर्बल हो जाते हैं और अंततः वह स्वयं को अकेला पाता है । इसलिए यह परम आवश्यक है कि भावना हमें दिशा दे, पर बुद्धि हमारा मार्गदर्शन करे । भावना और बुद्धि के इस अद्भुत संतुलन का व्यावहारिक ज्ञान ही ‘जीवन का सार’ है । जिसने भी इस संतुलन को साध लिया, वही जीवन की श्रेष्ठता और आत्मिक ऊँचाई को प्राप्त कर लेता है । भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी हृदय-भावना और विवेक-बुद्धि के समन्वित स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर उसे ही ग्रहण करने के लिए सबको प्रेरित किया है -

"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥"

---- ४८ वें श्लोक दूसरा अध्याय, भगवद्गीता

अर्थात, - ‘हे धनंजय (अर्जुन) ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि (सफलता और विफलता) में समान बुद्धि वाला होकर अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करो, क्योंकि जीवन में यह समता की भावना ही असली योग है ।’

यद्यपि ‘भावना राम की’ और ‘निर्णय कृष्ण का’ इन दोनों सूत्रों का क्षेत्र सार्वभौमिक है, तथापि कुछ विशेष परिस्थितियों में इसका महत्व स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है । पारम्परिक सम्बन्धों – जैसे परिवार, मित्र और निकट सम्बन्धियों के बीच, जहाँ प्रेम, धैर्य और समझ ही आधार हुआ करते हैं, वहाँ निज लाभ-हानि व स्वार्थ की भावना को त्यागकर ‘भावना राम की’ सूत्र को ग्रहण करना अत्यंत आवश्यक होता है । इसके विपरीत, कार्यक्षेत्र में, जहाँ बराबरी, प्रतिस्पर्धा, दबाव और जटिल परिस्थितियाँ सदैव प्रबल रहती हैं, वहाँ निष्पक्षता और परिणाम की दृष्टि से ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र अधिक उपयोगी सिद्ध होता है ।

इसी प्रकार, संघर्ष की स्थिति में पहले तो शांत और संयमित भाव, अर्थात् ‘भावना राम की’ सूत्र को अपनाकर उसके समाधान का प्रयास करना चाहिए । यदि समस्या सौहार्द से सुलझ जाए, तो वह विनम्रता ही सर्वोत्तम है । परंतु यदि समस्या न सुलझे, तो फिर ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र को अपनाते हुए, कठोर व उचित कदम उठाना अनिवार्य हो जाता है । लेकिन अन्याय को सहन करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है । ऐसे में अन्याय क्रमशः और भी मजबूत रूप को धारण करेगा और न्याय को निरंतर घायल करता रहेगा । अतः उचित समय पर बुद्धि-विवेक से युक्त साहसपूर्ण न्यायोचित कठोर निर्णय लेना ही सबके लिए श्रेयस्कर होता है ।

‘भावना राम की’ और ‘निर्णय कृष्ण का’ – दोनों सूत्र केवल विचार मात्र ही नहीं हैं, बल्कि इनमें जीवन का महान जीवन-दर्शन निहित है । ‘भावना राम की’ सूत्र हमें सहृदय मनुष्य बनाता है, जबकि ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र हमें व्यावहारिक रूप से परिपक्व बनाता है । यह जीवन-दर्शन हमें एक ओर अपने भीतर की अच्छाई को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है, तो दूसरी ओर संसार की जटिलताओं से आँखें मूँदने के बजाय, उसके उचित समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है । हमें सरल और सहृदय अवश्य होना चाहिए, परंतु अज्ञानी या मूर्ख नहीं । हमें बुद्धिमान और तार्किक होना चाहिए, परंतु निष्ठुर या कठोर नहीं । मानव जीवन की वास्तविक सुंदरता, इन्हीं सूत्रों के सम्यक संतुलन में निहित है । यही जीवन की सच्ची साधना भी है -

“राम की मर्यादा जहाँ काम न आई, कृष्ण की कूटनीति वहाँ मुसकाई ।
जब जब अधर्म की प्रबलता बढ़ी, तब तब शस्त्र उठाना अनिवार्य हुआ,
तब हृदय भावना से ऊपर उठकर, विवेक ही कर्तव्य का सारथि हुआ ।"
 


श्रीराम पुकार शर्मा

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा –
711101

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