धर्म,
निष्ठा और समर्पण का संगम
करवाचौथ
निर्जल उपवास, चंद्रमा और उपहारों से अलग भी बहुत कुछ कहता है करवा चौथ
डॉ. घनश्याम बादल
कार्तिक
मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाए जाने वाला करवा चौथ केवल एक व्रत नहीं,
प्रेम, विश्वास, समर्पण
और साथ निभाने की कामना का पर्व है आज के दिन विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घायु और
सुखी जीवन की कामना करते हुए दिनभर निर्जल व्रत रखती हैं। शाम ढलते ही चाँद की
प्रतीक्षा शुरू होती है। पूजा की थाली, छलनी, दीपक और चंद्रदर्शन के बाद पति का चेहरा देखकर व्रत खोलने की परंपरा
दांपत्य प्रेम का विशिष्ट दृश्य रचती है। लेकिन सवाल है कि क्या करवा चौथ का अर्थ
केवल भूखे-प्यासे रहकर पति की उम्र माँगना ही है, या इसके
इतर भी कोई अर्थ है?
पौराणिक
कथाएँ :
सबसे प्रचलित कथा वीरवती की है।सात भाइयों की
लाड़ली बहन वीरवती ने करवा चौथ का व्रत रखा, लेकिन
भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। भाइयों ने पेड़ के पीछे दीपक जलाकर उसे चंद्रमा
निकलने का भ्रम दिया और उसने व्रत खोल लिया। इसके बाद उसके पति के जीवन पर संकट आ
गया। कथा के अनुसार, वीरवती ने पश्चात्ताप और तपस्या से अपने
पति के प्राण वापस प्राप्त किए। इस आख्यान का संदेश व्रत के प्रति निष्ठा और
संकल्प से जुड़ा है। इसे लोक-आस्था में
प्रचलित पौराणिक कथा के रूप में देखना चाहिए।
दूसरी
कथा के अनुसार करवा नाम की पतिव्रता स्त्री की कथा है। उसने अपने पति को मगरमच्छ
से बचाने के लिए अद्भुत साहस दिखाया और अपने दृढ़ संकल्प से यमराज तक को चुनौती
दी। कथा का मूल भाव है कि प्रेम केवल भावना नहीं, संकट
के समय अपने साथी के साथ खड़े रहने का साहस भी है। महाभारत से जुड़ी एक अन्य कथा में द्रौपदी
द्वारा श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन के कल्याण के लिए व्रत रखने का उल्लेख मिलता
है। इन कथाओं की ऐतिहासिकता से अधिक महत्त्व उस भाव का है, जो
पीढ़ियों से इनके माध्यम से संप्रेषित होता आया है।
धार्मिक
दृष्टि से करवा चौथ पर भगवान गणेश, माता
पार्वती, भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा का विशेष महत्त्व
है। माता पार्वती को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शिव-पार्वती का संबंध
प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान की प्रेरणा देता है। गणेश
पूजा विघ्नों के निवारण की कामना से जुड़ी है, जबकि चंद्रमा
को शीतलता, मन और भावनात्मक संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
इस प्रकार यह पर्व केवल पति की आयु की प्रार्थना नहीं, बल्कि
परिवार के सुख और संबंधों की स्थिरता की कामना का पर्व भी है।
लेकिन
चाँद को देखकर ही व्रत क्यों खोला जाता है? इसका
उत्तर धार्मिक मान्यता और सांस्कृतिक प्रतीक, दोनों में छिपा
है। हिंदू परंपरा में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। उसकी शीतलता और कलाएँ
जीवन में संतुलन तथा परिवर्तनशीलता का बोध कराती हैं। चंद्रमा का उदय दिनभर के
उपवास के समापन का संकेत बनता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति का चेहरा
देखना प्रेम, विश्वास और मिलन का प्रतीक है। छलनी के पार
दिखता जीवनसाथी मानो यह संदेश देता है कि प्रेम केवल किसी को देखने में नहीं,
बल्कि उसे समझने और स्वीकारने की दृष्टि में भी बसता है।
आध्यात्मिक अर्थ में चंद्रमा की प्रतीक्षा
धैर्य और संयम का अभ्यास भी मानी जा सकती है। हालांकि चंद्रदर्शन व्रत की धार्मिक
परंपरा है, कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं कि चाँद
देखने से पति की आयु बढ़ती है। आस्था का सम्मान और वैज्ञानिक विवेक एक-दूसरे के
विरोधी होना आवश्यक नहीं है।
समय
के साथ करवा चौथ का स्वरूप बदला है। बाजार और प्रदर्शन की संस्कृति ने भी इसमें
जगह बना ली है। महंगे परिधान, आभूषण, उपहार और तस्वीरों की प्रतिस्पर्धा कई बार पर्व के मूल भाव पर भारी पड़
जाती है। बाजार ने प्रेम को भी पैकेट में बंद करके बेचने की कला सीख ली है। महंगा
उपहार प्रेम का प्रमाण और साधारण उपहार कम प्रेम का संकेत नहीं हो सकता। दांपत्य
की असली समृद्धि आभूषणों या बैंक खाते में नहीं, कठिन समय
में निभाए गए साथ में दिखाई देती है।
आज
करवा चौथ को आधुनिक और अर्थपूर्ण बनाने की जरूरत है। यदि पत्नी पति की दीर्घायु के
लिए व्रत रखती है, तो पति भी पत्नी के
स्वास्थ्य, सम्मान और सुख के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।
अनेक दंपती साथ में पूजा करते हैं, जबकि कुछ पति भी पत्नी के
साथ व्रत रखते हैं। विवाह किसी एक व्यक्ति
का दूसरे के लिए आजीवन त्यागपत्र नहीं, दो व्यक्तियों की
साझा जिम्मेदारी है।
दांपत्य में प्रेम का अर्थ केवल उपहार देना या
सोशल मीडिया पर तस्वीर साझा करना मात्र नहीं,एक-दूसरे
की बात सुनना, असहमति में सम्मान बनाए रखना, घर और बच्चों की जिम्मेदारियां बांटना, आर्थिक
निर्णयों में साझेदारी करना और कठिन परिस्थितियों में सहारा बनना ही प्रेम की
वास्तविक परीक्षा है। पति पत्नी की आकांक्षाओं का सम्मान करे और पत्नी भी पति की
भावनाओं तथा जिम्मेदारियों को समझे। बराबरी रिश्ते की आत्मीयता घटाती नहीं,
बल्कि उसे अधिक परिपक्व बनाती है।
व्रत
में विवेक भी जरूरी है। निर्जल उपवास हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होता।
मधुमेह,
गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था या नियमित दवाओं
की आवश्यकता होने पर चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। धर्म का
उद्देश्य जीवन में मंगल की कामना है, स्वास्थ्य को अनावश्यक
जोखिम में डालना नहीं। व्रत की भावना प्रार्थना, संयम,
सद्भाव और आत्मीयता से भी व्यक्त की जा सकती है।
करवा
चौथ रिश्ते की समीक्षा करने का अवसर है। इस दिन पति पत्नी से पूछ सकता है कि क्या
वह खुश है, क्या उसकी कोई अधूरी इच्छा है और क्या
उसे पर्याप्त सम्मान तथा सहयोग मिलता है। पत्नी भी पति की चिंताओं और अपेक्षाओं को
समझ सकती है। पूजा के बाद कुछ समय साथ बैठकर मन की बात करना किसी महँगे उपहार से
अधिक मूल्यवान हो सकता है।
करवा चौथ का चाँद आसमान में उगता है,
लेकिन उसकी असली रोशनी घर के भीतर उतरनी चाहिए। यदि पत्नी पति की
दीर्घायु मांगती है और पति उसके सम्मान की रक्षा नहीं करता, तो
व्रत का आध्यात्मिक अर्थ अधूरा है। यदि दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी हैं,
तो बिना दिखावे के मनाया गया करवा चौथ भी सार्थक है।
डॉ. घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड - 247667


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