ऐन
कार्सन : शब्दों की ओस और ‘नोबेल’ की
दस्तक
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
आइसलैंड
में उस दिन हवा कुछ कह रही थी, और 76 बरस की ऐन कार्सन उसे सुन रही थीं। तभी स्टॉकहोम से फ़ोन आया। कार्सन
चकित थीं; और बहुत
ख़ुश भी! 8 अक्टूबर, 2026 को स्वीडिश
अकादमी ने कनाडा की इस कवि-कथाकार को साहित्य का नोबेल देने की घोषणा की। पुरस्कार
की राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना (लगभग 12 लाख डॉलर) है। पर असल ख़बर रकम नहीं, बल्कि यह है
कि ढाई हज़ार साल पुरानी कविता से बतियाने वाली लेखिका भी आज के पाठक को कुछ नया
दे सकती है!
ब्रिक
पत्रिका से बातचीत में कार्सन ने बताया है कि 1965 के
आसपास एक मॉल में उन्हें सैफ़ो की द्विभाषी किताब मिली। बाएँ पन्ने पर यूनानी थी,
दाएँ पर अंग्रेज़ी। फिर स्कूल की लैटिन अध्यापिका ने खाने की छुट्टी
में उन्हें यूनानी पढ़ाई। वही अध्यापिका, जिनसे हमेशा जंगली
अजवाइन की गंध आती थी। कार्सन कहती हैं कि यूनानियों के विचारों पर आज भी ओस बची
हुई है।
अकादमी
की प्रशस्ति इसी ओस को पहचानती है। उसके अनुसार, कार्सन
ने शास्त्रीय परंपरा से खिलंदड़े संवाद के ज़रिये समकालीन साहित्य के नए रूप गढ़े
हैं। 'ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ रेड' (1998) में
हेराक्लीज़ के हाथों मारा जाने वाला पंखों वाला राक्षस गेरियन आधुनिक प्रेम-कथा का
नायक बन जाता है। कार्सन मानती हैं कि हम सब ज़्यादातर समय ख़ुद को राक्षस ही
महसूस करते हैं। 'नॉक्स' (2010) भाई की
मौत पर रचा गया शोकगीत है। उसमें कैटुलस की एक लैटिन कविता का हर शब्द अलग पन्ने
पर है, सामने यादों के टुकड़े।
'द ब्यूटी ऑफ़ द हस्बैंड' (2001) इस यात्रा का सबसे
कोमल और सबसे कड़वा पड़ाव है - 29 अध्यायों में एक काल्पनिक
निबंध! यहाँ निबंध कविता बनता है, कविता नृत्य की लय पकड़ती
है। हर अध्याय से पहले सौंदर्य को सत्य कहने वाले कवि कीट्स की पंक्तियाँ आती हैं।
कार्सन इस सूत्र को उलट देती हैं। पति सुंदर है। झूठा है। बेवफ़ा है। और इस पर
शर्मिंदा भी नहीं। पत्नी फिर भी बरसों उसी सौंदर्य से बँधी रहती है। कार्सन कहती
हैं कि हम उसे चाहते हैं जिसे हमने गढ़ा है, उसे नहीं जो
सचमुच मौजूद है। इसी कृति ने उन्हें टी. एस. इलियट पुरस्कार पाने वाली पहली महिला
बनाया।
स्वीडिश
अकादमी ने कहा है कि कार्सन अपना काम शब्द की व्युत्पत्ति से शुरू करती हैं। उनके
लिए शब्द शब्दकोश में कीलों से जड़े अर्थ नहीं हैं। वे बेलगाम संख्याएँ हैं।
अनुवाद उन्हें ऐसी वर्ग-पहेली लगता है, जो कभी
ख़त्म नहीं होती। मसलन, कैटुलस की एक कविता से वे
किशोरावस्था से जूझती रहीं।
प्रश्न
स्वाभाविक है कि, आख़िर पुरस्कार का पलड़ा
कार्सन की ओर क्यों झुका? घोषणा से पहले चीन की प्रयोगधर्मी
कथाकार कान श्वे सबसे आगे थीं। सट्टा कंपनी बेत्सन के भाव में कान श्वे 5.00 पर थीं; और कार्सन 7.00 पर!
सयाने बता रहे हैं कि भूगोल ने भी अपना वोट डाला। 2024 में
दक्षिण कोरिया की हान कांग यह पुरस्कार पा चुकी हैं। इतालवी अख़बार इल पोस्त ने तो
पहले ही लिख दिया था: कान श्वे का भौगोलिक मूल उनके ख़िलाफ़ जा सकता है! दूसरा
कारण प्रशस्ति में ही है: परंपरा और प्रयोग का ऐसा संगम आज दुर्लभ है।
घूम-फिरकर
पुराना सवाल फिर लौट आया है। 1901 से यह पुरस्कार
ज़्यादातर पश्चिमी लेखकों के हिस्से गया है। 2018 में विवाद
के बाद अकादमी ने इसका दायरा बढ़ाने का वादा किया था। इस बार फिर पश्चिम की एक
अंग्रेज़ीभाषी कवयित्री। ग़ौरतलब है कि एशिया की सबसे मज़बूत दावेदार फिर
प्रतीक्षा-सूची में हैं। वादा और नतीजा आमने-सामने खड़े हैं!
भारत
के लिए इस नोबेल में अनुवाद का पाठ है। याद रहे कि किसी भारतीय भाषा को अकेला
साहित्य-नोबेल 1913 में रवींद्रनाथ ठाकुर को मिला था। 'गीतांजलि' भी अंग्रेज़ी अनुवाद की नाव पर बैठकर ही
स्टॉकहोम पहुँची थी। हाल में गीतांजलि श्री की 'रेत समाधि'
और बानू मुश्ताक़ की कन्नड़ कहानियाँ अनुवाद के सहारे अंतरराष्ट्रीय
बुकर तक पहुँचीं। विडंबना ही तो है कि हमारे यहाँ अनुवादक का नाम आज भी आवरण पर
‘ढूँढ़ना’ पड़ता है! ज़रूरत इस बात की है कि अनुवाद को सृजन का दर्जा मिले।
कार्सन
यही सिखाती हैं कि पुरानी भाषा से ईमानदार संवाद ही नया साहित्य रचता है। ओस किसी
एक भाषा की बपौती नहीं। वह हर सुबह वहाँ मिलती है, जहाँ
कोई अनुवादक पुल बनकर खड़ा है!
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