विधाता
छंद
1.
उजाला
प्रेम का फैले...
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी 'काव्यांश'
उजाला
प्रेम का फैले,
घृणा
का तम चला जाये।
चलो
ऐ दोस्त हिलमिल कर,
कपट
छल को छला जाये।।
दिलों
में प्यार हो सबके,
ह्रदय
सबके महकते हों।
प्रभो
की भक्ति के रस पी,
सभी
के मन बहकते हों।।
दुखी
कोई न हो मन में,
अधर
पर मुस्कुराहट हो।
कपोलों
पर सजे लाली,
खुशी
की नित्य आहट हो।।
नयन
में अश्रु की बूँदें,
कभी
आने नहीं पाएँ।
सुखों
के घन घने छायें,
कि
फिर जाने नहीं पाएँ।।
2.
हे
नारी...
कितने
सारे रूप धरे हैं,
नारी तूने जीवन में ।
बंद
किये पलकों में आँसू,
रोई भी मन ही मन में ।।
कांधे
पर चिपका के लोरी,
रात-रात भर गाती थी ।
आँखों
में अपनों की चिंता,
नींद कहाँ फिर आती थी ।।
जीवन
साथी बनकर तूने,
सारे सुख-दुख बाँटे थे ।
फूल
मिले सबको झोली में,
तेरे हिस्से काँटे थे ।।
दुख
में भी ये अधर तुम्हारे,
हौले से बस मुस्काये ।
सिवा
ईश के पीर तुम्हारी ,
अपने भी ना पढ़ पाये ।।
कभी
बसी तुम राधा बनकर ,
अपने मोहन के मन में ।
और
कभी श्रीराम लखन सँग ,
भटक रहीं थी वन-वन में ।।
बनी
देवकी जन्मा प्रभु को,
रो रो ममता को तरसीं ।
कभी
उर्मिला बनकर ऑंखें,
बरसों तक बेबस बरसीं ।।
3
चाँद
गीतिका छंद
चाँद
करवाचौथ लाता,
चाँद से ही ईद है ।
चाँद
से अमृत बरसता,
मन बसी उम्मीद है ।।
चाँद
करता दूर तम को,
सब घरों में झाँकता ।
कौन
हिन्दू कौन मुस्लिम,
वो नहीँ पहचानता ।।
चाँद
सा मुख राधिका का,
कृष्ण को प्यारा लगे ।
माँ
उमा को चाँद शिव का,
शीश पर न्यारा लगे ।।
पूर्णिमा
के चाँद के दिन ,
संत नानक अवतरित ।
चाँद
से ही जगमगाये,
नभ धरा सँग सुरसरित ।।
***
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी 'काव्यांश'
जबलपुर


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