बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

कविता

महात्मा विदुर

कर्मवीर सिंह

 

नीतिशास्त्र के विदुर महात्मा, बहुत बड़े ज्ञानी ध्यानी।

धर्म नीति की राजनीति में, पारंगत नहीं कोई सानी।

नीति शास्त्र ---

 

महामन्त्री की पदवी पाकर, गरिमा ठीक बना रखी।

उचित निर्णय के साथ-साथ, विदुरनीति की नींव रखी।

सत्यपक्ष के बनकर साथी, नहीं झूठ की बात कभी मानी॥

नीतिशास्त्र --

 

समय-समय पर धृतराष्ट्र को, समझाने का काम किया।

पुत्र मोह से राज मोह तक, हट जाने का काम किया।

कटु सत्य का भान किया, लगती थी कड़वी वाणी॥

नीति शास्त्र --

 

पांचाली के चीर हरण में, लज्जित हुई सभा सारी।

निरुत्तर सब हुये सभासद, सबकी मति गई मारी।

विदुर चीख गरजी भारी, करते थे सब आनाकानी॥

नीति शास्त्र ---

 

लाख भवन की कूटनीति को, मूषक बिल से समझाया।

दुर्योधन की हठ धर्मी को, धर्म विरोधी बतलाया।

बार-बार सबको चेताया, कभी न करना नादानी॥

नीतिशास्त्र -

 

तन से मन से बड़ी लगन से, हित हस्तिनापुर करते।

रहे सुरक्षित चहुँ ओर से, सदा ये मन्त्र दिया करते।

यत्न किया करते थे निशदिन, निर्विघ्न रहे यह रजधानी॥

 

नीतिशास्त्र - -

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लोक कवि-कर्मवीर सिंह

जालपुर, बिजनौर


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