बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

पुस्तक समीक्षा


तलब (सुषमा गुप्ता)

आर्या झा

“मुझको खा गई साफ़-गोई मेरी

मैं इतना अच्छा था कि बुरा हो गया”

ये पंक्तियाँ हैं नवयुगीन प्रतिष्ठित लेखिका सुषमा गुप्ता जी द्वारा लिखित एवं हिन्द युग्म से प्रकाशित उपन्यास ‘तलब’ से। सच कहूँ तो पढ़ने की तलब तो थी ही पर ‘तलब’ को पढ़ना सचमुच सच्चाई से रूबरू होना लगा। हर अध्याय के पहले लिखी हुई क्षणिकाएँ नायक की मनोदशा को समझाने में सहायक हों जैसे,

“प्रेम की होती हैं कहानियाँ

बस लोग प्रेम में नहीं होते”

इन मारक पंक्तियों से कुछ तो प्रकट हो ही रहा होगा मसलन एक युवक का प्रेम के लिए तलब और कदम-कदम पर टूटने- बिखरने का सफ़र है उपन्यास ‘तलब’ मगर क्या सिर्फ़ इतना ही है??

जब भी कोई किताब लिखी जाती है तो उसमें लेखक स्वयं को भी लिखता है। मैं व्यक्तिगत रूप से सुषमा जी के जादूई कलम की प्रशंसिका रही हूँ और उनकी विस्मृत कर देने वाली लेखनी इस गंभीर उपन्यास में भी जादू जगाने में सक्षम रही है।

एक तेरे जाने के बाद

जिए ही नहीं हैं…

और तो इस जिस्म से हर

काम लिया मैंने!

सुहान और कंदील के बीच पनपा प्रेम अनोखा ही है । वैसे भी प्रेम कहानियाँ अपने चरम पर तभी पहुँच पाती हैं जब शेष परिस्थितियाँ अनुकूल हो अन्यथा प्रेम त्याग की चादर ओढ़े विश्राम मोड में चलीं जातीं हैं। चूँकि यह उपन्यास आज की पीढ़ी की विषमताओं को लेकर है तो यहाँ जटिलताएँ भी अलग स्तर की हैं । सबसे पहले मैं इसकी नींव में जाकर बात करना चाहती हूँ। हम अच्छे लोगों और बुरे लोगों में विभेद तो करते हैं पर क्या कभी ये जानने की कोशिश करते हैं किसी बीज को पनपने के लिए उपयुक्त मिट्टी,खाद,पानी और हवा मिली भी या नहीं??

माँ हर शिशु का पहला प्रेम होती है जिसे घुट-घुट कर जीते देखना सुहान की मजबूरी थी। माँ की आज़ादी के साथ उसे बिखरा हुआ बचपन मिला जिसमें दर्द ही दर्द था अकेलेपन का आदी तो बचपन से था पर स्कूल,कॉलेज की बुलिइंग पर घर का दमघोटू माहौल भारी था।एक लंबे अरसे तक जो किसी से खुला न हो उसका कंदील के प्रेम में डूबना और ज़िंदगी के दुरूह पन्नों का खुल जाना जिनमें झाँकने की इजाज़त उसने स्वयं को भी नहीं दी थी,इस उपन्यास को बेहद रोमांचक मोड़ देता प्रतीत होता है ।

अनोखी बात तो यह है कि आधे से अधिक पन्नों से गुज़रते हुए यह पता नहीं चलता है कि सुहान के जीवन में आगे क्या कुछ घटने वाला है। पन्ने -दर- पन्ने पढ़ते हुए हम न केवल आज की पीढ़ी की चुनौतियों को समझते हैं बल्कि उनके जीवन की जटिलताओं से भी परिचित होते हैं और आख़िरी कुछ पन्नों में जब उपन्यास अपने क्लाइमेक्स पर होता है तब प्रेम की तलब में आकंठ डूबा सुहान पाठकों के हृदयतल में समाहित हो जाता है।

अंततः तलब को मैं समकालीन साहित्य में एक अनुपम योगदान के रूप में देखती हूँ जो आधुनिक युग के विघटन को रोचक तरीक़े से रेखांकित करती है साथ ही यह हर वर्ग के पाठकों के लिए बेहद पठनीय किताब है क्योंकि यह आदर्शों का कोई काल्पनिक खाका नहीं खींचती बल्कि समाज के वास्तविक स्वरूप को दर्शाती है इसलिए ही सर्वाधिक प्रासंगिक बन पड़ी है! आदरणीयां सुषमा गुप्ता जी को इस अनुपम कृति के लिए कोटिशः बधाई एवं शुभकामनाएँ!!

पुस्तक - तलब

लेखिका - सुषमा गुप्ता

प्रकाशन - हिन्द युग्म

प्रकाशन - वर्ष 2026


आर्या झा

कासिनी 1978, स्टेशन 14

ऐलियन्स स्पेस स्टेशन

तैलापुर -502032

हैदराबाद

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर, सारगर्भित एवं सटीक समीक्षा। आर्या झा, सुषमा गुप्ता दोनों को हार्दिक बधाई। सुदर्शन रत्नाकर

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