बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

कविता



सड़क पर प्रसव

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

 

श्वेत दीवारों का वह दंभी दुर्ग,

और बाहर, डामर की छाती पर तड़पती,

धूल और पसीने में गुंथी

एक आदिम देह।

 

मसीहाओं के द्वार भीतर से बंद थे,

मानव रक्त से ज्यादा गहरा था

उनकी आँखों पर चढ़ा

जाति का मोतियाबिंद।

 

​वह कोई पत्थर नहीं तोड़ रही थी,

पर व्यवस्था की नींव

चटक रही थी

उसकी हर चीख के साथ।

 

कोई आसरा नहीं, कोई सांत्वना नहीं,

सिर्फ कंक्रीट का जंगल,

और बंद खिड़कियों से

झाँकती निष्ठुरता।

 

​तभी, उस अंधी और बहरी सड़क पर

धूल फाँकती हवाओं के बीच

गूँजा एक रुदन।

 

कष्ट की भट्टी से तपकर

निकला वह नवजात,

सभ्य समाज के सफेद दामन पर

रक्त से उकेरा गया

एक धधकता प्रश्नचिह्न।

 

​हाथों में सूखी मिट्टी जकड़े,

आँखों में ज्वाला लिए,

चीथड़ों में लिपटी

वह माँ उठी;

पाषाण-हृदयों के बीच खिला

अदम्य प्राण-पुष्प,

कह रहा चीख-चीख कर :

 

"तुमने सिर्फ दीवारें चुनीं;

मैंने जीवन गढ़ा,

तुम्हारी इस पक्की सड़क पर!

मनुष्य या मुसहर?"

***

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

परामर्शी (हिंदी)

दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र

मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी

हैदराबाद



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