बुधवार, 30 सितंबर 2026

दिन कुछ ख़ास है!


आलेख

राधाष्टमी

सुरेश चौधरी ‘इंदु’

 

बरसाने  की  राधिका, नन्द  गाँव  के श्याम

इनके चरणों में सदा, शत शत करूँ प्रणाम

 

श्याम आराध्य राधिके, अविरल प्रेम प्रसाद

मनहर प्रीत प्रकाशिनी, हर लो द्वेष विषाद

 

राधाष्टमी का पर्व राधा रानी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जो भक्ति और प्रेम का प्रतीक है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में राधा जी के महत्व को विशेष रूप से दर्शाता है। हालांकि, राधा जी का नाम श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत जैसे प्रमुख धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता है, फिर भी राधा और श्रीकृष्ण की प्रेमकथा भारतीय समाज और धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

राधा का नाम और अर्थ 

राधा शब्द संस्कृत की ‘राध’ धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है उपासना या आराधना। ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा शब्द के तीन प्रमुख अर्थ बताए गए हैं।

1. पहला अर्थ : यह कहा गया है कि राधा वह हैं जिनकी आराधना स्वयं भगवान श्रीकृष्ण करते हैं। यह उल्लेख मिलता है, “कृष्णेन आराधते इति राधा”, अर्थात् राधा वह हैं जिनकी आराधना कृष्ण करते हैं। इस दृष्टिकोण से, राधा केवल एक चरित्र नहीं, बल्कि आराध्य (पूजनीय) हैं, जिन्हें स्वयं श्रीकृष्ण भी पूजते हैं।

2. दूसरा अर्थ : राधा वह हैं जो श्रीकृष्ण की आराधना करती हैं। यह भक्ति का उच्चतम रूप है, जहाँ प्रेमी अपनी पूरी आत्मा और भावनाओं को समर्पित कर देता है।

3.  तीसरा अर्थ : ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा के नाम का एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है। ‘रा’ का अर्थ है ‘पाना’, और ‘धा’ का अर्थ है ‘मोक्ष’ या ‘निर्वाण’। इसलिए, राधा को वह माना जाता है जिनसे भक्तजन मोक्ष प्राप्त करते हैं।

करण में ‘आ’ प्रत्यय होने से आराधिका (भगवान की आराधना करने वाली) अर्थ होता है। अर्थात् कृष्ण की आराधना करने वाली वो राधा

रा इत्यादानवचनो धा च निर्वाणवाचकः।

ततोऽवाप्नोति मुक्तिं च तेन राधा प्रकीर्तिता॥४॥

- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्डः २ (प्रकृति खण्ड) अध्याय ४८

संछिप्त भावार्थः - (महादेव जी कहते है माता पार्वती से -) ‘रा’ का अर्थ है ‘पाना’ और ‘धा’ का अर्थ है ‘निर्वाण’ (मोक्ष)। भक्तजन उनसे निर्वाणमुक्ति पाता है, इसलिये उन्हें ‘राधा’ कहा गया है

राधा जी के अवतरण का विवरण

ब्रह्म-वेवृत पुराण में वर्णित है कि राधा जी का जन्म श्री कृष्ण से ११ १/२ महीने पूर्व हुआ था, जब भगवान विष्णु ने अवतरण लेने का निश्चय किया तो सर्व प्रथम अपने ह्रदय को अलग कर राधा स्वरुप में अवतरित कराया, अर्थ राधा कोई अलग नहीं श्रीकृष्ण ही है, यहाँ आरंभ होता है अर्धनारीश्वर कि कल्पना का विचार।

राधा का आध्यात्मिक स्वरूप 

राधा जी को आह्लादिनी शक्ति कहा जाता है, यानी वह शक्ति जो आनंद, प्रेम और दिव्यता का स्रोत है। जब कोई साधक अपने हृदय में सच्ची भक्ति और प्रेम का अनुभव करता है, तो वह राधा की उपस्थिति को महसूस करता है। इसे इस रूप में भी देखा जाता है कि राधा कोई एक सामान्य महिला नहीं हैं, बल्कि किसी भी जीवात्मा के लिए प्रेम और भक्ति का प्रतीक हैं। जो भी अपने जीवन में कृष्ण की आराधना में संलग्न हो जाता है, वह अपने आप में राधा कहलाता है। राधा वह ऊर्जा है, जो भक्ति और प्रेम का सृजन करती है।

राधा और कृष्ण: प्रेम और भक्ति का संबंध 

राधा और श्रीकृष्ण के संबंध को प्रेम और भक्ति के उच्चतम रूप के रूप में देखा जाता है। यह प्रेम सामान्य सांसारिक प्रेम नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक प्रेम है, जो आत्मा और परमात्मा के बीच का संबंध दर्शाता है। यह प्रेम उस अवस्था को इंगित करता है जहाँ जीवात्मा (राधा) अपने परमात्मा (कृष्ण) से मिलन के लिए व्याकुल होती है।

राधा जी का नाम हमेशा कृष्ण से पहले लिया जाता है, जैसे ‘राधाकृष्ण’, क्योंकि यह दर्शाता है कि पहले आराधना (राधा) होती है, फिर भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है। बिना आराधना के भगवान से मिलन संभव नहीं है। इसीलिए, राधा का स्थान भगवान कृष्ण के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भी माना जाता है कि राधा जी के बिना श्रीकृष्ण की लीला अधूरी है।

राधा की भक्ति का विकास 

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, राधा और कृष्ण की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। भक्तिकाल के कवियों ने राधा-कृष्ण के प्रेम और उनकी भक्ति को विस्तार से लिखा। कहा जाता है कि सबसे पहले दक्षिण के आचार्य निम्बार्क जी ने राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया। इसके बाद, वल्लभ संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, और सखीभाव संप्रदाय जैसे कई भक्तिसंप्रदायों ने राधा-कृष्ण की भक्ति को समाज में फैलाया।

कवि जयदेव ने ‘गीत गोविंद’ में राधा और कृष्ण के प्रेम का उल्लेख किया और इसे भक्तिकाल की सबसे प्रमुख रचनाओं में से एक माना जाता है। इससे पहले राधा का नाम धार्मिक ग्रंथों में नहीं पाया जाता था, लेकिन भक्तिकाल में राधा-कृष्ण के प्रेम को विशेष स्थान मिला और तब से राधा-कृष्ण एक अटूट जोड़ी के रूप में पूजनीय हो गए।

राधा के विवाह की कथाएँ 

राधा जी के विवाह को लेकर विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग कथाएँ मिलती हैं। कुछ ग्रंथों में राधा और श्रीकृष्ण के विवाह का उल्लेख है, तो कुछ में राधा जी का विवाह रायण नामक व्यक्ति से बताया गया है, जो श्रीकृष्ण के मामा थे। लेकिन यह भी कहा गया है कि राधा ने अपने शरीर की छाया छोड़ दी थी, और रायण से उनकी छाया का विवाह हुआ था।

यह भिन्न कथाएँ दर्शाती हैं कि भक्तिकालीन संतों ने अपनी भक्ति भावना के आधार पर राधा-कृष्ण की कथाओं को विस्तार से गढ़ा। इसीलिए, राधा और कृष्ण की कथा कई रूपों में सामने आती है, जिनका वास्तविक सत्य निश्चित करना मुश्किल है।

राधा: भक्ति का प्रतीक 

राधा जी का चरित्र यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति और प्रेम क्या होते हैं। वह केवल एक प्रेमिका नहीं हैं, बल्कि भक्ति और त्याग का प्रतीक हैं। उनका प्रेम किसी साधारण प्रेमी-प्रेमिका का नहीं, बल्कि उस आत्मा का प्रेम है जो अपने परमात्मा से मिलन के लिए लालायित है। राधा की भक्ति और कृष्ण की लीला एक ऐसी प्रेमकथा है, जो भक्ति के उच्चतम स्तर को दर्शाती है।

राधा-कृष्ण का प्रेम यह संदेश देता है कि भक्ति के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। राधा का नाम प्रेम और भक्ति का ऐसा प्रतीक बन गया है, जो युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।

निष्कर्ष 

राधाष्टमी का पर्व न केवल राधा रानी के जन्मदिन को मनाने का अवसर है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि भक्ति, प्रेम और समर्पण का वास्तविक अर्थ क्या है। राधा जी का जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम, चाहे वह ईश्वर के प्रति हो या किसी अन्य रूप में, हमेशा त्याग, समर्पण और पवित्रता से जुड़ा होता है।

 

भृंग   गुंजन  से   गुंजित  मधुकर  तेरे  वेणु  स्वर

गाऊँ  मृदु  भावों  को   शब्दों  में  परिवर्तित  कर

राधिके  तू  गाती  हृदय  की  कली पर मदिर गीतांजलि सी

प्रेम पोषित शब्द मनहर श्याम के काव्य की काव्यांजलि सी

 

ठहरी ठहरी सी श्वास गति का अतिक्रमण कर तू

प्रेम  पियूष  रस  हृदय सम्बलित  समर्पण कर तू

वृषभान  तनुजा  हृदयांकित  है जीवन  गति  मेरी स्वरांजलि

झंकृत   हुई  परिष्कृत हुई  तर्पण  की यह  शुद्ध  हृदयावली

 

ब्रज  रज से सिंचित  है अध्यात्म  प्रतीक पताका

रासरंजन   लस  रंजना  प्रीत   उर  श्रेष्ठ  श्लाखा

वसंत नील  व्योम पर  चंचल उर्मित  अधृत सी  तड़ितावली

आराध्य   राधिके   तू  पुष्पांजलि  तू  प्रांजलि तू प्राणांजलि

 


सुरेश चौधरी ‘इंदु’

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता  - 700046

दिन कुछ ख़ास है!

 

कविता (मल्लिका छंद)

जय गणेश

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

 

देख  झूलते  गणेश ।

देखते  उन्हें   महेश ।।

माँ उमा रहीं झुलाय ।

मंद-मंद   मुस्कुराय ।।

 

मेघ  ला  रहे  फुहार ।

मोर  गा  रहे मल्हार ।।

नृत्य  भी करें भुजंग ।

मोड़-मोड़ अंग-अंग ।।

 

हे  गणेश   एक दंत ।

कष्ट दुःख हैं अनन्त ।।

हो कृपा दया अपार ।

आस से  रहा निहार ।।

 

आज आप दीन-द्वार ।

रोय   नैन   बार-बार ।।

प्रार्थना  करूँ  हजार ।

हर्ष  की  बहे  बयार ।।

 

भक्त आपके करीब ।

किन्तु अर्थ से गरीब ।।

नित्य ही करूँ अधर्म ।

दूर  सत्य  पुण्य कर्म ।।

*** 


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


दिन कुछ ख़ास है!


आलेख  

हिन्दी मेरी हिन्दी………हिन्दी से हिंदी तक

नुक्तों और बिंदी तक

सुरेश चौधरी

देश स्वतंत्र नहीं था तो लोगों के हृदय में राष्ट्र जागरण की भावनाएँ हिलोर मारती थी लोग हिन्दी के प्रति समर्पित थे केवल वे परिवार ही जो या तो अंग्रेजों के पिट्ठू थे या अंग्रेजों के द्वारा कराई गई कमाई से मोटे हुए जा रहे थे अंग्रेज़ी पढ़ते थे अन्यथा हिन्दी माध्यम सर्वग्राह्य था। तब हम अ के अनपढ़ से ज्ञ के ज्ञानी तक वर्णमाला स्वीकार करते थे । अब हम मॉडर्न हो गए हैं हमारी संस्कृति और हमारी भाषा अब जाकर गुलाम हुई है हमे मैकाले ने नहीं बल्कि आधुनिक शिक्षा पद्धति ने बर्बाद किया है अब हम ज्ञानी नहीं बल्कि अ के अनपढ़ से लेकर श्र के श्रोता बन कर रह गए हैं । आज इतने मॉडर्न हो गए हैं कि हजारों साल की अपनी संस्कृति को धता बता कर हम बिंदी और नुक्ते का प्रयोग करने लगे हैं सरकारी आदेशानुसार। हमारी हिन्दी अब हिंदी हो गयी है और शान से कहते हैं हिंदी की बिंदी। कितने लोग जानते हैं किन वर्णों पर बिंदी कैसे लगनी चाहिए। और बड़ी बात बिंदी होती क्या है?

विश्व में 212 देश हैं जिनमे मात्र 57 देश हैं जहाँ अंग्रेज़ी बोली जाती है उनमें भी 55 देश राष्ट्रमंडल के हैं जो कभी ब्रिटेन की रानी के अधीन थे। हम में एकता नहीं है हम स्थानीय भाषा के झगड़े में मूल भाषा को क्षति पहुँचा रहे हैं। हमसे पूछता है कि आपकी भाषा क्या है तो कहते है भोजपुरी है, अवधि है, मारवाड़ी है, इत्यादि इत्यादि इस लिए गिनती में हम 80-90 करोड़ होकर भी 30 करोड़ हैं और यही कारण है कि देश में हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं बन पा रही और न ही संयुक्त राज्य की आधिकारिक भाषा जबकि 11 करोड़ के रूसियों की भाषा आधिकारिक भाषा है।

हाल की ही घटना है उच्च न्यायालय के न्यायधीश महोदय ने कहा हिन्दी में दिए वक्त्तव्य मान्य नहीं, क्योंकि कोर्ट की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। हम कितने दिन और गुलाम रहेंगे , क्या यह सब सुन कर आप सब के रक्त में उबाल नहीं आता, क्या हम शर्मिंदा नहीं होते जब हमारे बच्चे पूछते हैं उनहत्तर क्या होता है।

हिन्दी दिवस पर एक दिवसीय प्रशंसा मात्र से हिंदी का कुछ भविष्य नहीं सुधरने वाला अधिकांश लोग तो सोशल मीडिया में अपना नाम तक अंग्रेज़ी में लिखते हैं।

हिंदी की बात करने वाले जब तक पहल अपने से नहीं करते तब तक कुछ नहीं होने वाला।

संधान  है,  भारत की  शान है,  ज्ञान है, विज्ञान है हिन्दी

छंद  है  निबंध  है, गीत  है, हिन्द का अभिमान है हिन्दी

कलकल  झरनों  की  झंकार’ वेद सुरों का गान है हिन्दी

दिनकर,  गुप्त,  निराला,  प्रसाद  में  विद्यमान  है हिन्दी

 

नमन  है,  वंदन है,  अवगुंठन  है  अभिव्यंजन है  हिन्दी

गुरु  मनीषियों  की  साहित्यिक विधा का मंथन है हिन्दी

एक  सौ  चालीस  करोड़  जन का  मैत्री  बंधन है हिन्दी

संस्कृत परिधा और मानसिकता का अनुकम्पन है हिन्दी

हिंदी दिवस

 

आज १४ सितम्बर है,

हिदी-दिवस मनाएँगे,

कुछ सभाए बुलाई जाएँगी,

कुछ नेता गण आयेंगे,

साथ में आयेंगे,

सुट-बुट धारी अफसर

जो अंग्रेज़ी ही बोलते हैं अक्सर

भाषण होंगे, हिंदी गीत गायेंगे ।

बोलेंगे वो,

हिंदी इज नॅशनल लेंगवेज

वी शुड एडोप्ट ईट ,

फिर तालिये बजेंगी,

मजमा ख़त्म ।

 

पहले माँ-बाबूजी थे,

फिर बदल कर,

मम्मी-पापा हो गये,

अब सिकुड़ कर,

मम एंड पा होगये,

न जाने और आगे क्या होगा,

हिंदी बोलने वालो का और कितना इम्तिहाँ होगा,

 

आधुनिक हैं

लंबी बातें लिखने का नहीं अभ्यास

शार्ट कट जैसे तिनको के ढेर में घांस

इमोजी का जमाना है

इशारों में बात बताना है

हिंगलिश नूतन भाषा हुई है ईजाद

आज़ाद ख्यालात व्याकरण भी आज़ाद

नो उल्लू बनायिंग

से प्रारंभ

कीच कीच करिंग

पर समाप्त।

लेखन भी नूतन ही गया

जो लिखे वही पढ़े यही फैशन हो गया।

 

शर्म क्यूँ आती है

निज भाषा बोलने में,

निज वेश-भूषा ओढने में,

जब देश हुआ आजाद,

तब हिंदी नहीं थी इतनी बर्बाद,

ज्यों ज्यों चढ़ा जवानी का रंग,

हिंदी क्यूँ हो रही तंग,

 

कौन सा देश  इतिहास में बतलाएँ,

बिन निज भाषा के करी हो उन्नति

प्रगति पथ छोड़ बस अवनीति अवनीति।

शिक्षा-दीक्षा लगती

निज भाषा में शोभित,

निज भाषा उन्नति अहे,

सब उन्नति को मूल |

 

संस्कृत जननी है सब भाषाओँ की,

एक बट वृक्ष है,

हिंदी,तमिल,,बंगला इत्यादि इत्यादि,

सब शाखाएँ विशाल,

विश्व की जीवित सबसे पुरानी भाषा बेमिशाल,

अरे देव-धरा पर जन्म लेने का,

कुछ तो कर्ज चुकाओ

देव लिपि को तो ना ठुकराओ ।

 

आओ आज संकल्प लें कम से कम सोशल मीडिया में तो अपना नाम हिंदी में लिखें, और हो सके तो अपने हस्ताक्षर हिन्दी मे ही करें।

सुरेश चौधरी

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता  - 700046

संस्मरण


‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला आशीर्वाद

डॉ. स्मिता मिश्र

यह सर्वविदित है कि मेरे श्रद्धेय पिता शताब्दी-साहित्यकार डॉ० रामदरश मिश्र के आरम्भिक काव्यगुरु मनीषी रचनाकार पं० गणेशदत्त मिश्र ‘मदनेश’ थे। उन्हीं के आशीर्वाद और सत्प्रेरणा से पिता जी में कविता का आदिस्रोत फूटा था और वे कविता की राह पर हमेशा के लिए चल पड़े थे। पिता जी ने अपने आरम्भिक काव्यगुरु के रूप में मदनेश जी को अपनी अनेक कृतियों में आदरपूर्वक याद किया है। पर अफसोस है कि मुझे मदनेश जी का कोई व्यवस्थित साहित्य पढ़ने को अब तक नहीं मिल सका। इधर सुखद सूचना मिली है कि मदनेश जी के सुयोग्य प्रपौत्र साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न और लेखन कर्म से भी जुड़े श्री शशिबिन्दु नारायण मिश्र अपने प्रपितामह मदनेश जी की कृतियों को तलाशने और सहेजने में जी- जान से जुटे हुए हैं। लगता है कि मदनेश जी बड़े रचनाकार होकर भी अपनी रचनाओं के प्रकाशन और उससे होने वाली यशाकांक्षा तथा लाभों से बेपरवाह थे। शशिबिन्दु जी 4- 5 वर्ष मुझसे छोटे हैं, और वे आज से 35-40 वर्ष पहले से पिता जी (रामदरश मिश्र) के पास अत्यन्त शालीन भाव से दिल्ली स्थित उत्तम नगर आवास पर आते रहे हैं, माता- पिता दोनों लोगों से मदनेश जी के बारे में बात करके जानकारी जुटाते हुए मैं देखती रही हूँ। पिता जी जब भी गोरखपुर जाते तब भी शशिबिन्दु जी का उनसे मिलना-जुलना अवश्य होता था। पिता जी से शशिबिन्दु जी के बहुत सारे पत्र-व्यवहार भी हुए हैं, उसे मैंने देखा और पढ़ा है। शशिबिन्दु जी जब भी पिता जी के पास आते, तो अक्सर मुझसे भी भेंट हो जाया करती थी। 5-6 वर्ष पहले की एक घटना याद आ रही है, माता-पिता दोनों लोग जीवित थे,-शशिबिन्दु जी दिल्ली आये हुए थे, माता-पिता के पास बैठकर बातचीत चल रही थी, माँ सरस्वती देवी ने शशिबिन्दु से कहा - बेटा ! ऐसा कभी नहीं होता है कि साहित्य की चर्चा चल रही हो,कवि जी मदनेश जी की मस्ती और जिन्दादिली को याद न करते हों।” शशिबिन्दु जी ने इस बातचीत को अपने मोबाइल में रिकार्ड भी किया है।

पिछले वर्ष 2025 और इस वर्ष भी मेरा एक बड़े उद्देश्य को लेकर अपने गाँव (डुमरी) बहुत बार जाना-आना हुआ, तो शशिबिन्दु जी उस सन्दर्भ में काफी उपयोगी सिद्ध हुए।  सबको पता है कि - ‘रामदरश मिश्र के साहित्य में जल जवार और जीवन’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन रानापार में अतिशय भव्यता से हुआ था, जिसमें देश के अनेक जाने- माने साहित्यकार आये थे।

खैर, यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई है कि शशिबिन्दु जी ने आजादी पूर्व की अनेक पत्र- पत्रिकाओं में यत्र- तत्र प्रकाशित मदनेश जी की कुछ रचनाओं का संकलन किया है और शशिबिन्दु जी के सम्पादन में मदनेश जी की एक पुस्तक आ रही है। इसके लिए मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद और शुभकामना देती हूँ। यह शशिबिन्दु जी की आत्मशक्ति की प्रबलता ही है कि मदनेश जी की मृत्यु के करीब 50 वर्षों बाद भी दत्तचित्त होकर इस काम में लगे हुए हैं। साहित्यिक दृष्टि से उदास और आत्मशक्ति से निराश व्यक्ति यह पवित्र कार्य कदापि नहीं कर सकता है। आत्मशक्ति से युक्त साहित्यिक मिज़ाज का व्यक्ति ही इस तरह की नयी योजना बनाकर उन्हें क्रियान्वित कर सकता है।

वह व्यक्ति निश्चित रूप से बड़ा होता है जो अपने अतिविशिष्ट पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ भाव रखते हुए उन्हें स्मरणीय बनाये रखने के लिए कृत- संकल्पित होता है।

मेरे पिता पद्मश्री स्वर्गीय रामदरश मिश्र पूरी सदी  को नापने वाले संभवतः प्रथम भारतीय साहित्यकार रहे। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के कछार अंचल के अति पिछड़े गाँव डुमरी में सन् 1924 में जन्मे पिता जी ने उस अञ्चल की ऊर्जा लेकर हजारों कविताएँ लिखीं। उनके भीतर बचपन से ही कविता रच- पच रही थी, किंतु उनके कवित्व- अभिव्यक्ति को दिशा सुझाने और माँजने वाले पिता जी से उम्र में 33-34 वर्ष बड़े उस जमाने के प्रतिष्ठित कवि मदनेश जी थे। पं० गणेश दत्त मिश्र पिताजी के प्रथम- काव्य गुरु रहे जिन्हें पिताजी ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘एक दुनिया अपनी’ में बहुत आत्मीयता से याद किया है।

पिता जी ने मदनेश जी के बारे में जो कुछ लिखा, उसे पढ़कर मुझे लगता रहा कि वह केवल एक गुरु का स्मरण भर नहीं है, बल्कि अपने भीतर के उस छोटे से गाँव के लड़के की खोज भी है, जो बहुत संकोच और संकोच से भरे भय के साथ कविता की दुनिया में कदम रख रहा है ।

मैंने मदनेश जी को नहीं देखा किंतु पिताजी की कविताओं, संस्मरणों आत्मकथा, कहानियों में उनकी उपस्थिति को इतना पढ़ा और अनुभव किया कि लगता है कि वे हमारे आसपास ही थे और वास्तव में वे पास के रानापार गाँव के ही थे।

मदनेश जी का गाँव रानापार, मेरे पिता जी के गाँव डुमरी से लगा हुआ है। वे वहाँ के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। लोग उन्हें पंडित कहते थे, कवि कहते थे। पिताजी तब प्राथमिक विद्यालय के छात्र थे। स्वाभाविक ही था कि इतने बड़े व्यक्ति के सामने उनके मन में एक तरह का भय और संकोच हो। लेकिन शायद उस डर के भीतर ही आकर्षण का पहला बीज भी था। क्योंकि पिताजी के भीतर भी तब एक कविता जन्म लेने के लिए बेचैन थी। अभी वह कवि नहीं था। बस कभी- कभी भीतर से झाँकता था और फिर चुप हो जाता था। मदनेश जी से उनका पहला परिचय उनके व्यक्तित्व से नहीं, उनकी कविता से हुआ। बाढ़ के दिनों में स्कूल के बच्चे बाढ़- पीड़ितों के लिए चंदा माँगने निकले थे। मास्टर साहब ने पिताजी से एक गीत गाने को कहा। उन्होंने गाया –

“उजड़ गए हैं फिर क्या बसेंगे

हम पीड़ितों की पुकार सुन लो

ये राप्ती  का कछार सुन लो...।”

गीत उन्हें बहुत अच्छा लगा। बाद में पता चला कि वह गीत मदनेश जी ने लिखा था। देहात में बैठे हुए, किसी बड़े शहर की साहित्यिक सभा में नहीं, किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के लिए नहीं – बल्कि उसी मिट्टी के बीच, उसी जीवन को देखते हुए जिसमें बाढ़ आती थी, घर उजड़ते थे और लोग फिर बसने की कोशिश करते थे। मदनेश जी से  शायद कविता के द्वारा  यही पहला परिचय था – जीवन से निकली हुई कविता का। मदनेश जी से प्रत्यक्ष परिचय कुछ समय बाद हुआ। पिताजी कक्षा चार में पढ़ रहे थे। एक दिन मदनेश जी घूमते- घूमते स्कूल आ गए। मास्टर साहब ने उनसे कहा कि बच्चों को हिंदी पढ़ा दें। उन्होंने “नर हो न निराश करो मन को” कविता जिस तरह पढ़ाई, वह पिताजी के मन में इतनी गहराई से उतर गई कि उसकी अनुगूँज हमेशा बनी रही। फिर एक दिन एक सहपाठी ने कहा – “उसके गाँव का एक लड़का है। शहर में पढ़ता है और कविता लिखता है।” शायद यह बात पिताजी के भीतर कहीं चुभ गई। उन्होंने कहा –“मैं भी लिख सकता हूँ। देखो, आज लिखता हूँ।” उस शाम स्कूल के सामने बगीचे में कांग्रेस की सभा थी। उसी सभा को आधार बनाकर उन्होंने अपनी पहली कविता लिख डाली। कविता लिख तो दी, लेकिन अब समस्या यह थी कि उसे दिखाएँ किसे? अगले दिन मित्र दीनानाथ के साथ वे मदनेश जी के पास पहुँचे।मदनेश जी नीम के नीचे खाट पर बैठे थे। आज सोचती हूँ तो लगता है – वह नीम केवल एक पेड़ नहीं था। वह पिताजी के साहित्यिक जीवन की पहली पाठशाला था। लेकिन उस समय बालक रामदरश के लिए वह जगह भय से भरी हुई थी। जी धक-धक कर रहा था। मन में आशंका थी – इतने बड़े कवि हैं। मेरी पहली, टूटी-फूटी कविता पढ़ेंगे और कहेंगे –‘यह क्या लिख लाए हो!’ शायद कागज़ एक ओर रख देंगे। दीनानाथ ने हिम्मत करके कहा – “पंडित जी, इन्होंने एक कविता लिखी है। पहली कविता है। आपको दिखाने आए हैं।” मदनेश जी ने कविता पढ़ी। फिर उन्होंने जो कहा, वह मेरे पिताजी के जीवन में हमेशा के लिए दर्ज हो गया – “अरे, यह तो बहुत अच्छी कविता है। इसमें तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य के बीज सन्निहित हैं। एक दिन अवश्य अंकुरित होंगे, पल्लवित–पुष्पित होंगे और अपनी सुगंध से दिशाएँ भर देंगे।” उस समय पिताजी उस भाषा का पूरा अर्थ नहीं समझ पाए होंगे। लेकिन बच्चे को यह समझने के लिए किसी शब्दकोश की आवश्यकता नहीं होती कि सामने वाला उसे स्वीकार कर रहा है। वे खिल उठे। जाते-जाते मदनेश जी ने कहा– “हाँ, लिखते रहो और मुझे दिखाते रहो।” फिर जैसे अचानक उन्हें कुछ याद आया – “अरे हाँ, क्या नाम बताया – रामदरश मिश्र? हाँ, रामदरश मिश्र। तुम चन्नर भाई के बेटे हो न?” पिताजी कहते थे कि उस दिन उन्हें सबसे अधिक खुशी इस बात से हुई थी कि मदनेश जी उन्हें जानते हैं। किसी बड़े व्यक्ति का किसी छोटे बच्चे को पहचान लेना भी कभी-कभी उसके जीवन की दिशा बदल देता है। इसके बाद पिताजी कविता लिखने में जुट गए। जो कविता लिखते, मदनेश जी को दिखाते। मदनेश जी जहाँ भी होते, जितने भी व्यस्त होते, उनकी कविताएँ पढ़ते। बहुत ध्यान से पढ़ते। अपनी राय देते। कहीं आवश्यकता होती तो संशोधन करते।

यह केवल कविता की शिक्षा नहीं थी। यह किसी बच्चे को यह विश्वास देने की प्रक्रिया थी कि उसकी आवाज़ का भी कोई अर्थ है। गाँव में लोग मदनेश जी को लेकर दूसरी बातें करते थे। वे कहते – “कितना निकम्मा आदमी है। इतनी बड़ी जमींदारी बर्बाद कर दी। बस दरवाजे पर बैठकर किताबें पढ़ना और टोपी लगाए घूमना।” पिताजी तब इन बातों का अर्थ नहीं समझते थे। उनके लिए मदनेश जी केवल आदर के पात्र थे। बाद के वर्षों में उन्हें समझ आया कि गाँव जिसे निकम्मापन कह रहा था, उसके भीतर एक दूसरी ही साधना चल रही थी। मदनेश जी जमींदार के बेटे थे, लेकिन उनका मन पुस्तकों में था, कविता में था, मनुष्य में था। उनके भीतर एक वाल्मीकि था, एक कालिदास था, एक तुलसी था, एक कबीर था, एक निराला था। वह भीतर का कवि उन्हें संपत्ति जोड़ने से अधिक मनुष्य जोड़ने की ओर ले जाता था। आज पिताजी की कही बातें याद करती हूँ तो मुझे लगता है कि मदनेश जी ने उन्हें केवल छंद, कविता या भाषा नहीं सिखाई। उन्होंने उन्हें उससे भी बड़ी चीज़ दी – विश्वास। एक ऐसे बच्चे पर विश्वास, जो स्वयं अपने भीतर के कवि को लेकर आश्वस्त नहीं था। उन्होंने पहली कविता में भविष्य देख लिया था, जबकि वह बच्चा केवल एक कविता लिखकर आया था। और शायद यही किसी सच्चे गुरु की सबसे बड़ी पहचान है – वह शिष्य में वह देख लेता है, जो शिष्य स्वयं अपने भीतर नहीं देख पाता। मेरे पिताजी के लिए मदनेश जी केवल उनके पहले कविता-गुरु नहीं थे। वे उनके जीवन के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कहा –“तुम लिख सकते हो।” और किसी बनने वाले कवि के लिए इससे बड़ा पहला पुरस्कार क्या हो सकता है?

जब मैं पिताजी की उस आरंभिक यात्रा के बारे में सोचती हूँ, तो मेरी आँखों के सामने बार-बार एक ही दृश्य आता है – एक छोटा-सा गाँव। एक नीम का पेड़। उसके नीचे एक खाट। खाट पर बैठे एक कवि और उनके सामने संकोच से भरा एक छोटा- सा लड़का, जिसके हाथ में उसकी पहली कविता है। मदनेश जी उस कविता को पढ़ रहे हैं। और फिर कह रहे हैं – “लिखते रहो।” शायद उसी क्षण एक कवि का जन्म हुआ था। और शायद उसी क्षण एक गुरु ने अपने शिष्य को वह पहला दीप दिया था, जिसकी रोशनी बहुत दूर तक जानी थी।


डॉ. स्मिता मिश्र

प्रोफेसर

श्री गुरु तेग़ बहादुर खालसा कॉलेज,

दिल्ली विश्वविद्यालय

सितंबर 2026, अंक 75

  शब्द-सृष्टि सितंबर 2026, अंक 7 5 संपादकीय – चलते-चलते पचहत्तर तक....... – डॉ. पूर्वा शर्मा अभिमत – ‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला ...