आलेख
राधाष्टमी
सुरेश चौधरी ‘इंदु’
बरसाने की राधिका, नन्द गाँव के श्याम
इनके चरणों में सदा, शत शत करूँ प्रणाम
श्याम आराध्य राधिके, अविरल प्रेम प्रसाद
मनहर प्रीत प्रकाशिनी, हर लो द्वेष विषाद
राधाष्टमी का पर्व राधा रानी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जो भक्ति और प्रेम का प्रतीक है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में राधा जी के महत्व को विशेष रूप से दर्शाता है। हालांकि, राधा जी का नाम श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत जैसे प्रमुख धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता है, फिर भी राधा और श्रीकृष्ण की प्रेमकथा भारतीय समाज और धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
राधा का नाम और अर्थ
राधा शब्द संस्कृत की ‘राध’ धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है उपासना या आराधना। ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा
शब्द के तीन प्रमुख अर्थ बताए गए हैं।
1. पहला अर्थ : यह कहा गया है कि राधा वह हैं जिनकी आराधना स्वयं भगवान श्रीकृष्ण करते हैं।
यह उल्लेख मिलता है, “कृष्णेन आराधते इति राधा”, अर्थात् राधा वह हैं जिनकी आराधना कृष्ण करते हैं। इस दृष्टिकोण से,
राधा केवल एक चरित्र नहीं, बल्कि आराध्य
(पूजनीय) हैं, जिन्हें स्वयं श्रीकृष्ण भी पूजते हैं।
2. दूसरा अर्थ : राधा वह हैं जो श्रीकृष्ण की आराधना करती हैं। यह भक्ति का उच्चतम रूप है, जहाँ प्रेमी अपनी पूरी आत्मा और भावनाओं को समर्पित कर देता
है।
3. तीसरा अर्थ : ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा के नाम का एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है। ‘रा’ का अर्थ है ‘पाना’,
और ‘धा’ का अर्थ है ‘मोक्ष’ या ‘निर्वाण’। इसलिए, राधा को वह माना जाता है जिनसे भक्तजन
मोक्ष प्राप्त करते हैं।
करण में ‘आ’ प्रत्यय होने से आराधिका (भगवान की आराधना करने वाली) अर्थ होता है।
अर्थात् कृष्ण की आराधना करने वाली वो राधा
रा इत्यादानवचनो धा च निर्वाणवाचकः।
ततोऽवाप्नोति मुक्तिं च तेन राधा प्रकीर्तिता॥४॥
- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्डः २ (प्रकृति खण्ड) अध्याय ४८
संछिप्त भावार्थः - (महादेव जी कहते है माता पार्वती से -) ‘रा’
का अर्थ है ‘पाना’ और ‘धा’ का अर्थ है ‘निर्वाण’ (मोक्ष)। भक्तजन उनसे
निर्वाणमुक्ति पाता है, इसलिये उन्हें ‘राधा’ कहा गया है
राधा जी के अवतरण का विवरण
ब्रह्म-वेवृत पुराण में वर्णित है कि राधा जी का जन्म श्री कृष्ण से ११ १/२ महीने पूर्व हुआ था, जब भगवान विष्णु ने अवतरण लेने का निश्चय किया तो सर्व प्रथम अपने ह्रदय को अलग कर राधा स्वरुप में अवतरित कराया, अर्थ राधा कोई अलग नहीं श्रीकृष्ण ही है, यहाँ आरंभ होता है अर्धनारीश्वर कि कल्पना का विचार।
राधा का आध्यात्मिक स्वरूप
राधा जी को आह्लादिनी शक्ति कहा जाता है, यानी वह शक्ति जो आनंद, प्रेम और
दिव्यता का स्रोत है। जब कोई साधक अपने हृदय में सच्ची भक्ति और प्रेम का अनुभव
करता है, तो वह राधा की उपस्थिति को महसूस करता है। इसे इस
रूप में भी देखा जाता है कि राधा कोई एक सामान्य महिला नहीं हैं, बल्कि किसी भी जीवात्मा के लिए प्रेम और भक्ति का प्रतीक हैं। जो भी अपने
जीवन में कृष्ण की आराधना में संलग्न हो जाता है, वह अपने आप
में राधा कहलाता है। राधा वह ऊर्जा है, जो भक्ति और प्रेम का
सृजन करती है।
राधा और कृष्ण: प्रेम और भक्ति का संबंध
राधा और श्रीकृष्ण के संबंध को प्रेम और भक्ति के उच्चतम
रूप के रूप में देखा जाता है। यह प्रेम सामान्य सांसारिक प्रेम नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक प्रेम है, जो आत्मा और
परमात्मा के बीच का संबंध दर्शाता है। यह प्रेम उस अवस्था को इंगित करता है जहाँ
जीवात्मा (राधा) अपने परमात्मा (कृष्ण) से मिलन के लिए व्याकुल होती है।
राधा जी का नाम हमेशा कृष्ण से पहले लिया जाता है, जैसे ‘राधाकृष्ण’, क्योंकि यह दर्शाता है कि पहले आराधना (राधा) होती है, फिर भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है। बिना आराधना के भगवान से मिलन
संभव नहीं है। इसीलिए, राधा का स्थान भगवान कृष्ण के जीवन
में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भी माना जाता है कि राधा जी के बिना श्रीकृष्ण की
लीला अधूरी है।
राधा की भक्ति का विकास
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, राधा
और कृष्ण की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। भक्तिकाल के कवियों ने राधा-कृष्ण
के प्रेम और उनकी भक्ति को विस्तार से लिखा। कहा जाता है कि सबसे पहले दक्षिण के
आचार्य निम्बार्क जी ने राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया। इसके बाद,
वल्लभ संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, और सखीभाव संप्रदाय जैसे कई भक्तिसंप्रदायों ने राधा-कृष्ण की भक्ति को
समाज में फैलाया।
कवि जयदेव ने ‘गीत
गोविंद’ में राधा और कृष्ण के प्रेम का उल्लेख किया और इसे
भक्तिकाल की सबसे प्रमुख रचनाओं में से एक माना जाता है। इससे पहले राधा का नाम
धार्मिक ग्रंथों में नहीं पाया जाता था, लेकिन भक्तिकाल में
राधा-कृष्ण के प्रेम को विशेष स्थान मिला और तब से राधा-कृष्ण एक अटूट जोड़ी के
रूप में पूजनीय हो गए।
राधा के विवाह की कथाएँ
राधा जी के विवाह को लेकर विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग कथाएँ मिलती हैं। कुछ ग्रंथों में राधा और श्रीकृष्ण के विवाह का उल्लेख है, तो कुछ में राधा जी का विवाह रायण नामक व्यक्ति से बताया गया है, जो श्रीकृष्ण के मामा थे। लेकिन यह भी कहा गया है कि राधा ने अपने शरीर की छाया छोड़ दी थी, और रायण से उनकी छाया का विवाह हुआ था।
यह भिन्न कथाएँ दर्शाती हैं कि भक्तिकालीन संतों ने अपनी
भक्ति भावना के आधार पर राधा-कृष्ण की कथाओं को विस्तार से गढ़ा। इसीलिए, राधा और कृष्ण की कथा कई रूपों में सामने आती है, जिनका वास्तविक सत्य निश्चित करना मुश्किल है।
राधा: भक्ति का प्रतीक
राधा जी का चरित्र यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति और प्रेम
क्या होते हैं। वह केवल एक प्रेमिका नहीं हैं, बल्कि
भक्ति और त्याग का प्रतीक हैं। उनका प्रेम किसी साधारण प्रेमी-प्रेमिका का नहीं,
बल्कि उस आत्मा का प्रेम है जो अपने परमात्मा से मिलन के लिए
लालायित है। राधा की भक्ति और कृष्ण की लीला एक ऐसी प्रेमकथा है, जो भक्ति के उच्चतम स्तर को दर्शाती है।
राधा-कृष्ण का प्रेम यह संदेश देता है कि भक्ति के बिना
ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। राधा का नाम प्रेम और भक्ति का ऐसा प्रतीक बन गया
है, जो युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।
निष्कर्ष
राधाष्टमी का पर्व न केवल राधा रानी के जन्मदिन को मनाने का
अवसर है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि भक्ति,
प्रेम और समर्पण का वास्तविक अर्थ क्या है। राधा जी का जीवन यह
संदेश देता है कि सच्चा प्रेम, चाहे वह ईश्वर के प्रति हो या
किसी अन्य रूप में, हमेशा त्याग, समर्पण
और पवित्रता से जुड़ा होता है।
भृंग गुंजन से
गुंजित मधुकर तेरे
वेणु स्वर
गाऊँ मृदु भावों
को शब्दों में
परिवर्तित कर
राधिके तू गाती
हृदय की कली पर मदिर गीतांजलि सी
प्रेम पोषित शब्द मनहर श्याम के काव्य की काव्यांजलि सी
ठहरी ठहरी सी श्वास गति का अतिक्रमण कर तू
प्रेम पियूष रस
हृदय सम्बलित समर्पण कर तू
वृषभान तनुजा हृदयांकित
है जीवन गति मेरी स्वरांजलि
झंकृत हुई परिष्कृत हुई
तर्पण की यह शुद्ध
हृदयावली
ब्रज रज से
सिंचित है अध्यात्म प्रतीक पताका
रासरंजन लस रंजना
प्रीत उर श्रेष्ठ
श्लाखा
वसंत नील व्योम
पर चंचल उर्मित अधृत सी
तड़ितावली
आराध्य
राधिके तू पुष्पांजलि
तू प्रांजलि तू प्राणांजलि
सुरेश चौधरी ‘इंदु’
एकता हिबिसकस
56 क्रिस्टोफर रोड
कोलकाता
- 700046







