राष्ट्रीय
साम्प्रदायिकता बनाम कलंक
प्रो.
शिवप्रसाद शुक्ल
समकालीन
कथा साहित्य का फलक काफी विस्तृत है। डॉ॰ सुरेश कुमार मिश्र हिन्दी साहित्य के
गंभीर शोध अध्येता के साथ प्रामाणिक स्वानुभूति को सर्जन प्रक्रिया में ढालने में सिद्धहस्त हैं।
इन्होंने मंगलेश डबराल की काव्यानुभूति, मंगलेश
डबराल और उनकी समकालीनता, पतझड़ की आवाज काव्य संग्रह के साथ
‘कलंक’ जैसा साम्प्रदायिक उपन्यास लिखकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत हर पहलुओं पर
किया है। काला जल, झूठा सच, सूखा बरगद,
जिन्दा मुहावरे, झीनी झीनी बीनी चदरिया,
आधा गाँव, पाकिस्तान मेल, तमस, कितने पाकिस्तान के बाद ‘कलंक’ की अर्थवत्ता पर
प्रश्नचिह्न उठाना स्वाभाविक है। साम्प्रदायिकता, जातिवाद,
धार्मिक कट्टरता कहीं न कहीं राजनीतिक पैंतरेबाजी के चलते राष्ट्र
को कमजोर बना रही है। धर्मान्तरण एवं अंतरजातीय विवाह बचे-खुचे आर्यावर्त को अपने
आगोश में लेते जा रहे हैं। डॉ॰ सुरेश कुमार मिश्र हर तरह की पैंतरेबाजी से भली
प्रकार परिचित हैं। कोई भी रचनाकार मूलतः साम्प्रदायिक नहीं होता है परन्तु
आलोचकों के चलते दक्षिणपंथी खेमे के रचनाकारों को गाहे-बगाहे सिद्ध कर देते हैं।
लेखकों एवं समाज के सामने काफी चुनौतियाँ हैं। साम्प्रदायिकता के साथ अस्मिता मूलक
विमर्शों ने भी काफी चुनौतियों को आमंत्रित किये हैं। फिलहाल विकट, विचित्र वातावरण में भी रचनाकार मानवता की रक्षा के लिए लिख रहे हैं। डॉ॰
सुरेश कुमार मिश्र के उपन्यास ‘कलंक’ में 21 खण्ड एवं 100 पृष्ठ
हैं। कुछ आलोचक इसे लघु उपन्यास भी या लम्बी कहानी भी कह सकते हैं। उदय प्रकाश की
लम्बी कहानियों की तरह ‘कलंक’ को लम्बी कहानी कहने से त्याग पत्र या अपने-अपने अजनबी या दौड़ या सुखदा जैसे
उपन्यासों को भी लम्बी कहानी कहना पड़ेगा। डॉ॰ सुरेश कुमार मिश्र ने इस उपन्यास
में आत्मकथ्य तो नहीं लिखा है परन्तु प्रो. दिलीप मेहरा ने “सामाजिक सौहार्द की
यथार्थ झाँकी है— कलंक” में कलंक को उपन्यास ही माना है। ‘शेखर: एक जीवनी’,
‘मानस का हंस’, ‘खंजन-नयन’, ‘आवारा-मसीहा’ को जीवनी परक उपन्यास माना है। ‘कलंक’ उपन्यास के अंत का
कथन: “मनुष्य जब उन्मादी होता है तो अन्धा हो जाता है। इसी अंधेपन में मानवता की
हत्या कर देता है। जेहादियों में सोचने की क्षमता कहाँ होती है। मुमताज का परिवार
मानवता का पाठ पढ़ चुका था इसलिए उसे जेहाद नहीं बल्कि राष्ट्र पहले दिखता है
किन्तु औरों को सिर्फ धर्म।”
रामापुर
या फतनपुर या किसी भी गाँव या शहर का राग-द्वेष हिन्दू-मुस्लिम के कारण
दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। जाति एवं धर्म भेद के चलते आर्यावर्त टुकड़ों में बँटता
चला गया। भारत के कोने-कोने में मुसलमान बढ़ते जा रहे हैं। इस पर भी गम्भीरता से
पुनर्विचार करना होगा। असलम वगैरह किसान पर आक्रमण कर रहे हैं तो किसान की पत्नी
और बैल किसान को बचाने में जुट जाते हैं। स्थानीय नेता से लेकर उच्च नेता तक दंगे
को और तूल देकर अपना वोट बैंक तैयार कर रहे हैं। भारतीय पारिवारिक परिवेश के भगोल,
भागीरथी (भागी) एवं मकरन्धा के संवाद काफी समसामयिक, जीवंत एवं रोचक हैं। “आज की शिक्षा राह का वह पत्थर है जिसे सिर्फ पैर से
ठोकर मारकर किनारे किया जाता है, फूल समझकर अंगीकार नहीं
किया जाता। स्वतंत्रता से लेकर आज तक प्राथमिक शिक्षा पर कोई कारगर नीति नहीं बनी
जिससे बच्चों को भौतिक संसाधन से लेकर मनभावन शिक्षा दी जा सके।” किसी भी देश की अखण्डता, सौहार्दता वहाँ की शिक्षा पर निर्भर करता है। भौगोलिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक शिक्षा सद्गुण प्रदान करेगा तभी शिक्षा कामयाब
होगी। भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर समय-समय पर आयोग बनते रहे, श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ एवं शंकर शेष के नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’
में शिक्षा की दशा एवं दिशा देख सकते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आगाज होने से काफी उम्मीदें बनी थीं परन्तु धीरे-धीरे लोगों का मोहभंग
उससे भी हो रहा है। भगोल के तीन बेटे एवं दो बेटियाँ थीं जिसमें भागी उर्फ भागीरथी
की नटखटता से सब लोग भली प्रकार परिचित थे। प्राथमिक शिक्षक से लेकर उच्च स्तरीय
शिक्षक का एकमात्र प्रदेय सार्वभौमिक एवं मूल्यपरक राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत
शिक्षा प्रदान करें। किसी भी जाति या धर्म का बच्चा घर, परिवार,
समाज, राज्य, देश या
विश्व से बहुत कुछ सीखता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुमत की अपेक्षा सदैव
रहेगी जिससे हर धर्म, जाति एवं सम्प्रदाय में सदैव सौहार्द
बना रहे। भारत में कई राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक दल हैं। अपने-अपने एजेन्डे को
बढ़-चढ़कर आम सभाओं में रखेंगे। जरूरत पड़ी तो धन या कपड़े का मुफ्त वितरण करेंगे
या साम्प्रदायिक दंगे करवा देंगे। यहाँ वोट बैंक तैयार करने के कई हथकण्डे काम में
आते हैं।
राजबहादुर
प्रधान ही नहीं, कोई भी प्रधान चुनावी दौर में हर
प्रकार के हथकण्डे अपनाते हैं और चुनाव जीतते हैं। कांग्रेस या भाजपा या अन्य कोई
भी दल साम्प्रदायिक दंगे करवाकर वोट बैंक बनाते हैं। इस बात को गहराई से हर जाति
एवं धर्म के लोग जानते हैं। भले ही हिन्दू अली महमूद जैसे लोगों को अपना मित्र
मानते हों परन्तु अवसर पाने पर अली महमूद या तमस का मुराद अली या कोई भी मुसलमान
हिन्दुओं को छोड़ता नहीं है। मुहम्मद साहब के जन्म से लेकर अब तक इस्लाम कबूल
करवाने की परम्परा कायम है। मंथरा एवं गूदरी जैसे लोग तिल को ताड़ बनाने वाले हर
युग में थे और रहेंगे। भगोल की बहन रामापुर में ब्याही गई थी। जानू के अब्बा का
इंतकाल होने पर प्रधान ने ढाई सौ रुपए लेकर दफनाने दिया था। उधर रामापुर के भगोल
के जीजा जी एवं बहन की मुसलमानों ने हत्या कर दी थी उनकी छोटी बेटी पूजा अपनी माँ
को जगाने की कोशिश कर रही थी। पंचनामा वगैरह करके दोनों बैलों को दफन कर दिया।
पुलिस ने असलम की पिटाई अच्छी तरह से की थी । जोखू पंडित असलम के परिवार को जिन्दे
जी कब्र में दफन करना चाहते थे परन्तु भगोल जैसे मानवतावादी व्यक्ति तैयार नहीं
होते हैं। “आक्रोश अंधा जरूर होता है किन्तु भयाक्रांत भी होता है। पुलिस के नाम
से सब डरते थे- कोर्ट-कचहरी कोई नहीं जाना चाहता।” छोटे-छोटे गाँवों में नफरत की आग
लगाई जा रही है जिससे राष्ट्रीयता प्रभावित हो। आर्यावर्त धीरे-धीरे कई देशों में
विभक्त हो गया, कुछ इससे भी सबक लेना चाहिए।
छात्रों
को राष्ट्रोचित शिक्षा न मिलने से वे इधर-उधर के कार्यों में लग जाते हैं। उधर
भागी का मन पढ़ने के बजाय नौकरी की तरफ कुलाँचे मारने लगा। हम उम्र के लड़के से
दोस्ती करके भागी कानपुर भाग गया और वह लड़का भागी को बाथरूम में छोड़कर गाँव भाग
आया। हालाँकि भागी घर से अँगूठी चोरी करके भागा था। बिसारती था तो बलिया का परन्तु
भागी को कानपुर बताया था। हालाँकि भागी ने बिसारती को चूसने के लिए गन्ना दिया था।
भागी के घमंड को चूर-चूर करने के लिए बिसारती यह कार्य करता है। भागी का अकड़पन
द्रष्टव्य है:“अहिर गड़ेरिया जादो चोर । धर सारे की
टँगोरी तोर।” दूसरी जाति का रघुनाथ का उत्तर: “बाभन देवता
भीख मँगौता । थोड़ा सा पौता मुँह में नौता।” जाति के आधार पर उत्तर-प्रत्युत्तर आज भी खूब हो
रहे हैं। इसी में कभी-कभी मारपीट या साम्प्रदायिक दंगे भड़क जाते हैं। भागी या
किसी और ने स्कूल की मड़ैया को जला दिया था।भागी तो कानपुर चला गया। अब भागी के
पिता भगोल को घेरकर स्कूल की मड़ैया बनवाने के लिए मजबूर किया जाता है। भगोल ईख के
पत्ते से स्कूल की मड़ैया बनवाता है। भागी उर्फ भागीरथी अपनी किस्मत कानपुर में
आजमाने लगा। कानपुर के सेठ के यहाँ येन-केन जीविका चलाते हुए भागी अपनी कर्मठता के
आधार पर दुकान चलाना शुरू कर दिया। कानपुर के सेठ के परिवार के सहयोग के साथ मुमताज
से मिलकर हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए एक संगठन बनाता है। भागी को गाँव या कानपुर
वाले जो कष्ट दिए वे सारे कष्ट एक किनारे रह गए। लालाजी,
ललाइनजी, नीलाम्बरी आदि के प्यार से अभिभूत
होकर भागी उन्हीं को अपना घर एवं माता-पिता मानने लगा। देश के स्वतंत्र होने के
इतने वर्षों बाद भी हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य या रोटी-बेटी का सवाल पेंचीदा है।
मुमताज के पिता उदार हैं परन्तु माँ उदार नहीं हैं। समग्र हिन्दू या मुस्लिम
परिवार उदार नहीं होते हैं। नीलाम्बरी ने ही भागी का परिचय मुमताज से करवाया था।
यहाँ तक कि नीलाम्बरी की माँ भी भागी पर संदेह करने लगी थी। फिलहाल इन्हीं टुन्न-फुन्न
के बीच भागी एवं मुमताज के साम्प्रदायिक सौहार्द के कार्य की लोग प्रशंसा करने
लगते हैं। धर्म एवं सम्प्रदाय की डोर में बँधे लोगों को इज्जत प्यारी होती है
व्यक्ति नहीं। बदलते परिवेश की नजाकत को परखते हुए डॉ॰ सुरेश कुमार मिश्र ने
‘कलंक’ उपन्यास लिखकर इंसान एवं मानवता को सजग किया। ग्रामीण या शहरी भेदभाव खत्म
हो रहे हैं परन्तु जाति-पाँति एवं सम्प्रदाय के भेदभाव बढ़ते जा रहे हैं।
हिन्दू-मुस्लिम या ईसाई को समान नागरिक संहिता के तहत रोटी-बेटी के सवाल को सुलझा
लेना चाहिए। ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में जाति-धर्म एवं
प्रदेश की अनुगूँज देखी जा सकती है। चुनाव जीतने के लिए सामाजिक अभियंत्रण का
सिद्धांत कार्य करता है। भागी के चले जाने से भगोल को जो परेशानी हुई वह अलग बात
है परन्तु भागी की उपलब्धि से घड़ों आँसू बहाना भी बेकार है। डॉ॰ मिश्र ने अपने पहले
‘कलंक’ उपन्यास में घटनाओं को बड़ी बारीकी एवं सूझ-बूझ के साथ पात्रानुकूल भाषा
में आद्यंत विनियोग किया है। मुस्लिम एवं अंग्रेज राज्य समाप्त हो गए परन्तु
दिन-प्रतिदिन मुसलमानों एवं ईसाइयों की
वृद्धि हो रही है। लोकतंत्र में बहुमत चाहिए। ईसाइयों एवं
मुस्लिमों के बढ़ते वोट बैंक अंग्रेजी ढंग की शिक्षा खाद का काम कर रही है। इस
समस्या को समझने के लिए अज्ञेय की कहानी ‘शत्रु’ को पढ़ेंगे तो काफी बातें स्पष्ट
होंगी। नोन, तेल, लकड़ी की जुगाड़ में
नवयुवक पलायन कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता एवं जातिवाद के चलते किसी भी राष्ट्र का
समेकित विकास संभव नहीं है। लेखक ने इन तमाम मुद्दों को कलंक उपन्यास में सार्थक
एवं कम शब्दों में उभारा है।
भागी
एवं मुमताज साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं परन्तु
कुछ विघ्न संतोषी लोग अंदर ही अंदर वातावरण को दूषित भी कर रहे हैं। भागी एवं
मुमताज गाँव के साम्प्रदायिक दंगे को शांत कराने में सफल होते हैं परन्तु भागी के
माता-पिता या अन्य लोग मुमताज एवं भागी को स्वीकार करेंगे। इसका दंश नासिरा शर्मा
के उपन्यासों में भी मिलता है। साम्प्रदायिकता राजनेताओं,
धर्मगुरुओं एवं पूँजीपतियों की उपज है। इसीलिए साम्प्रदायिक सिरफिरे
लोगों का मंतव्य है: “मुमताज की शादी इस साले से करने जा रहे
थे। हम लोग सोचे क्यों न इसे ही मिटाकर अपनी जाति की शान बचाई जाय।” अनायास भागी की हत्या कहीं न कहीं शिक्षा पर
सवाल उठता है। कहीं न कहीं भविष्य में विभाजन के लिए तैयार रहना होगा। डॉ॰ सुरेश
मिश्र ने ‘कलंक’ उपन्यास के मारफत दरिद्रता, गरीबी,
साम्प्रदायिकता को बड़ी बारीकी से चिन्हित करके ‘कलंक’ उपन्यास को
एक नया कलेवर दिया है। इसी प्रकार विकास कुमार झा के उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ या
राकेश कुमार सिंह के उपन्यास ‘महाअरण्य में गिद्ध’, ‘ऑपरेशन
महिषासुर’ पढ़ेंगे तो तमाम विडम्बनाएँ साफ परिलक्षित होती हैं। धर्म, शिक्षा, राजनीति में धन, शराब
एवं औरतों के बोलबाले से साम्प्रदायिकता का सहारा लेकर जल, जंगल
एवं जमीन के रखवालों को SEZ या GEZ वाले
गिद्ध नोचते-खाते जा रहे हैं। लोग धर्म परिवर्तन भी कर रहे हैं। लेखक अपने कर्तव्य
का निर्वहण करते हुए रचनाएँ लिख रहे हैं, प्रकाशक अपने बाजार
में छापकर बेच रहे हैं। सामान्य लोग इस गणित को समझ नहीं पा रहे हैं। इन
विसंगतियों को व्यापक रूप से देखना-समझना हो तो शरणकुमार लिम्बाले के उपन्यास
हिन्दू, सनातन एवं रामराज्य पढ़ेंगे तो असली भारत का
परिदृश्य सामने आएगा।
डॉ॰ मिश्र के उपन्यास को आद्यंत पढ़ने पर उनकी तटस्थ,
पारदर्शक एवं मानवतावादी दृष्टि का पता चलता है। ‘कलंक’ उपन्यास के
पात्रों के अनुकूल भाषाशैली एवं कथोपकथन का समसामयिक विनियोग बहुत कुछ कह जाता है।
दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक के मुद्दे आए दिन हिन्दुस्तान
को झकझोर कर रख देते हैं। रचनाकार साम्प्रदायिकता को परत दर परत इस उपन्यास में
भली प्रकार उभारा है। डॉ॰ सुरेश कुमार मिश्र की सम्प्रेषणीय, बोधगम्य एवं स्वाभाविक भाषा ‘कलंक’ उपन्यास को पढ़ने के लिए सहृदयों को
आकर्षित करती है। समसामयिक जीवंत समस्या पर कलंक उपन्यास लिखकर डॉ॰ मिश्र ने सबका
साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास के साथ एक भारत श्रेष्ठ
भारत की चुनौतियों की ओर इशारा कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता, जातिवाद,
धर्मान्तरण एवं गरीबी किसी भी देश के लिए कलंक हैं। भारत में कोई भी
व्यवस्था लाई जाय लोग अपनी सुविधानुसार उसका रास्ता निकाल लेते हैं। डॉ॰ मिश्र जी
के छोटे उपन्यास ‘कलंक’ में समाज, परिवार, राष्ट्र एवं विश्व के तमाम कलंक परिलक्षित हो रहे हैं। लिपि, भाषा, सभ्यता, संस्कृति,
समाज, राष्ट्र सब दाँव पर लगे हैं। बौद्धिक
नक्सली की तरह साम्प्रदायिकता भी रूप बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में
राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए गरीबी, साम्प्रदायिकता खत्म
करके सबको सुचारू एक शिक्षा, एक परीक्षा के साथ समान अवसर
उपलब्ध कराने होंगे। कुछ आलोचक डॉ॰ मिश्र के कथा
में बिखराव का आरोप लगा सकते हैं परन्तु आरोप लगाने वाले को पहले लिखना
पड़ेगा तब पता चलेगा कि कोई भी कृति लिखते समय तमाम दबाव होते हैं।
संदर्भ
ग्रंथ सूची
1. कलंक : डॉ॰ सुरेश कुमार मिश्र,
हंस प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण
2026, पृ॰ 100
2. वही पृ॰
09
3. वही पृ॰
26
4. वही पृ॰
29
5. वही पृ॰
99
***
प्रो.
शिवप्रसाद शुक्ल
हिन्दी
एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,
इलाहाबाद
विश्वविद्यालय - 211002
ARZ
No. 18-चक तेजऊ दीक्षित,
गंगापुरम,
अरैल, नैनी, प्रयागराज –
211008










