बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

आलेख


धर्म, निष्ठा और समर्पण का संगम

करवाचौथ

निर्जल उपवास, चंद्रमा और उपहारों से अलग भी बहुत कुछ कहता है करवा चौथ 

डॉ. घनश्याम बादल

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाए जाने वाला करवा चौथ केवल एक व्रत नहीं, प्रेम, विश्वास, समर्पण और साथ निभाने की कामना का पर्व है आज के दिन विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना करते हुए दिनभर निर्जल व्रत रखती हैं। शाम ढलते ही चाँद की प्रतीक्षा शुरू होती है। पूजा की थाली, छलनी, दीपक और चंद्रदर्शन के बाद पति का चेहरा देखकर व्रत खोलने की परंपरा दांपत्य प्रेम का विशिष्ट दृश्य रचती है। लेकिन सवाल है कि क्या करवा चौथ का अर्थ केवल भूखे-प्यासे रहकर पति की उम्र माँगना ही है, या इसके इतर भी कोई अर्थ है?

पौराणिक कथाएँ :

 सबसे प्रचलित कथा वीरवती की है।सात भाइयों की लाड़ली बहन वीरवती ने करवा चौथ का व्रत रखा, लेकिन भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। भाइयों ने पेड़ के पीछे दीपक जलाकर उसे चंद्रमा निकलने का भ्रम दिया और उसने व्रत खोल लिया। इसके बाद उसके पति के जीवन पर संकट आ गया। कथा के अनुसार, वीरवती ने पश्चात्ताप और तपस्या से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए। इस आख्यान का संदेश व्रत के प्रति निष्ठा और संकल्प से जुड़ा है। इसे  लोक-आस्था में प्रचलित पौराणिक कथा के रूप में देखना चाहिए।

दूसरी कथा के अनुसार करवा नाम की पतिव्रता स्त्री की कथा है। उसने अपने पति को मगरमच्छ से बचाने के लिए अद्भुत साहस दिखाया और अपने दृढ़ संकल्प से यमराज तक को चुनौती दी। कथा का मूल भाव है कि प्रेम केवल भावना नहीं, संकट के समय अपने साथी के साथ खड़े रहने का साहस भी है।  महाभारत से जुड़ी एक अन्य कथा में द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन के कल्याण के लिए व्रत रखने का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं की ऐतिहासिकता से अधिक महत्त्व उस भाव का है, जो पीढ़ियों से इनके माध्यम से संप्रेषित होता आया है।

धार्मिक दृष्टि से करवा चौथ पर भगवान गणेश, माता पार्वती, भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा का विशेष महत्त्व है। माता पार्वती को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शिव-पार्वती का संबंध प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान की प्रेरणा देता है। गणेश पूजा विघ्नों के निवारण की कामना से जुड़ी है, जबकि चंद्रमा को शीतलता, मन और भावनात्मक संतुलन का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार यह पर्व केवल पति की आयु की प्रार्थना नहीं, बल्कि परिवार के सुख और संबंधों की स्थिरता की कामना का पर्व भी है।

लेकिन चाँद को देखकर ही व्रत क्यों खोला जाता है? इसका उत्तर धार्मिक मान्यता और सांस्कृतिक प्रतीक, दोनों में छिपा है। हिंदू परंपरा में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। उसकी शीतलता और कलाएँ जीवन में संतुलन तथा परिवर्तनशीलता का बोध कराती हैं। चंद्रमा का उदय दिनभर के उपवास के समापन का संकेत बनता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति का चेहरा देखना प्रेम, विश्वास और मिलन का प्रतीक है। छलनी के पार दिखता जीवनसाथी मानो यह संदेश देता है कि प्रेम केवल किसी को देखने में नहीं, बल्कि उसे समझने और स्वीकारने की दृष्टि में भी बसता है।

    आध्यात्मिक अर्थ में चंद्रमा की प्रतीक्षा धैर्य और संयम का अभ्यास भी मानी जा सकती है। हालांकि चंद्रदर्शन व्रत की धार्मिक परंपरा है, कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं कि चाँद देखने से पति की आयु बढ़ती है। आस्था का सम्मान और वैज्ञानिक विवेक एक-दूसरे के विरोधी होना आवश्यक नहीं है।

समय के साथ करवा चौथ का स्वरूप बदला है। बाजार और प्रदर्शन की संस्कृति ने भी इसमें जगह बना ली है। महंगे परिधान, आभूषण, उपहार और तस्वीरों की प्रतिस्पर्धा कई बार पर्व के मूल भाव पर भारी पड़ जाती है। बाजार ने प्रेम को भी पैकेट में बंद करके बेचने की कला सीख ली है। महंगा उपहार प्रेम का प्रमाण और साधारण उपहार कम प्रेम का संकेत नहीं हो सकता। दांपत्य की असली समृद्धि आभूषणों या बैंक खाते में नहीं, कठिन समय में निभाए गए साथ में दिखाई देती है।

आज करवा चौथ को आधुनिक और अर्थपूर्ण बनाने की जरूरत है। यदि पत्नी पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती है, तो पति भी पत्नी के स्वास्थ्य, सम्मान और सुख के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे। अनेक दंपती साथ में पूजा करते हैं, जबकि कुछ पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं।  विवाह किसी एक व्यक्ति का दूसरे के लिए आजीवन त्यागपत्र नहीं, दो व्यक्तियों की साझा जिम्मेदारी है।

 दांपत्य में प्रेम का अर्थ केवल उपहार देना या सोशल मीडिया पर तस्वीर साझा करना मात्र नहीं,एक-दूसरे की बात सुनना, असहमति में सम्मान बनाए रखना, घर और बच्चों की जिम्मेदारियां बांटना, आर्थिक निर्णयों में साझेदारी करना और कठिन परिस्थितियों में सहारा बनना ही प्रेम की वास्तविक परीक्षा है। पति पत्नी की आकांक्षाओं का सम्मान करे और पत्नी भी पति की भावनाओं तथा जिम्मेदारियों को समझे। बराबरी रिश्ते की आत्मीयता घटाती नहीं, बल्कि उसे अधिक परिपक्व बनाती है।

व्रत में विवेक भी जरूरी है। निर्जल उपवास हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होता। मधुमेह, गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था या नियमित दवाओं की आवश्यकता होने पर चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। धर्म का उद्देश्य जीवन में मंगल की कामना है, स्वास्थ्य को अनावश्यक जोखिम में डालना नहीं। व्रत की भावना प्रार्थना, संयम, सद्भाव और आत्मीयता से भी व्यक्त की जा सकती है।

करवा चौथ रिश्ते की समीक्षा करने का अवसर है। इस दिन पति पत्नी से पूछ सकता है कि क्या वह खुश है, क्या उसकी कोई अधूरी इच्छा है और क्या उसे पर्याप्त सम्मान तथा सहयोग मिलता है। पत्नी भी पति की चिंताओं और अपेक्षाओं को समझ सकती है। पूजा के बाद कुछ समय साथ बैठकर मन की बात करना किसी महँगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है।

 करवा चौथ का चाँद आसमान में उगता है, लेकिन उसकी असली रोशनी घर के भीतर उतरनी चाहिए। यदि पत्नी पति की दीर्घायु मांगती है और पति उसके सम्मान की रक्षा नहीं करता, तो व्रत का आध्यात्मिक अर्थ अधूरा है। यदि दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी हैं, तो बिना दिखावे के मनाया गया करवा चौथ भी सार्थक है।


डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड - 247667

 

 

 


आलेख


‘हृदय राम का, पर निर्णय कृष्ण का’

श्रीराम पुकार शर्मा

‘क्या व्यक्ति को अपने जीवन में केवल तथाकथित अच्छा चरित्रवान बने रहना ही पर्याप्त है, या फिर उसके साथ ही बौद्धिक समझदारी भी आवश्यक है?’

आप में से अधिकांश लोगों का उत्तर, जीवन में बौद्धिक समझदारी के पक्ष में ही होगा । यही जीवन का यथार्थ भी है । विशेषकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, तो यह पूर्ण अपेक्षित है । आज कदम-कदम पर लोगों की चतुराई, कुटिलता, स्वार्थ-भाव आदि अपने विविध आडंबरपूर्ण स्वरूप को धारण किए हुए, हमारे मार्ग को रोके खड़े रहते हैं । ऐसे में चरित्रवान बने रहकर हमारी सरलता दुनियादारी के लिए पर्याप्त नहीं रह जाती है, बल्कि कुछ बौद्धिक कठोरता भी आवश्यक हो जाती है । अहंकारी समुद्र के समक्ष सबके प्रति दया-भाव रखने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी को भी, सक्रोध बाण धारण करना ही पड़ा था ।

 “बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति ।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ॥”

--- सुंदरकाण्ड, ५७

यह जीवन एक महासंग्राम है, जिसमें परिस्थितियों के, सम्बन्धों के और कार्य-व्यापारों के घात-प्रतिघात प्रतिपल चलते ही रहते हैं । इसमें मनुष्य को, न केवल बाह्य-परिस्थितियों से, बल्कि कभी-कभी उसे अपनी अंतःभावनाओं से भी जूझना पड़ता है । समय के साथ ही अपने विचारों और व्यवहारों में आंशिक परिवर्तन अनिवार्य हो जाता है । चाहे वह परिवर्तन किसी के अनुकूल हो, या फिर प्रतिकूल ही हो । ऐसी द्वन्द्वात्मक स्थिति में एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है कि क्या हम केवल दूसरों की दृष्टि में ‘अच्छे’ बनकर जीवन को जी सकते हैं, या फिर परिस्थिति के अनुसार अपने विचार को भी बदलना अनिवार्य हो जाता है ? ऐसी ही जटिल द्वंद्वातमक स्थिति के समाधान स्वरूप जीवन का एक महत्वपूर्ण और संतुलित सूत्र उभरता है -

“भाव राम का पावन हो, पर निर्णय कृष्ण का प्रखर;
यही संतुलन जीवन का, बनता है पथ का सच्चा स्वर ।”

समयानुसार मनुष्य के भीतर प्रायः दो प्रेरक शक्तियाँ कार्य करती हैं – प्रथम, - भावना (हृदय) और द्वितीय, - बुद्धि (विवेक) । भावना या हृदय हमें अपने प्रियजनों से जोड़ी रहती है तथा मन में उनके प्रति प्रेम, करुणा और सहानुभूति को जागृत करती है । हमारी यही कोमल भावना, अपने प्रिय जनों की गलतियों या कमियों को ढक देती है; परिणामस्वरूप हमें उनमें कोई दोष दिखाई नहीं देते हैं । जैसे हमें अपने नटखट बालक भी सद्गुणों से पूर्ण प्रतीत होते हैं, क्योंकि वे हमारे हृदय (भावना) से जुड़े रहते हैं, जबकि पराए बालकों के सद्गुण भी हमें दुर्गुण के रूप में दिखाई देते हैं ।

इसके विपरीत, बुद्धि या विवेक, हमें किसी को सही परखने, सही कठोर निर्णय लेने और परिणामों का पूर्व आकलन करने की क्षमता प्रदान करती है । लेकिन देखा गया है कि बुद्धि या विवेक का ज्यादा प्रयोग हम प्रायः अक्सर दूसरों के आचरण को परखने और उनका मूल्यांकन करने में किया करते हैं, अपनों के सम्मुख यह भाव अक्सर नरम पड़ जाते हैं । सांसारिक व्यक्ति के लिए इस कठोर भाव-दृष्टिकोण को भी सर्वथा उचित नहीं ठहराया जा सकता । अतः लोक जीवन में इन दोनों प्रेरक शक्तियों के बीच उचित संतुलन अपेक्षित हो जाता है । संतुलित हृदय और विवेकशील बुद्धि के परस्पर समन्वय से किया गया कर्म ही सर्वदा श्रेष्ठ होता है । श्रीकृष्ण ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में ‘बुद्धि-युक्त’ कर्म करने लिए सभों को प्रेरित किया है -

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥” ५०॥

---- सांख्य योग, श्रीमद्भागवात गीता

अर्थात्, - ‘तू योग या समत्व भाव में लग जा । क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता लाता है और कर्म बंधन से छूटने का उपाय है । जीवन में न केवल हृदय-भाव और न केवल बुद्धि-विवेक, अपितु दोनों का उचित संतुलन ही कर्म को श्रेष्ठ बनाता है ।’

ऐसे में कहा जा सकता है कि यदि व्यक्ति में केवल भावना या हृदय ही प्रधान हो, तो वह परिस्थितियों से वशीभूत होकर अत्यधिक भावुक, संवेदनशील और कभी-कभी विवश या निर्णयहीन हो जाता है । वह अपनों के दुःख और मोह से इतना प्रभावित हो जाता है कि सही और गलत का विवेक खो बैठता है । शैल्य-चिकित्सक के हाथ भी अपने प्रियजनों के शैल्य-कार्य करने में काँप जाते हैं । दूसरी ओर, यदि व्यक्ति में केवल विवेक-बुद्धि ही प्रधान हो, तो वह अत्यधिक तार्किक और निष्ठुर बन सकता है, जिससे सम्बन्धों की ऊष्मा घटकर शुष्क हो जाते हैं । दूसरों या अपरिचितों बच्चों के प्रति हमारा व्यवहार अक्सर कुछ कठोर ही हो जाया करता है । महाराज धृतराष्ट्र सम्राट के उच्च सिंहासन पर बैठकर भी अपने पुत्रों और पाण्डु-पुत्रों के प्रति भावना और बुद्धि का यही समुचित संतुलन स्थापित नहीं कर पाए, फलस्वरूप महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध अवश्यंभावी हो गया ।

अब अपने मूल विषय की ओर लौटें ।

‘भावना राम की’ अर्थात् ‘श्रीराम के समान शुद्ध हृदय की विशालता’ । इस सूत्र के अनुसार अपने हृदय को सरल, निर्मल और मर्यादित बनाना, जिसमें छल, कपट, द्वेष या अहंकार का कोई स्थान न हो, बल्कि करुणा, सत्य और धैर्य का ही अधिष्ठान हो । जैसे श्रीराम जी अपने हृदय की पावनता और अनन्य प्रेम द्वारा समस्त नर-नारी, पशु-पक्षी, यहाँ तक कि राक्षस और शत्रु-पक्ष के लोगों को भी अपना बना लिए थे । जब मनुष्य, हृदय की इस शुद्धता अर्थात् प्रेम की भावना को धारण करता है, तब सबके प्रति उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से विनम्र और संयमित हो जाता है; वह दूसरों के दुःख को समझने में सक्षम हो जाता है और अंततः अपने भीतर गहन संतुष्टि का अनुभव करता है । उसके कर्मों में स्थिरता और संतुलन आ जाता है, जिससे उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है । यह हृदय जनित भावना हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ, चाहे कैसी भी हों, हमारा स्वभाव और आचरण सदैव उत्तम बना रहना चाहिए । यह मनुष्य की कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति और चरित्र की उच्चता का ही दृढ़ प्रतीक है । हृदय की इसी विशालता ने श्रीराम जी को भक्त शबरी में अपनी माता कौसल्या के प्रेम और उसके जूठे फल में मातृ-सुधारस की अनुभूति कारवाई थी ।

 

Sabri was overjoyed to see Ram. She offered the best fruits she had, even  though they were half-eaten by her. Ram accepted them with grace and love,  and blessed her for devotion. #

 

अब ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र के आशय को भी समझ लेवें । इसका तात्पर्य है - ‘श्रीकृष्ण के समान बुद्धि की जागरूकता और परिस्थिति के अनुकूल यथार्थ दृष्टिकोण को अपनाना’ । किसी विषय को विवेकपूर्वक समझना, परिस्थितियों का सूक्ष्म परीक्षण करना, उसका उचित विश्लेषण करना और फिर श्रेष्ठ परिणाम के लिए उचित मार्ग का चयन करना ही ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र की सार्थकता है । जगत में सत्य या धर्म की रक्षा केवल भावना से नहीं, बल्कि उचित निर्णय और साहसिक कार्य के द्वारा ही संभव हो सकता है । यह जीवन केवल सरल और आदर्श परिस्थितियों पर ही निर्भर नहीं रहता, बल्कि इसमें कई बार ऐसे भी क्षण आते हैं, जहाँ परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल हो जाती हैं और सही-गलत की विभाजक रेखा धुंधली पड़ जाती है । ऐसी विषम अवस्था में केवल भावनाओं के आधार पर लिया गया निर्णय, आत्मघाती या नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है । तब बुद्धि-विवेक से युक्त ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र अनिवार्य हो जाता है । जैसे श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध-क्षेत्र में अन्याय का साथ देने वाले कौरव-दल के महारथियों - यथा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, अंगराज कर्ण और दुर्योधन आदि को परास्त करने के लिए कई बार अत्यंत कठोर और व्यावहारिक निर्णय लिये और उसके अनुसार कार्य करवाए थे । युद्ध को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने पहले तो हृदय या भावना का सहारा लिया, लेकिन जब वह निरर्थक हुआ, तब उन्होंने अवश्यंभावी महायुद्ध सम्बन्धित कठोर निर्णय को सुनाया - 

"हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अंतिम संकल्प सुनाता हूँ ।
याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा !"

 - कृष्ण की चेतावनी, रश्मिरथी, ‘दिनकर’


रथ का पहिया लेके #भीष्म की ओर ...

 

इस तरह से परिस्थिति को पहले गहराई और सूक्ष्मता से समझना, प्रत्येक पक्ष का निष्पक्ष विचार करना और फिर उस पर दूरदृष्टि के साथ निर्णय लेना । आवश्यक होने पर कठोर से कठोर कदम उठाने का साहस भी रखना जरूरी है । बुद्धि हमें सिखाती है कि जीवन केवल कोरे आदर्शों से नहीं चल सकता, बल्कि यथार्थ को स्वीकार कर, उचित मार्ग का चयन कर, उस पर चलना भी पुरुषार्थ ही होता है । सत्य या धर्म की रक्षा हेतु कभी-कभी कूटनीति, रणनीति, धैर्य और चतुरता का सहारा लेना भी आवश्यक हो जाता है । प्रत्येक परिस्थिति में एक ही प्रकार का निर्णय या व्यवहार बेकार साबित होता है । जहाँ प्रेम और करुणा हो, वहाँ कठोरता उचित न होता है । परंतु जहाँ अन्याय तथा कपट का वर्चस्व हो, वहाँ सहनशीलता को किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता है, बल्कि विवेक-बुद्ध के आधार पर वहाँ पर कठोर दमन नीति अपनाना ही धर्म होता है ।

वास्तव में, अपनी समस्त मानवीय क्रिया-कलापों में उचित परिमाण में ‘हृदय-भावना’ तथा ‘विवेक-बुद्धि’ का संतुलन बनाए रखना ही जीवन का वास्तविक सौंदर्य है । यदि व्यक्ति में केवल भावना हो और बुद्धि का अभाव हो, तो वह भावुकता के अतिरेक में बहकर एक पक्षीय या आत्मघाती निर्णय ले सकता है । इसके विपरीत, यदि उसमें केवल बुद्धि ही प्रधान हो और भावना का सर्वथा अभाव हो, तो उसका निर्णय निष्ठुर और अमानवीय हो सकता है । अतः आवश्यक है कि हृदय में करुणा हो, पर बुद्धि में पूर्ण स्पष्टता हो । यदि कोई व्यक्ति केवल ‘भावना राम की’ सूत्र को अपनाता है और ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र की उपेक्षा करता है, तो वह जीवन में बार-बार आहत या भ्रमित हो सकता है । उसकी सरलता को लोग उसकी कमजोरी मानकर, उसका अनुचित लाभ उठा सकते हैं । फिर वह स्वयं को असहाय ही महसूस करेगा ।

दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति केवल ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र को अपनाता है और ‘भावना राम की’ सूत्र का त्याग कर देता है, तो उसका जीवन नितांत कठोर और स्वार्थ-प्रधान हो सकता है । वह क्षणिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले, पर उसके मानवीय सम्बन्ध दुर्बल हो जाते हैं और अंततः वह स्वयं को अकेला पाता है । इसलिए यह परम आवश्यक है कि भावना हमें दिशा दे, पर बुद्धि हमारा मार्गदर्शन करे । भावना और बुद्धि के इस अद्भुत संतुलन का व्यावहारिक ज्ञान ही ‘जीवन का सार’ है । जिसने भी इस संतुलन को साध लिया, वही जीवन की श्रेष्ठता और आत्मिक ऊँचाई को प्राप्त कर लेता है । भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी हृदय-भावना और विवेक-बुद्धि के समन्वित स्वरूप को श्रेष्ठ बताकर उसे ही ग्रहण करने के लिए सबको प्रेरित किया है -

"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥"

---- ४८ वें श्लोक दूसरा अध्याय, भगवद्गीता

अर्थात, - ‘हे धनंजय (अर्जुन) ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि (सफलता और विफलता) में समान बुद्धि वाला होकर अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करो, क्योंकि जीवन में यह समता की भावना ही असली योग है ।’

यद्यपि ‘भावना राम की’ और ‘निर्णय कृष्ण का’ इन दोनों सूत्रों का क्षेत्र सार्वभौमिक है, तथापि कुछ विशेष परिस्थितियों में इसका महत्व स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है । पारम्परिक सम्बन्धों – जैसे परिवार, मित्र और निकट सम्बन्धियों के बीच, जहाँ प्रेम, धैर्य और समझ ही आधार हुआ करते हैं, वहाँ निज लाभ-हानि व स्वार्थ की भावना को त्यागकर ‘भावना राम की’ सूत्र को ग्रहण करना अत्यंत आवश्यक होता है । इसके विपरीत, कार्यक्षेत्र में, जहाँ बराबरी, प्रतिस्पर्धा, दबाव और जटिल परिस्थितियाँ सदैव प्रबल रहती हैं, वहाँ निष्पक्षता और परिणाम की दृष्टि से ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र अधिक उपयोगी सिद्ध होता है ।

इसी प्रकार, संघर्ष की स्थिति में पहले तो शांत और संयमित भाव, अर्थात् ‘भावना राम की’ सूत्र को अपनाकर उसके समाधान का प्रयास करना चाहिए । यदि समस्या सौहार्द से सुलझ जाए, तो वह विनम्रता ही सर्वोत्तम है । परंतु यदि समस्या न सुलझे, तो फिर ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र को अपनाते हुए, कठोर व उचित कदम उठाना अनिवार्य हो जाता है । लेकिन अन्याय को सहन करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है । ऐसे में अन्याय क्रमशः और भी मजबूत रूप को धारण करेगा और न्याय को निरंतर घायल करता रहेगा । अतः उचित समय पर बुद्धि-विवेक से युक्त साहसपूर्ण न्यायोचित कठोर निर्णय लेना ही सबके लिए श्रेयस्कर होता है ।

‘भावना राम की’ और ‘निर्णय कृष्ण का’ – दोनों सूत्र केवल विचार मात्र ही नहीं हैं, बल्कि इनमें जीवन का महान जीवन-दर्शन निहित है । ‘भावना राम की’ सूत्र हमें सहृदय मनुष्य बनाता है, जबकि ‘निर्णय कृष्ण का’ सूत्र हमें व्यावहारिक रूप से परिपक्व बनाता है । यह जीवन-दर्शन हमें एक ओर अपने भीतर की अच्छाई को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है, तो दूसरी ओर संसार की जटिलताओं से आँखें मूँदने के बजाय, उसके उचित समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है । हमें सरल और सहृदय अवश्य होना चाहिए, परंतु अज्ञानी या मूर्ख नहीं । हमें बुद्धिमान और तार्किक होना चाहिए, परंतु निष्ठुर या कठोर नहीं । मानव जीवन की वास्तविक सुंदरता, इन्हीं सूत्रों के सम्यक संतुलन में निहित है । यही जीवन की सच्ची साधना भी है -

“राम की मर्यादा जहाँ काम न आई, कृष्ण की कूटनीति वहाँ मुसकाई ।
जब जब अधर्म की प्रबलता बढ़ी, तब तब शस्त्र उठाना अनिवार्य हुआ,
तब हृदय भावना से ऊपर उठकर, विवेक ही कर्तव्य का सारथि हुआ ।"
 


श्रीराम पुकार शर्मा

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा –
711101

परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से.....

 दिन [31 अक्टूबर ] कुछ ख़ास है !

      

दृढ़ व्यक्ति और दूरदर्शी दृष्टि : सरदार पटेल

प्रो. हसमुख परमार

देशानुराग, राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक व सामाजिक स्वरूप की गहरी सूझ-बूझ, सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की समझ, समाजसुधार-समाजसेवा, अदम्य सहस, तर्कशक्ति, स्पष्टवादिता, अनुशासनप्रियता, व्यावहारिक सहिष्णुता जैसे उम्दा गुणों तथा महत् कार्यों से भारतीय समाज और राजनीति में स्वतंत्रता, सुरक्षा, एकता-समानता, अखण्डता की एक ठोस वैचारिक व व्यावहारिक जमीन तथा विश्वसनीय माहौल का  निर्माण कर आधुनिक भारत को, एक और अखण्ड भारत के रूप में आकार देने वाले दृढ़ व्यक्ति और दूरदर्शी व्यक्तित्व सरदार वल्लभभाई पटेल को आज [ 31 अक्टूबर ] उनकी अवतरण तिथि के अवसर पर विशेष रूप से स्मरण करते हुए नमन !

लौह पुरुष सरदार पटेल के व्यक्तित्व पर बात करते हुए कवि हरिवंशराय बच्चन की कुछेक पंक्तियों का सहज स्मरण हो उठता है-

यही प्रसिद्ध लौह का पुरुष प्रबल

यही प्रसिद्ध शक्ति की शिला अटल

हिला इसे सका कभी न शत्रु दल

पटेल पर, स्वदेश को गुमान है ।

×         ×         ×         ×         ×

हरेक पक्ष को पटेल तोलता

हरेक भेद को पटेल खोलता

दुराव या छिपाव से उसे गरज ?

सदा कठोर नग्न सत्य बोलता

पटेल हिंद की निडर जबान है ।

दरअसल सरदर पटेल की सामाजिक व राजनीतिक यात्रा उनके साहस की, उनके संघर्ष की तथा उनकी सफलता की एक ऐसी कहानी है जो राष्ट्र और समाज के प्रति उनकी उम्दा और ऊँची प्रतिबद्धता व समर्पिता को बखूबी उजागर करती है । आधुनिक भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से अंकित इस सरदार साहसगाथा में हम इस Iron Man of India से संबद्ध खेडा सत्याग्रह, बारडोली सत्याग्रह, स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय शिरकत, देशी रियासतों का एकीकरण, आधुनिक राष्ट्र निर्माण-भारत निर्माण, राजनीतिक भूमिका, अखिल भारतीय सिविल सेवा, समाजसेवा-सामाजिक संरचना में एकता-समानता, संविधान और लोकतंत्र प्रभृति मुद्दों-विषयों को देख सकते हैं, इन पर विस्तृत चर्चा कर सकते हैं । स्वतंत्रतापूर्व तथा स्वातंत्र्योत्तर भारत के उत्थान में, भारतीय राजनीति में तथा भारतीय समाज के विकास में इस कृती व्यक्तित्व को इनके महानतम योगदान के एवज में भारत सरकार ने 1991 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (मरणोपरांत) से सम्मानित किया ।

 “याद रखना मौत एक बार आती है, दो बार नहीं । अंततः हम सभी को मरना तो है ही, गरीब-अमीर चाहे कोई भी हो । अतः मौत से बिना डरे हमें निडर-निर्भीक बनना ही पड़ेगा ।”  इस तरह की बातें बताते हुए स्वतंत्रता की लडाई के दरमियान अपनी ओजस्वी वाणी से जनता में जोश और उत्साह का संचार करने वाले सरदार पटेल स्वतंत्रता व स्वराज के अधिकार को लेकर बड़ी सहजता से कहते हैं- “ हमें किसी दूसरे पर राज नहीं करना है, परंतु जैसे फ्रांसीसी लोग फ़्रांस में राज्य करते हैं, जर्मन लोग जर्मनी में और इटली वाले इटली में करते हैं, उसी प्रकार हम सिर्फ चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के लोग हिन्दुस्तान में राज्य करें ।”

 विश्व के इतिहास में जिन देशों के एकीकरण में जिन महान व्यक्तित्वों की भूमिका अहम रही उनमें भारत के एकीकरण में सरदार वल्लभभाई पटेल सबसे प्रमुख नाम है । जर्मनी के बिस्मार्क और सरदार पटेल दोनों को अपने-अपने राष्ट्र के राजनीतिक एकीकरण और बिखरे हुए राज्यों को एक सूत्र में बाँधने के लिए विशेष और विश्व विख्यात महत्ता प्राप्त है । असल में उक्त विषय में बिस्मार्क की तुलना में सरदार पटेल का कार्य कुछ ज्यादा चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण था । ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिए कि जर्मनी के एकीकरण में जितने राज्यों को एकत्र करना था उसके सामने भारत के एकीकरण में एकत्र किये जाने वाले राज्यों की संख्या (562) बहुत बडी थी । दूसरी बडी चुनौती इस बात को लेकर कि बिस्मार्क के सामने धर्म, भाषा और संस्कृति के वैविध्य को लेकर वो प्रश्न उतना मुश्किल नहीं जितना सरदार पटेल के लिए था । सरदार के सामने 562 रियासतें जिसमें धर्म, भाषा और संस्कृति को लेकर वैविध्य और ऐसी स्थिति में उन तमाम रियासतों को एक सूत्र में बाँधना वाकई में बड़ा मुश्किल काम, लेकिन सरदार पटेल ने यह भगीरथ कार्य सिद्ध किया ।

सरदार पटेल के व्यक्तित्व की, उनके विचारों की, उनकी नीतियों व निर्णयों की महत्ता व उपादेयता की चर्चा वर्तमान विविध राजनीतिक व सामाजिक संदर्भों में भी खूब होती है । वर्तमान की कुछेक समस्याओं के समाधान को लेकर, राजनीतिक विचारधारा को और ज्यादा मजबूती व सही दिशा के संदर्भ में, सामाजिक प्रश्नों के निराकरण के संदर्भ में तथा देश में एकता-समानता के प्रसंग में सरदार पटेल को याद किया जाता है । “ व्यक्ति जब अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को अपने लिए ही सीमित, संकुचित न रखकर राष्ट्र व समाज के स्तर पर नियोजित करता है तो वह निश्चित रूप से श्रेय व सम्मान का अधिकारी बनता है । सरदार पटेल इस दृष्टि से निश्चित ही उस श्रेय तथा सम्मान के अधिकारी हैं, जो उन्हें दिया जाता है । स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद जिन राष्ट्र नेताओं की कमी को हमारे देशवासी अनुभव करते हैं, उन्हीं में से वे एक हैं । आज देश के सामने कोई समस्या आती है तो बरबस मुँह से निकल पड़ता है- काश ! आज सरदार पटेल जीवित होते ।” ( महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग, पं.श्रीराम शर्मा, पृ.4.16) यदि आज सरदार होते ! यदि सरदार पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते ! यदि सरदार न होते ! जैसे कुछेक काल्पनिक सवाल भी आज एक अच्छी खासी चर्चा का विषय रहा है जो सरदार पटेल की महत्ता व प्रासंगिकता को रेखांकित करता है ।

31 अक्टूबर ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ तथा गुजरात में स्थित ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ दोनों सरदार बल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व को, उनके ऐतिहासिक कार्यों को, उनके मूल्यों व संकल्पों को बताते हैं और हम इनके माध्यम से इस महान शख्सियत के प्रति सम्मान भाव व्यक्त करते हैं ।

            अंत में पुनः एक बार सरदार वल्लभभाई पटेल की अद्वितीय देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम तथा उनके द्वारा किए गए महान व ऐतिहासिक कार्यों को याद करते हुए उनको कोटि-कोटि वंदन !

प्रो. हसमुख परमार

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभ विद्यानगर

आणंद (गुजरात)

 

बुधवार, 30 सितंबर 2026

सितंबर 2026, अंक 75

 

शब्द-सृष्टि

सितंबर 2026, अंक 75


संपादकीय – चलते-चलते पचहत्तर तक....... – डॉ. पूर्वा शर्मा

अभिमत – ‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला आशीर्वाद – डॉ. स्मिता मिश्र

दिन कुछ ख़ास है!

आलेख – शिक्षक गुरु से गूगल तक : अपरिहार्य है शिक्षक – डॉ. घनश्याम बादल

आलेख – हिन्दी मेरी हिन्दी………हिन्दी से हिंदी तक : नुक्तों और बिंदी तक – सुरेश चौधरी

कविता – जय गणेश(मल्लिका छंद) – डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

आलेख – राधाष्टमी – सुरेश चौधरी

कहानी – बदनाम बेटी ! – डॉ. घनश्याम बादल

काव्य

1. वन्दे मातरम् 2. हिन्दी भाषा 3. हिन्दी महीने (कुण्डलियाँ)– लोक कवि कर्मवीर सिंह

1. बादल डाल गया 2. सावन आना तुम 3. सावन आया है 4. साध अवनि की – शिवमोहन सिंह

आधुनिक हिंदी : देश का भविष्य – डॉ. रक्षा मेहता

मैं किसान हूँ – डॉ. नरेश सिहाग

ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार

आलेख

राष्ट्रभाषा के प्रश्न से जूझती हिंदी – इन्द्र कुमार दीक्षित

लो आ गई यह नव वधू-सी शोभती - शरद नायिका – श्रीराम पुकार शर्मा

विशेष – शरीर नहीं, दृष्टि हैं कृष्ण! – डॉ. घनश्याम बादल

पुस्तक समीक्षा – क्रांतिकारी डॉ.भगवान दास माहौर (शिवजी श्रीवास्तव) – कुमार कार्तिकेय


पुस्तक समीक्षा

क्रांतिकारी डॉ.भगवान दास माहौर (शिवजी श्रीवास्तव)

कुमार कार्तिकेय

शहादत और विद्वत्ता के दुर्लभ संयोग की गाथा है –  क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे नायक के जीवन और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। ​यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उस कालखंड का आइना है जब देश की युवा पीढ़ी ‘क्रांति’ और ‘आजादी’ के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर थी।

लेखक ने डॉ. भगवान दास माहौर की जीवन-यात्रा को अत्यंत जीवंत, भावपूर्ण और ऐतिहासिक सटीकता के साथ प्रस्तुत किया है जहाँ न केवल उनके अदम्य साहस और प्रतिबद्धता को दिखाया गया है, बल्कि उस दौर की राजनीति, क्रांतिकारी भावना और आत्म-त्याग की भावना भी पाठक तक प्रभावित ढंग से पहुँचती है। सम्पूर्ण पुस्तक को निम्नांकित शीर्षकों में देखा जा सकता है -

1. नायक का व्यक्तित्व और संघर्ष-

पुस्तक के मुख्य पात्र डॉ. भगवान दास माहौर एक बहुआयामी व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने किशोरावस्था में ही क्रांतिकारी अभियान से जुड़ने का निर्णय लिया और ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी’ के अनुशासित सैनिक बने। चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी के विश्वस्त सहयोगी के रूप में उन्होंने कठोर-सघन संघर्ष का अनुभव किया। शिवजी श्रीवास्तव ने उनकी ‘भुसावल बम कांड’ से लेकर ‘अंडमान की सेलुलर जेल’ तक की कठोर यात्रा को बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है।

2. कलम और पिस्तौल का संगम-

            इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह डॉ. माहौर के बौद्धिक पक्ष को उजागर करती है। वर्षों तक फरारी जीवन, क्रांतिकारी योजनाओं में भागीदारी और  जेल यात्रा और फिर रोके गये शिक्षा को बाद में जारी रखते हुए पीएच.डी. तथा शोध-कार्य से उच्च-शैक्षणिक उपाधियाँ भी अर्जित कीं। जेल से छूटने के बाद उन्होंने जिस तरह से साहित्य और शोध के क्षेत्र में कार्य किया, वह प्रेरणादायक है। लेखक ने यह बखूबी दिखाया है कि कैसे एक हाथ में पिस्तौल थामने वाला क्रांतिकारी, दूसरे हाथ में कलम पकड़कर समाज को नई दिशा दे सकता है।

3. लेखन शैली और शोध-

        शिवजी श्रीवास्तव जी की भाषा सरल लेकिन प्रभावशाली है। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई समझौता नहीं किया है। पुस्तक को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे पाठक स्वयं उस दौर की गुप्त बैठकों और जेल की कालकोठरियों का हिस्सा बन गया हो। लेखक का शोध सराहनीय है, क्योंकि उन्होंने उन छोटी-छोटी घटनाओं को भी संजोया है जो डॉ. माहौर के चरित्र निर्माण में सहायक रहीं।

पुस्तक में इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं रह जाता, बल्कि उन तथ्यों में मानवता, प्रेम, साहस और स्वाधीनता की चाह का गहरा रंग भर देता है। यह शैली खासकर युवा पाठकों को प्रेरित करने  वाली है कि वे उन वीरों के बलिदानों को समझे, आत्मसात करें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और आज़ादी की भावना को नई ऊर्जा दें।

4. किसके लिए है यह पुस्तक?

​         “क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर” उन पाठकों के लिए अनिवार्य है जो भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की गहराई को समझना चाहते हैं, अनछुई कहानियों को जानना चाहते हैं और जो प्रेरणादायी जीवन-कथाओं से सीखना चाहते हैं। शिवजी श्रीवास्तव जी ने इस पुस्तक के माध्यम से एक भूले-बिसरे नायक को वह सम्मान दिलाने का सफल प्रयास किया है, जिसके वे पात्र थे। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि आजादी केवल अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम क्रांतिकारियों के रक्त और बौद्धिक विमर्श से भी उपजी है। यह पुस्तक इतिहास के उन वीरों को सम्मान देने वाली एक सशक्त रचना है, जिसे हर स्वतन्त्रता-प्रेमी पाठक को पढ़ना चाहिए।


       एक पंक्ति में: यह पुस्तक “शहादत और विद्वत्ता” के दुर्लभ संयोग की गाथा है।

***                


समीक्षक - कुमार कार्तिकेय, लेखक -  शिवजी श्रीवास्तव,  पृष्ठ - 142, मूल्य -  210 रुपये, संस्करण - प्रथम 2025, प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत,  नई दिल्ली -110070

 


कुमार कार्तिकेय

नोएडा उ. प्र.


विशेष


 

शरीर नहीं, दृष्टि हैं कृष्ण!

डॉ. घनश्याम बादल

जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं, उस चेतना के प्रकट होने का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, मोह से विवेक की ओर और स्वार्थ से सत्य की ओर ले जाती है। कृष्ण का कारागार में  जन्म भी गहरा प्रतीक है। जब मनुष्य का विवेक भय, मोह, लोभ, अहंकार और स्वार्थ की बेड़ियों में कैद हो जाता है, तब उसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म आवश्यक हो जाता है।

   कृष्ण को केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व, राजा, कूटनीतिज्ञ या देवता के रूप में देखना उनके विराट स्वरूप की अवहेलना होगी। कृष्ण उस परम चेतना के प्रतीक हैं, जो जीवन के प्रत्येक द्वंद्व में मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। इस दृष्टि से महाभारत केवल कौरवों और पांडवों का युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म, विवेक और अविवेक तथा सत्य और मोह के संघर्ष का भी विराट आख्यान है।

महाभारत को यदि संसार का दर्पण माना जाए तो उसमें दिखाई देने वाला कुरुक्षेत्र वस्तुतः हमारा अपना जीवन है। धृतराष्ट्र का अंधत्व केवल आंखों का अंधत्व नहीं, पुत्रमोह और सत्ता-मोह का प्रतीक है। दुर्योधन अहंकार और अधिकार की अंधी भूख का प्रतिनिधि है। शकुनि छल और षड्यंत्र की प्रवृत्ति का प्रतीक है।

अर्जुन क्या है?अर्जुन स्वयं संसार है। वह सामर्थ्यवान, लेकिन संशयग्रस्त है। उसके पास शस्त्र हैं, परंतु निर्णय का साहस नहीं। वह कर्तव्य जानता है, लेकिन मोह उसे रोक देता है। अपने ही संबंधों, भावनाओं और आशंकाओं के बीच खड़ा अर्जुन उस सामान्य मनुष्य का प्रतीक है जो जीवन के कठिन मोड़ पर पूछता है—क्या करूं? किसे सही मानूं? मेरा धर्म क्या है? तब उसके सामने कृष्ण खड़े होते हैं।

कृष्ण सारथी अर्थात मार्ग दिखाने वाले हैं। वे अर्जुन का जीवन अपने हाथ में नहीं लेते, बल्कि उसे दिशा देते हैं। यही कृष्ण का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश है—परमात्मा मनुष्य की यात्रा अपने हाथ में नहीं लेता, वह उसे सही दिशा में चलने का विवेक देता है।

कुरुक्षेत्र में कृष्ण का सबसे बड़ा चमत्कार अस्त्र चलाना नहीं, बल्कि अर्जुन के भीतर सोए  विवेक को जगाना है। अर्जुन युद्धभूमि से भागना चाहता है। कृष्ण उसे युद्ध के लिए उकसाते  नहीं, बल्कि कर्म, आत्मा, कर्तव्य, मोह, ज्ञान और निष्कामता का अर्थ समझाते हैं। गीता इसी संवाद का नाम है। इसलिए गीता को केवल युद्ध का उपदेश मानना उसके संदेश को छोटा कर देना होगा। गीता वास्तव में मनुष्य के भीतर के अंधकार से संवाद है।

   कृष्ण आत्मा की अमरता का बोध कराते हैं। वे कर्म का महत्व बताते हैं, लेकिन कर्मफल के मोह से मुक्त होने की प्रेरणा भी देते हैं। वे ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं, भक्ति का मार्ग बताते हैं और अंततः मनुष्य को अपने विवेक से निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं। इसीलिए गीता केवल अर्जुन के लिए नहीं थी। अर्जुन के माध्यम से कृष्ण संसार की आत्मा को जगा रहे थे।

महाभारत भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है। वह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि सांसारिक विकारों के चरम परिणाम का प्रतीक है।जहां लोभ है, वहां संघर्ष है।जहां अहंकार है, वहां विनाश है। जहां मोह विवेक पर भारी पड़ता है, वहां निर्णय भ्रष्ट होते हैं। जहां सत्ता धर्म से बड़ी हो जाती है, वहां कुरुक्षेत्र जन्म लेता है।

  महाभारत इसलिए हुआ क्योंकि मनुष्य के भीतर के विकार सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर हावी हो गए थे। द्यूत, छल, अपमान, अधिकार की लालसा, प्रतिशोध और सत्ता की भूख ने ऐसे संघर्ष को जन्म दिया जिसमें अंततः पूरा समाज दहक उठा।

आज प्रश्न यह नहीं है कि कुरुक्षेत्र कहां था। प्रश्न यह है कि हमारा कुरुक्षेत्र कहां है?आज भी मनुष्य के सामने वही अर्जुन-सदृश प्रश्न खड़े हैं। परिवार में संबंध और स्वार्थ का संघर्ष है। राजनीति में सत्ता और सेवा का संघर्ष है। व्यापार में लाभ और नैतिकता का संघर्ष है। डिजिटल संसार में सूचना और भ्रम का संघर्ष है। मनुष्य के भीतर सुख की आकांक्षा और मानसिक अशांति का संघर्ष है। ऐसे में कृष्ण की आवश्यकता पहले से अधिक है।कृष्ण को बाहर खोजने से पहले भीतर खोजने की आवश्यकता है।

   कृष्ण हमारे भीतर का वह विवेक हैं, जो गलत से हमें रोकता है। वे वह अंतरात्मा हैं, जो अकेले में भी सही और गलत का अंतर बताती है। वे वह चेतना हैं, जो सफलता मिलने पर अहंकार से बचाती है और असफलता मिलने पर निराशा से।    

   कृष्ण की बांसुरी भी एक सुंदर प्रतीक है। बांसुरी भीतर से खोखली होती है, तभी उसमें से संगीत निकलता है। मनुष्य भी जब अहंकार, स्वार्थ और विकारों से स्वयं को खाली करता है, तभी उसके भीतर परम चेतना का संगीत सुनाई देने लगता है।

आज के युग में कृष्ण इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि हमारी समस्याएं आधुनिक हो गई हैं, लेकिन मनुष्य के विकार पुराने ही हैं।

आज कुरुक्षेत्र में रथों की जगह मशीनें हैं, शस्त्रों की जगह तकनीक है और द्यूत की जगह डिजिटल संसार के अनेक आकर्षण हैं; लेकिन लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ आज भी मनुष्य को उसी तरह संचालित करते हैं इसलिए आज की गीता पूछती है—क्या हमारे पास अर्जुन जैसी जिज्ञासा है और कृष्ण की बात सुनने जैसा धैर्य?

कृष्ण हमें संसार छोड़ने का संदेश नहीं देते। वे संसार में रहते हुए सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। वे कर्म से पलायन नहीं, कर्म की शुद्धता चाहते हैं। वे संबंधों से विमुख होने को नहीं कहते, बल्कि मोह और कर्तव्य के बीच अंतर समझाते हैं।

जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ यही है कि हम अपने भीतर उस कृष्ण का जन्म कराएं, जो हमारे निर्णयों का सारथी बने। जब अहंकार हमें दूसरों से बड़ा समझाने लगे और अंतरात्मा विनम्रता की ओर ले जाए—यही कृष्ण हैं। जब निराशा हमें कर्म से विमुख करे और भीतर से कोई शक्ति कहे कि अपना कर्तव्य करते रहो—यही कृष्ण हैं।

    कृष्ण केवल मथुरा में जन्म लेने वाली देह मात्र नहीं एक चेतना हैं, दृष्टि हैं,विवेक हैं, आत्मा की वह आवाज हैं जो मनुष्य को उसके श्रेष्ठतम ओर ले जाती है। हर उस मन में, जहां अंधकार है, कृष्ण का जन्म आवश्यक है। हर उस जीवन में, जहां मोह है, कृष्ण की आवश्यकता है। हर उस समाज में, जहां अन्याय है, कृष्ण-चेतना आवश्यक है। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होगा, जब हमारे भीतर का अर्जुन जागेगा, मोह से ऊपर उठेगा और अपनी आत्मा की आवाज सुनकर सात्विक कर्म के मार्ग पर चल पड़ेगा।


डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड - 247667

अक्टूबर 2026, अंक 76

  शब्द-सृष्टि अक्टूबर 2026, अंक 76 संपादकीय – स्वागत है दीपोत्सव ! – डॉ. पूर्वा शर्मा   परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से..... – दि...