शुक्रवार, 29 मई 2026

आलेख

नींद में जागता अंतर्मन

श्रीराम पुकार शर्मा

नींद, शारीरिक और मानसिक विश्राम की वह प्राकृतिक अवस्था है, जिसमें बाह्य मानसिक चेतना क्षीण हो जाती है और शरीर को आवश्यक आराम प्राप्त होता है । यह केवल शरीर का विश्राम मात्र ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क का पुनर्संयोजन की प्रक्रिया भी है । किन्तु इस निद्राजन्य विश्राम अवस्था में भी हमारे अंतर्मन की सूक्ष्म सक्रियता निरंतर बनी रहती है, जो दिन भर के अनुभव, भावना और स्मृति को इस समय व्यवस्थित करते रहता है । शरीर भले ही शिथिल हो जाए, पर अंतर्मन अपने कार्य में सदैव सक्रिय ही रहता है । वह सदैव जागते ही रहता है, अपने ही बनाए हुए, किसी अदृश्य जगत में; चलता ही रहता है, पर किसी अनंत पथ पर । यही कारण है कि नींद केवल विश्राम मात्र ही नहीं, बल्कि एक अन्तः प्रक्रिया भी है, जहाँ हमारा अंतर्मन विभिन्न स्तरों पर निरंतर कार्यरत रहता है । स्वप्न अंतर्मन की इसी सक्रियता की अभिव्यक्ति हैं । चुकी उसकी स्थिति असाधारण हुआ करती है, जिसको समझ पाना, सामान्य मनुष्यों की क्षमता से परे की ही बात है । स्वप्न और स्वस्थ निद्रा, एक ओर हमारे मस्तिष्क को बराबर तरोताजा बनाए, नई जानकारी को अपनाने के लिए तैयार करते हैं, तो दूसरी ओर वे हमारी मानसिक स्वस्थता तथा भावनात्मक संतुलन-प्रक्रिया को संतुलित करने में भी सहायक भी होते हैं ।

एक रात्रि का मेरा अनुभव, अंतर्मन की इस सत्यता को विशेष रूप से स्पष्ट करता है । एक स्वप्न में, मैं एक खेल के मैदान से होकर गुजर रहा था, जहाँ कुछ बच्चे गेंद खेल रहे थे । उनकी गेंद आकर मेरे पैरों से टकराई और उलझ गई । वे उसे लेने के लिए, मेरे पैरों को छूने और टटोलने लगे । कुछ विशेष अनुभूति के कारण, उसी क्षण मेरी नींद खुली, और मैंने पाया कि वास्तव में मेरी पत्नी मेरे पैरों को हिलाती-डुलाती हुई, मुझे जगाने का प्रयास कर रही है । इसी प्रकार किसी अन्य अवसर पर एक स्वप्न में, मैं अपने मेज पर किसी गाने के लय पर ताल ठोक रहा था, जबकि यथार्थ में कोई आगंतुक मेरे दरवाजे को खटखटा रहा था । उस समय स्वप्न और यथार्थ दोनों की ध्वनियाँ, इस प्रकार परस्पर एकाकार हो गई थी कि उनमें भेद कर पाना, संभव न था । प्रतीत होता था, मानो कि दोनों ध्वनियों का स्रोत एक ही हो । ऐसी कई स्वप्न-घटनाएँ मेरे साथ हुई हैं । आपके साथ भी कई बार हुई ही होंगी, जिनमें स्वप्न, यथार्थ जगत को और यथार्थ, स्वप्न जगत को अपने साथ एकाकार कर लिया होगा ।

यहीं से स्वप्न और यथार्थ के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है । ऐसे अनुभव न केवल विस्मयकारी होते हैं, बल्कि मन को गहराई से सोचने के लिए बाध्य करने वाले भी होते हैं । ये संकेत देते हैं कि स्वप्न और यथार्थ के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं होती है । हमारा मस्तिष्क बाह्य संकेतों और आंतरिक अनुभूतियों को एक साथ ग्रहण कर, उन्हें एक एकीकृत अनुभव के रूप में रूपांतरित कर देता है । ऐसी घटनाएँ अक्सर होती ही रहती हैं।

तो क्या, स्वप्न और यथार्थ के बीच कोई ऐसा अन्तः सेतु भी है, जो दोनों को एकाकार कर देता है ?

तो इसका उत्तर है, - जी हाँ । वह सेतु हमारा स्वयं का मस्तिष्क है, जो दोनों लोकों को जोड़ता है । नींद का महत्व केवल शारीरक विश्राम तक ही सीमित नहीं है । पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद के अभाव में व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, उसकी कार्य-क्षमता घट जाती है, उसकी स्मृति हानि होती है और उसकी रचनात्मकता भी प्रभावित होती है । सुबह उठने पर पूरी तरह तरोताज़ा महसूस करने के लिए, उत्तम गुणवत्ता युक्त, पर्याप्त मात्रा में नींद लेना ज़रूरी है । शारीरिक पोषण जुटाने के लिए जिस प्रकार आहार की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार थकान को मिटाने के लिए, निद्रा की गोद में निश्चिंत पर्याप्त विश्राम लेना आवश्यक होता है । इसी अवस्था में मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है और नई ऊर्जा को संचित करता है । नींद, तंत्रिका तंत्र को सही ढंग से काम करने के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य के और स्फूर्ति लिए भी आवश्यक होता है । अतः नींद, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, भावनात्मक संतुलन और शारीरिक स्वास्थ्यता - तीनों के लिए आवश्यक है । यह मस्तिष्क और शरीर दोनों को पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे हमारा कार्य प्रदर्शन बेहतर बनता है । यही वह समय होता है, जब हमें गहन सपने आते हैं 

    नींद के भीतर एक विशेष अवस्था होती है, जिसे विज्ञान में ‘तीव्र नेत्र गति’ REM (Rapid Eye Movement) कहा जाता है । इस अवस्था में हमारी पलकें, तो बंद रहती हैं, पर उसके अंदर हमारी नेत्र-गोलक गतिशील ही रहते हैं । यही अवस्था हमारे अन्तः का अंतर्मन का भी होता है । हमारा अंतर्मन, जिसे मनोविज्ञान में ‘अवचेतन’ भी कहा जाता है, हमारे अनुभवों और इच्छाओं का भंडार हुआ करता है । परंतु वह हमारे शारीरिक बंधन में नहीं रहता है, बल्कि वह तो पूर्णतः स्वतंत्र ही रहता है । वही हमारे शरीर की आंतरिक और अदृश्य परम सत्ता हुआ करता है । इसी में हमारी गहरी इच्छाएँ, स्मृतियाँ, अनुभव, संस्कार आदि संचित रहते हैं । यह सदा अपने ही निर्मित, किसी सूक्ष्म जगत में जाग्रत रहकर विचरण करते रहता है । इस समय हृदय की तथा श्वसन की गति कुछ तीव्र हो जाती हैं, जबकि शरीर की अधिकांश माँसपेशियाँ अस्थायी रूप से शिथिल ही रहती हैं । ऐसे में शरीर पूर्णतः निद्रा-ग्रस्त रहता है ।

स्वप्न की उत्पति ऐसी ही स्थिति में हमारे अंतर्मन में हुआ करता है । यही वह अवस्था होती है, जिसमें स्वप्न सबसे अधिक सजीव और स्पष्ट रूप में अनुभव किए जाते हैं । इस अवस्था में हमारा अंतर्मन भावनाओं, कल्पनाओं, अनुभवों और स्मृतियों के सूक्ष्म तंतुओं से एक विचित्र स्वप्न-संसार रचता है । साथ ही, बाह्य जगत से आने वाले सूक्ष्म संकेतों, - जैसे ध्वनि, स्पर्श आदि को अत्यंत सूक्ष्म ही क्षण (माइक्रो सेकंड) में ही हमारा अंतर्मन, उसे स्वप्न में सहज रूप से समाहित कर लेता है । विज्ञान में इसे ‘विरोधाभासी नींद’ (Paradoxical Sleep) या ‘सपनों की नींद’ भी कहा जाता है । यह मूल रूप से नींद का ही एक विशेष चरण होता है, जहाँ मस्तिष्क अत्यधिक सक्रिय रहता है । यह लगभग सभी स्तनधारियों, पक्षियों और कुछ सरीसृपों में समान रूप में पाई जाती है । यह चरण याददाश्त को संयोजने, कुछ नया सीखने और भावनाओं को संसाधित करने के लिए महत्वपूर्ण हुआ करता है ।

स्वप्न केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है, वरन यह दर्शन का भी विषय रहा है । भारतीय वेदान्त ‘बृहदारण्यक उपनिषद’ में भी इन तीनों अवस्थाओं यथा; - जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है । जाग्रत अवस्था में हम बाह्य जगत से जुड़े रहते हैं, सुषुप्ति अवस्था में गहन विश्राम की स्थिति में होते हैं और स्वप्न अवस्था में हमारे अंतर्मन की छवियाँ सक्रिय हो उठती हैं । स्वप्न में हमारा अंतर्मन अपनी ही जागृति या क्रिया-कलापों को देखता है । इसी कारण स्वप्न में असंभव बातें भी, हमें संभव प्रतीत होने लगती हैं । हम ऊँचाइयों से गिरते हैं, अजनबी स्थानों में भटकते हैं, पेड़ों की डालियों पर निवास करते हैं, आकाश में उड़ते हैं, अखाद्य पदार्थों को खाते हैं, बिना किसी संकोच के असामान्य परिस्थितियों में उपस्थित होते हैं । परंतु ये सब हमें विचित्र नहीं, बल्कि सहज और स्वाभाविक लगते हैं । न कोई संकोच और न कोई विस्मय ही । इसका कारण यह है कि स्वप्न अवस्था में तर्क और वास्तविकता की जाँच करने वाली हमारी चेतना (बुद्धि) शिथिल हो जाती है, जबकि हमारी भावनाएँ और कल्पनाएँ प्रबल बन जाती हैं । अनुभव केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है । मन का यही अनुभव अधिक प्रभावी होकर हमें स्वप्न के रूप में दिखाई देते हैं ।

 

एक और रोचक बात यह है कि स्वप्न में किसी भी शारीरिक पीड़ा की अनुभूति प्रायः कम या फिर न के बराबर ही हुआ करती है । लेकिन इसके विपरीत भय की अनुभूति अत्यंत तीव्र हो सकती है, क्योंकि इस स्थिति में बौद्धिक तो नहीं, परंतु भावनात्मक क्रियाएँ अत्यधिक सक्रिय हो उठती हैं । जैसे ही स्वप्न में कोई संकट अत्यधिक गहन हो उठता है, तब मस्तिष्क हमें जगा देता है । तब अंतर्मन स्वयं अपनी स्वप्न-रचना से तुरंत ही बाहर निकल आता है । मानो कि एक आंतरिक सुरक्षा-तंत्र सक्रिय हो गया हो । जागने पर हमारी चेतना समझ पाती है कि वह केवल स्वप्न-मात्र था, और फिर हम शांति का अनुभव करते हैं । छोटे बच्चों में यह प्रक्रिया कभी-कभी पूर्ण रूप से नियंत्रित नहीं हो पाती है, जिससे वे स्वप्न से जागने में व्याकुल हो जाते हैं । इसीलिए ऐसी स्थिति में उन्हें स्नेहपूर्वक शांत करना आवश्यक होता है, ताकि वे स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर सकें ।

इस प्रकार नींद में जागता मन’ कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि एक अनुभूत सत्य है । शरीर विश्राम करता है, पर हमारा अंतर्मन अपने सूक्ष्म कार्यों में निरंतर सक्रियशील ही बना रहता है । वह कभी स्मृतियों के गहन वन में विचरता है, तो कभी भावनाओं की गहरी धाराओं में प्रवाहित होते रहता है और फिर वह कभी बाह्य जगत के संकेतों को अपने स्वप्नलोक में समाहित कर लेता है ।

तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक है कि क्या स्वप्न केवल भ्रम है ? क्या यथार्थ से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ?

स्वप्न वह होता है, जिसे अंतर्मन अपने भीतर रचता है, और यथार्थ वह होता है, जिसे हम बाहर जीते हैं । अर्थात, - स्वप्न केवल सोई हुई चेतना के दृश्य मात्र नहीं होते हैं, बल्कि जाग्रत जीवन के अनकहे सत्य भी हो सकते हैं, जो कभी प्रतीक बनकर, कभी संकेत बनकर और कभी भाव बनकर, हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं । भले ही ये दोनों, हमें दो पृथक जगत प्रतीत होते हैं, वस्तुतः दोनों ही एक ही चेतना के ‘अंतः’ और ‘बहिः’ रूप होते हैं । इनका परस्पर सम्बन्ध अत्यंत ही सूक्ष्म हुआ करता है । स्वप्न उस बीज के समान होते हैं, जो मन की गहराइयों में गिरकर, विचारों को अंकुरित करते हैं । ये विचार ही आगे चलकर कर्म का रूप धारण कर लेते हैं और वही कर्म कभी-कभी यथार्थ की रचना करते हैं

जिस तरह जागृत में जीव के संस्कार, उसे आत्मिक प्रसन्नता और आह्लाद प्रदान करते हैं और निश्चिन्त भविष्य की रूप रेखा बनाते रहते हैं । ठीक उसी तरह संयत और पवित्र मन में भी जो स्वप्न आते हैं, वे भविष्य की उज्ज्वल संभावनाओं के प्रतीक हुआ करते हैं । कुछ लोग उसे समझ पाते हैं, जबकि अनेक लोग उसे न समझ पाते हैं । इस प्रकार स्वप्न न, तो मात्र भ्रम हैं, न ही पूर्ण भविष्यवाणी है, बल्कि वह उस यात्रा का प्रारंभ हैं, जहाँ संभावना धीरे-धीरे सत्य का स्वरूप धारण करने लगती है । इसका सांकेतिक सूत्र इस प्रकार से हो सकता है - स्वप्न भाव विचार निर्णय कर्म यथार्थ । अर्थात, - स्वप्न हमारे मन में भाव उत्पन्न करते हैं, भाव से ही विचार निर्मित होते हैं, विचार से निर्णय, और फिर निर्णय से कर्म बनते हैं । अंततः वही कर्म हमारे यथार्थ को निर्मित करते हैं ।

संभवतः स्वप्न न तो पूर्णतः सत्य होता है, न पूर्णतः असत्य ही । बल्कि उन दोनों के मध्य की विचित्र अनुभूति है । जहाँ बाह्य (ज्ञान) और अन्तः (अंतर्मन) की सीमाएँ धुँधली पड़ जाती हैं । यह अंतर्मन की उस सृजनात्मक शक्ति का परिचायक होता है, जो क्षण भर में एक सम्पूर्ण और विचित्र जगत की रचना कर लेती है । वह फिर उतनी ही सहजता से, उसे तत्क्षण विसर्जित भी कर देती है । स्वप्न हमें यह संकेत देता है कि हमारा अंतर्मन केवल जाग्रत अवस्था तक ही नहीं, बल्कि शारीरिक निद्रावस्था में भी, वह गुप्त रूप में अनेक स्तरों पर कार्य करती रहती है । कभी तो स्वप्न स्मृतियों को बुनता है, कभी भावनाओं को रूप देता है और कभी बाह्य जगत के संकेतों को अपने लोक में समाहित कर, उसे एकाकार करता है । परंतु वह निरंतर अपनी अनंत यात्रा पर अग्रसर ही रहता है ।

इस प्रकार से देखा जाए, तो स्वप्न भले ही भविष्य को सीधे निर्धारित नहीं करते, पर वे भविष्य की दिशा को अवश्य ही प्रभावित करते हैं । फलतः स्वप्न को भ्रम मानकर पूरी तरह से त्याग देना उतना ही अनुचित है, जितना उन्हें पूर्ण सत्य मान लेना । बल्कि उन दोनों के बीच ही संभावित यथार्थ, अपना रूप लेने की प्रतीक्षा करती है । निद्रा जितनी प्रगाढ़ होगी, स्वप्न उतने ही सार्थक और सत्य होंगे । पर यह तभी सम्भव है, जब हमारा अन्तःकरण पवित्र और निर्मल होगा । इसके साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि जो स्वप्न केवल निद्रावस्था में देखा जाता है, वह क्षणभंगुर होता है, पर जिस स्वप्न को समझा और जिया जाता है, वही यथार्थ के बीज हुआ करते हैं । शायद यही स्वप्न का सबसे गहरा रहस्य है ।

श्रीराम पुकार शर्मा

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,

24, बन बिहारी बोस रोड,

हावड़ा – 711101

***

गीत

 


1

 सूर्य भी कहने लगा है

दुष्यंत कुमार व्यास

 

सूर्य भी कहने लगा है, रास रथ की थाम करके

ताप से मैं भी जला हूँ, चाँदनी की छाँव पाने।

 

 

हर समय मैं ही जलूँ क्यों, क्या रहा अपराध मेरा,

अश्व मेरे भी थके है, है कहा अब हो बसेरा,

जन्म से लेकर अभी तक,बस सफर में ही रहा हूँ

पर नहीं मुझको मिला है ,आज तक भी हाथ तेरा

 

भूख की मजबूरियों ने, इस तरह से है फँसाया,

चाह कर भी आ न पाया, प्रेम के कुछ गीत गाने।

 

आँख में थे चंद सपने, जेब कोने से फटी थी

मेडलों को बेच करके पेट की खाई भरी थी

पाँव में छाले पड़े थे , हाथ में गेती उठाई,

और श्रम की धार देकर, खेत में फसलें उगाई

 

स्वेद से लथपथ चला हूँ, बोझ माथे पर धरा है,

खेत की आधी फसल ले, आज बनिये को चुकाने।

 

रक्त की बूँदें बहाकर,चंद सिक्के थे कमाये,

प्रेयसी के केश में जब फूल जूही के लगाये

जिंदगी की इक अधूरी साध को पूरित किया था

दूसरों के लिए ही अब तलक खुद ही जिया था

 

कर प्रिया ने कुछ इशारा, नेह का दीपक जलाके,

आज फिर से था बुलाया लाज का घूँघट उठाने।

 

दर्द की लेकर लकीरें और काया अनमनी सी

लालसा बहने लगी थीं रेत मुठ्ठी में बँधी सी

सर्प ने फिर फन उठाया, और फुँकारा हृदय भी,

कामना कहने लगी थी, आज पाले यह सभी भी

 

सूर्य भी कहने लगा है, अब मुझे अवकाश दे दो

ताप से मैं भी जला हूँ, चाँदनी की छाँव पाने।

2

माँ!

 

 कैसे बीतीं रातें तेरी, उनका हाल सुना डालें।

 

 नहीं मिल रहे शब्द मुझे हैं,

     केवल आँसू झरते हैं

        मौन अधर भी अनबोले हैं,

           जाने क्या कुछ कहते हैं।

 

शब्दों में सामर्थ्य नहीं है, तेरी बातों को ढालें।

कैसे बीतीं रातें तेरी,उनका हाल सुना डालें।।

 

मेरा रोना, तेरा गाना,

     दोनों मिलते जाते थे।

          रोते-गाते हम दोनों के,

              आँसू भी मुस्काते थे।।

 

चादर कितनी बदली तैनें, कितने सपने थे पाले।

मन्नत कितनी बाँधी दर-दर, सबके हाल सुना डालें।

 

 

भले बढ़ा हो कद मेरा पर,

     आँचल तेरा लहराया

            जिसके नीचे आकर मेरा,

                   भाग्य सदा ही हर्षाया।

 

जीता जब भी मैं दुनिया से, फूल गई तेरी छाती।

हारा जब मैं अपनों से तो, सदा पीठ तू सहलाती।।

 

कभी खेलता तेरी गोदी,

      उँगली पकड़ी पाँव चला।

            आज उठा अपने हाथों से,

                 काठ चिता पर दिया जला।

 

कितना निष्ठुर बन बैठा मैं,  मंत्र पढ़ें मरने वाले।

पुत्र धर्म का पालन करते, सारे आँसू पी डाले।।

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दुष्यंत कुमार व्यास

रतलाम

संस्मरण

आपने क्या कभी बलबीर से बातें की हैं

(महाकवि का थप्पड़)

                          डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

रंग का रंग जमाने ने बहुत देखा है

आप ने क्या कभी बलबीर से बातें की हैं।’

शायद ही कोई ऐसा काव्य-रसिक हो जिसने रंग जी का यह मशहूर शेर न सुना हो। ‘रंग का रंग देखना’ और ‘बलबीर से बातें’ करना दोनों अपने में अर्थपूर्ण हैं..इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी कवि की कविता के पाठक या श्रोता तो अगणित हो सकते हैं पर उसे व्यक्तिगत रूप से जानने /समझने वाले कम ही लोग होते हैं। प्रत्येक कलाकार के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हो सकते हैं उसे देखने समझने की दृष्टि, उसकी निजी चिंताएँ, पीड़ाएँ या सुख हो सकते हैं,उन सबका साक्षात्कार कलाकार से साक्षात्कार के बाद ही संभव है इसीलिए रंग जी जब कहते हैं..आपने क्या कभी बलबीर से बातें की हैं..तो वे इसी तथ्य की ओर संकेत कर रहे होते हैं। मैं स्वयं को उन सौभाग्यशाली लोगों में मानता हूँ जिन्होंने ‘रंग’ के रंग को देखने के साथ ही उनके ‘बलबीर’ रूप से भी बातें की हैं, उनका आत्मीय और स्नेहपूर्ण सान्निध्य प्राप्त किया है। रंग जी का जब भी कहीं उल्लेख आता है तो स्मृति-पटल पर रंग जी साक्षात आकर खड़े हो जाते हैं और अचानक रंग जी के हाथों से खाए गए एक थप्पड़ की याद आ जाती है। स्मृति-कोष में वह घटना आज तक ज्यों की त्यों सुरक्षित है...

     शायद 1969 या 70 की सर्दियाँ थीं मैं अपने घर में बाबू के कमरे में सोया था। बाबू का कमरा कोई अलग से कोई ऐसा कमरा नहीं था जो उनका कोई व्यक्तिगत कमरा हो या जहाँ किसी को जाने की अनुमति न हो। वह घर का एक सार्वजनिक कमरा था जो ऊपर वाली मंजिल पर था, उस कमरे को हम लोग ऊपर का कमरा या बाबू का कमरा कहते थे, उस कमरे की खासियत यह थी कि उसमें दो निवाड़ के पलंग स्थाई रूप से बिछे ही रहते थे। उन दिनों मध्यवर्ग के परिवारों में निवाड़ के पलंग की अलग ही अहमियत होती थी, बाकी सब या तो मूंज की चारपाई पर सोते थे या जमीन में बिस्तर लगते थे... उन निवाड़ के पलंग में से एक पर बाबू ही सोते थे, उस पलंग को भी हम लोग बाबू का पलंग कहा करते थे क्योंकि उसमें आधे पलंग में वे सोते थे आधे में उनकी पुस्तकें स्थायी रूप से पसरी रहती थीं, किताबों के कारण उस पलंग पर लेटने की किसी को अनुमति नहीं थी क्योंकि जब बाबू ड्यूटी पर जाते या कहीं और जाते तब भी उनकी किताबें वहीं पसरी रहतीं। उसी पलंग के ठीक बगल में पड़ा हुआ दूसरा पलंग घर पर आने-जाने वाले मेहमानों के लिए था। उस पलंग पर प्रायः मैं सो जाता था क्योंकि किताबो का आकर्षण मुझे खींचता था, बाबू की अनुपस्थिति में उनकी किताबों में से कोई किताब उठा कर पढ़ लेता था। उस दिन बाबू किसी स्थानीय कवि-सम्मेलन में गए हुए थे, मैंने उनकी पुस्तकों से एक पुस्तक निकाली और पढ़ते-पढ़ते ही कब सो गया पता नहीं चला। गहरी नींद में था अचानक गाल पर पड़े एक थप्पड़ से हड़बड़ाकर उठ गया। सामने देखा बाबू खड़े मुस्करा रहे थे और उनके साथ ही कोई और बुजुर्ग सज्जन खड़े मुस्करा रहे थे,वे बोले, “बरखुरदार ये थप्पड़ मैंने मारा है, तुम मेरे पलंग पर क्यों सो गए?”...मैंने इसके पूर्व रंग जी को कभी देखा नहीं था.. थप्पड़ का प्रभाव, ठंड में गहरी नींद से जगा देना..मन ही मन गुस्सा भी आया,पता नहीं बाबू कैसे-कैसे लोगों को ले आते है? अचानक बाबू हँसकर बोले, “अरे, ये महाकवि रंग जी हैं, इनका ये थप्पड़ महाकवि का आशीर्वाद है, अब समझो तुम भी पक्के कवि बन गए।”

रंग जी का नाम मेरे लिए अपरिचित नहीं था, मैंने उठ कर उनके पैर छुए, उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और बोले, “बेटा दास जी ने अभी मुझे बताया कि तुम भी कुछ लिखने का शौक रखते हो, अच्छी बात है.. खूब पढो और लिखो, अब तुम जाकर कहीं और सोओ इस पलंग में मैं सोऊँगा।” मैं चुपचाप उठकर चला आया।

अगले दिन दोपहर में आँगन में धूप में बाबू और रंग जी भोजन करने बैठे, भोजन की थालियाँ मैं ही लेकर गया। एक बड़े कवि की सेवा- भाव से मेरे अंदर अतिरिक्त उत्साह भरा हुआ था। मैंने थाली उनके सामने रखी, वे बड़े स्नेह से बोले -”बेटा अपनी अम्मा से कहो मुझे एक कटोरी सरसों का तेल दे दें।” मैं चौंक गया, भोजन के साथ एक कटोरी तेल मांगने वाले पहले व्यक्ति थे। बाबू भी चौंके, उन्होने रंग जी की ओर देखा, बाबू के कुछ पूछने के पूर्व ही रंग जी ने समाधान किया -”दास जी, आप तो मेरी आदत जानते ही हैं।” इतना कह कर उन्होंने हाथ से पीने की आदत का संकेत किया, बाबू मुस्कराए, रंग जी ने बात जारी रखी.. “अब बच्चों के सामने क्या कहें, अंदर खुश्की न बढ़े इसलिए मैं घी खूब लेता हूँ, घी में भिगो कर ही रोटी खाता हूँ। जगह- जगह जाना होता है, हर घर में तो इतना घी माँगने में शर्म आती है इसलिए तेल में रोटी भिगा कर खा लेता हूँ।”

उनकी बात सुनकर अम्मा ने छोटे भाई के हाथों से एक कटोरी में शुद्ध घी रंग जी की के लिए भेज दिया , बाबू बोले -”लीजिए आपकी बहू ने घी भेज दिया।” रसोई से अम्मा की आवाज आई, “भगवान की दया से अभी हम आपकी सेवा कर सकते हैं।”.. रंग जी हँसे और अम्मा की प्रशंसा में कुछ कहा, क्या कहा वह याद नहीं।

उसके बाद रंग जी तीन दिनों तक मेरे घर रहे। उन्हें आस-पास कई गोष्ठियों में जाना था। वे दिन में हमारे घर रहते और शाम को बाबू को लेकर किसी गोष्ठी में चले जाते वहाँ से आधी रात बाद ही आते,वे जितने दिन रहे मैं भूलकर भी उस पलंग पर नहीं लेटा। जब वे भोजन करने बैठते तो अम्मा उनकी थाली में एक कटोरी घी अवश्य रखतीं। मैं उन्हे भोजन करते समय बड़े ध्यान से देखता.. रंग जी रोटी का कौर तोड़ते उसे पहले घी की कटोरी में अच्छी तरह डुबो कर तर करते फिर दाल या सब्जी में डुबो कर कौर मुँह में रखते और धीरे-धीरे चबा कर खाते... खाने का ये अद्भुत तरीका मैंने और किसी का नहीं देखा था।  रंग जी चले गए पर उनके थप्पड़ का अहसास मुझे बहुत दिनों तक होता रहा और साथ में बाबू का कहा वाक्य -ये महाकवि का प्रसाद है, समझो तुम भी पक्के कवि बन गए - आह्लादित करता। 

      उस घटना को लंबा अंतराल हो गया। लगभग एक दशक पश्चात रंग जी से अचानक ही मैनपुरी में मुलाक़ात का पुनः सौभाग्य प्राप्त हुआ। दरअसल मैं अपनी शिक्षा पूर्ण करके मैनपुरी के चित्रगुप्त महाविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नियुक्त होकर कर झाँसी से मैनपुरी आ गया था। अब तक मैंने थोड़ा लिखना भी प्रारंभ कर दिया था और मैनपुरी के साहित्य-रसिकों के साथ बैठकों में भी सम्मिलित होने लगा था। मैनपुरी में रंग जी की चर्चा हर गोष्ठी में हुआ करती थी कारण यह कि रंग जी का गृह जनपद तो एटा था पर मैनपुरी को भी वे अपना घर मानते थे और मैनपरी उनका आना-जाना बना रहता था। एक दिन संयोगवश मुझे उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हो गया। मैं साइकिल से कॉलेज से वापस आ रहा था,अचानक देखा सामने रंग जी अकेले अपने विचारों में मग्न धीरे-धीरे चले जा रहे हैं। मैंने उनके निकट साइकिल रोकी और उतर कर उनके चरण स्पर्श किए, वे अपरिचित भाव से मुझे देखने लगे वे कुछ प्रश्न करते मैंने ही कहा, “मैं झाँसी के दास जी का बेटा हूँ।” उन्होंने आह्लाद-भाव से मुझे अपने सीने से लगा लिया और स्नेह से पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले-”यहाँ कैसे?” मैंने अपनी सर्विस के बारे में बतलाया वे अत्यंत प्रसन्न हुए। अचानक मैंने उन्हें थप्पड़ वाला प्रसंग याद दिलाया तो वे बहुत हँसे और बोले -”अरे बेटा मैंने चपत लगाई होगी पर सोते समय तुम्हें थप्पड़ जैसा लगा होगा।” फिर बोले, “तो उस प्रसाद का कुछ फल मिला या नहीं, कुछ लिखना-विखना शुरू किया।”

जी, कुछ टूटा-फूटा लिख लेता हूँ।”- मैंने विनम्रता से कहा।

कुछ देर वे बातें करते रहे फिर बोले, “यहाँ छपट्टी मोहल्ले ललित मोहन द्विवेदी का घर जानते हो।”

हाँ हाँ, अच्छी तरह से जानता हूँ।”

में उन्हीं के घर रुका हूँ बेटा, शाम को वहाँ आ जाओ तो तसल्ली से बातें करेंगे”

 सायँकाल मैं उत्साह में भरकर छपट्टी मोहल्ले में द्विवेदी जी के घर पहुँच गया, रंग जी बाहर बैठक में ही एक चारपाई पर लेटे थे मुझे देखते ही प्रसन्नता से बोले आओ बेटा, आओ।

मैं बहुत देर उनके सानिध्य में रहा। वे झाँसी के कवि मित्रों के विषय में पूछते रहे। मेरे लेखन के विषय में जानकारी लेते हुए उन्होंने मेरी एक गज़ल सुनी और मुस्कराते हुए बोले, “ठीक लिख रहे हो,पर अभी गज़ल कहने के लिए और मेहनत करनी पड़ेगी।” मैं वहाँ काफी देर बैठा रहा, इस अंतराल में मैनपुरी के कई साहित्य-प्रेमी उनसे मिलने आते रहे जब भी मैं उनसे चलने हेतु अनुमति लेना चाहता वे हाथ पकड़ कर स्नेह से बिठा लेते। मेरे लिए वह एक अविस्मरणीय शाम थी।

जब-जब कहीं भी रंग जी की चर्चा होती है, उनके उस शेर की चर्चा होती है मैं गर्व से कहता हूँ.. हाँ मैंने भी बलबीर से बातें की हैं।



डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

सेवानिवृत्त एसोशिएट प्रोफेसर

श्री चित्रगुप्त पी.जी.कॉलेज

मैनपुरी(उ.प्र.)-205001

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मार्च-अप्रैल 2026, अंक 69-70(संयुक्तांक)

 



शब्द-सृष्टि

मार्च-अप्रैल 2026, अंक 69-70(संयुक्तांक)  

परामर्शक की कलम से.... – ‘शब्दसृष्टि’ का प्रस्तुत अंक : विलंब की वजह .... – प्रो. हसमुख परमार

कविताई 

1. युद्धं देहि! 2. कविता है : युद्ध के बावजूद 3. धरती के युद्धप्रिय चौधरियों के नाम – डॉ. ऋषभदेव शर्मा

माहिया – रंगों की नगरी है – ज्योत्स्ना प्रदीप

1. छुप-छुप मीरा रोये .. (विष्णु पद छंद) 2. श्रीराम-सेतु(चौपाई छंद)3. नीति वाक्य – डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी

हाइकु – प्रीति अग्रवाल

गीत – वाचालों का जोर जहाँ – दुष्यंत कुमार व्यास

आलेख

इतिहास, मिथक और आस्था का संगम ‘रामटेक’ – श्रीराम पुकार शर्मा






कविताई

 

विष्णु पद छंद

1.       

छुप-छुप मीरा रोये ..

 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी

मन का मंदिर  सूना-सूना,झर-झर अश्रु बहें।

रोये मन का कोना-कोना,किससे पीर कहें।।

गलियाँ  छूटीं द्वारे   छूटे ,सबने  छोड़  दिया।

ठौर  कहाँ जो तूने मोहन,मुखड़ा मोड़ लिया।

 

टूट  गए  सब रिश्ते-नाते, सुमिरन कौन करे।

एक बार दुख पूछो मोहन,तुम भी मौन धरे।।

श्वास-वर्तिका  छोटी होती,लौ भी मंद पड़ी।।

देखूँ  कैसे  तुमको  मोहन, पलकें  बंद पड़ी।।

***

चौपाई छंद

2.

श्रीराम-सेतु

 

देख-देख लंका का सागर।

नाच रहे हनुमन के वानर।।

राम-नाम की लिए शिलाएँ।

काँधे  पर ढो-ढोकर लाएँ।।

 

राम नाम की जय है करते।

जोर-जोर  हुँकार है भरते।।

 

तैर रहीं  विकराल शिलाएँ।

वानर उनको साथ मिलाएँ।।

 

खड़े हुए नल-नील किनारे।

राम लखन सब हर्षित सारे।।

देख प्रभु श्रीराम की  माया।

देवलोक  आनन्द  समाया।।

***

3.

नीति वाक्य

 

प्रथमपूज्य हैं घर की माता,

        फिर मंदिर को जाना जी ।

तात-चरण के जैसा पावन,

       जग में नहीं ठिकाना जी ।।

अन्न कभी मत छोड़ो जूठा,

         जब भी खाएँ खाना जी ।

खून पसीने से कृषकों के,

          बनता है हर दाना जी ।।

 

दान पुण्य करते हो जितना,

          वही लौट कर आना जी ।

सेवा सबसे बड़ा धरम है,

              वेदों ने भी माना जी ।।

रूप छोड़ गुण को ही देखो,

          जब भी बहुएँ लाना जी ।

बिटिया-तुल्य समझना उसको,

         अगर चैन सुख पाना जी ।।

***    


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


जुलाई 2026, अंक 73

  शब्द-सृष्टि जुलाई 2026, अंक 7 3 परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से.... – दिन कुछ ख़ास है ! संपादकीय(डॉ. पूर्वा शर्मा) – एक साहित्यकार...